उत्तराखंड में 5 दिन से लापता 8 पर्वतारोहियों का नहीं मिला सुराग, तंबू और बैग बरामद; मौसम बना बाधा

Uttarakhand News: उत्तरकाशी के केदारताल क्षेत्र में पांच दिन से लापता आठ पर्वतारोहियों की तलाश जारी है। तंबू और बैग मिले, लेकिन खराब मौसम और भारी बर्फबारी के चलते बचाव अभियान रोकना पड़ा।

Newstrack Network
Published on: 2 Nov 2026 11:15 PM IST
उत्तराखंड में 5 दिन से लापता 8 पर्वतारोहियों का नहीं मिला सुराग, तंबू और बैग बरामद; मौसम बना बाधा
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फोटो-सोशल मीडिया

Uttarakhand News: उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित केदारताल के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में लापता आठ लोगों की तलाश सोमवार को भी पूरी नहीं हो सकी। इनमें सात पर्वतारोही और एक स्थानीय गाइड शामिल हैं। सोमवार को राहत दल केदार खड़क क्षेत्र तक पहुँचने में सफल रहे और वहाँ से लापता लोगों के तंबू, बैग तथा अन्य सामान बरामद किया। लेकिन व्यापक खोजबीन के बावजूद किसी व्यक्ति का पता नहीं चल सका। देर शाम मौसम बिगड़ने, भारी बर्फबारी और हिमस्खलन की आशंका के कारण बचाव अभियान अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। बचाव दल फिलहाल केदार खड़क क्षेत्र में डेरा डाले हुए हैं। मौसम अनुकूल होते ही तलाशी अभियान दोबारा शुरू किया जाएगा। राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम इस अभियान में लगी है। 

उत्तर प्रदेश की दो महिलाएँ भी लापता, सभी आठ लोगों की पहचान सामने आई

लापता लोगों में पश्चिम बंगाल के पाँच पर्वतारोही तपस बाउरी, रतन घोष, मनोज खोवास, रिंटू मंडल और उदय घोष शामिल हैं। इनके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश की दो महिलाएँ वर्तिका वर्मा और दीपिका वर्मा भी लापता हैं। आठवें व्यक्ति उत्तरकाशी के स्थानीय निवासी 25 वर्षीय पर्वतारोहण गाइड सिद्धार्थ राणा हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्तिका वर्मा की उम्र 28 वर्ष बताई गई है। हालाँकि उत्तर प्रदेश की दोनों महिलाओं के गृह जनपद और पारिवारिक पते की विश्वसनीय पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। प्रशासन ने लापता लोगों के परिजनों को घटनाक्रम की जानकारी दे दी है। फिलहाल आठों लोगों की स्थिति अज्ञात बनी हुई है। 

27 अक्टूबर को शुरू हुई थी यात्रा, 29 अक्टूबर को लौटना था

उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी के अनुसार पर्वतारोहियों के दल को गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान प्रशासन ने 26 अक्टूबर को तीन दिन की यात्रा की अनुमति दी थी। अगले दिन 27 अक्टूबर को दल गंगोत्री से केदारताल के लिए रवाना हुआ। इसमें सात पर्यटक पर्वतारोही, एक गाइड और सहयोगी कर्मचारी शामिल थे। दल को 29 अक्टूबर तक गंगोत्री लौटना था, लेकिन इसी दौरान ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम तेजी से बिगड़ गया। भारी बर्फबारी और हिमस्खलन से रास्ते अवरुद्ध हो गए। तीस अक्टूबर को प्रशासन को जानकारी मिली कि दल के कुछ सदस्य रास्ते में फँस गए हैं। इसके बाद बचाव अभियान शुरू करने की तैयारियाँ की गईं। विभिन्न प्रशासनिक रिपोर्टों में मूल दल के सदस्यों की संख्या 12 और 13 अलग-अलग बताई गई है। लेकिन सात पर्वतारोहियों और एक गाइड सहित आठ लोगों के लापता होने तथा चार सहयोगी कर्मचारियों के सुरक्षित लौट आने की पुष्टि कई स्वतंत्र रिपोर्टों से हुई है। 

चार लोग सुरक्षित लौटे, बाकी आठ से संपर्क टूट गया

दल के चार सहयोगी कर्मचारी सुरक्षित गंगोत्री लौट आए थे। इनमें तीन पोर्टर और एक रसोइया शामिल हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार 30 अक्टूबर को पर्वतारोहियों ने अपनी ट्रैकिंग एजेंसी से संपर्क करके खराब मौसम के कारण रास्ते में फँसने की सूचना दी थी। इसके बाद एजेंसी और प्रशासन ने बचाव प्रयास शुरू किए। सुरक्षित लौटे कर्मचारियों से मिली जानकारी के आधार पर राहत दल ने संभावित स्थानों पर खोजबीन की। शुरुआती दो दिनों में हेलीकॉप्टर से किए गए निरीक्षण और पैदल तलाश के बावजूद न तो पर्वतारोही दिखाई दिए और न उनका कोई सामान मिला। सोमवार को पहली बार तंबू और बैग मिलने से खोज अभियान को एक ठोस स्थान मिला है, लेकिन इससे लापता व्यक्तियों की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चलता। 

हेलीकॉप्टर से उतारे गए दस विशेषज्ञ बचावकर्मी, बर्फ ने रोका रास्ता

सोमवार सुबह एसडीआरएफ के छह और उत्तरकाशी स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के चार विशेषज्ञों सहित दस सदस्यीय पर्वतीय बचाव दल को हेलीकॉप्टर से केदार खड़क क्षेत्र में उतारा गया। इसके अतिरिक्त वन विभाग, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल और स्थानीय ट्रैकिंग एजेंसी के कर्मचारी पैदल मार्ग से भी लापता लोगों तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। एसडीआरएफ के कमांडेंट अर्पण यदुवंशी ने बताया कि बचाव दल को लापता व्यक्तियों के तंबू और बैग तो मिले हैं, लेकिन व्यापक खोज के बावजूद किसी का पता नहीं चला। केदार खड़क में लगभग पाँच से छह फीट तक बर्फ जमा है। खराब मौसम में कई बार दृश्यता लगभग समाप्त हो जाती है। ऐसे हालात में बचावकर्मियों के लिए आगे बढ़ना बेहद जोखिमपूर्ण है। सोमवार शाम परिस्थितियाँ अधिक खराब होने के बाद अभियान रोकना पड़ा। 

रास्ते में 10 से 12 स्थानों पर हिमस्खलन, जमीन और आसमान दोनों से तलाश मुश्किल

गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के उपनिदेशक मयंक गर्ग के अनुसार केदारताल मार्ग पर लगभग 10 से 12 स्थानों पर हिमस्खलन होने की जानकारी मिली है। सुखी ढांग के आसपास हिमस्खलन प्रभावित हिस्सा मार्ग के प्रवेश बिंदु से लगभग 11 से 12 किलोमीटर पैदल दूरी पर है, जबकि सीधी हवाई दूरी लगभग साढ़े पाँच से छह किलोमीटर है। राहत दलों ने 30 अक्टूबर से पैदल रास्ते से आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन कई जगह बर्फ और मलबा जमा होने के कारण उन्हें लौटना पड़ा। हेलीकॉप्टर से निगरानी में भी खराब दृश्यता बड़ी बाधा बनी हुई है। इन परिस्थितियों में किसी स्थान पर लोगों के फँसे होने की आशंका और वहाँ तक वास्तव में पहुँच पाने की संभावना के बीच बड़ा अंतर है। 

मौसम की चेतावनी मिली थी, लेकिन दल तक पहुँच नहीं सकी

इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू मौसम संबंधी चेतावनी और पर्वतारोहियों तक सूचना पहुँचाने की व्यवस्था से जुड़ा है। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के उपनिदेशक मयंक गर्ग ने बताया कि 27 अक्टूबर को सुबह लगभग साढ़े दस से ग्यारह बजे के बीच प्रशासन को 29 अक्टूबर के लिए खराब मौसम की चेतावनी मिली थी। लेकिन तब तक पर्वतारोहियों का दल यात्रा पर निकल चुका था। अधिकारियों के अनुसार दल से संपर्क स्थापित नहीं हो सका, इसलिए चेतावनी उन तक नहीं पहुँचाई जा सकी। यह जानकारी पर्वतीय अभियानों में संचार सुविधाओं की उपलब्धता और मौसम की चेतावनियों को वास्तविक समय में यात्रियों तक पहुँचाने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। हालाँकि इस स्तर पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि चेतावनी न पहुँचने के कारण ही दुर्घटना हुई। इसके लिए यात्रा अनुमति, मौसम की स्थिति, संचार व्यवस्था और संबंधित एजेंसी की जिम्मेदारियों की विस्तृत जाँच आवश्यक होगी। 

बेहद दुर्गम है केदारताल का रास्ता, 15 हजार फीट से अधिक ऊँचाई पर स्थित है झील

उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से लगभग 4,720 मीटर, यानी 15,485 फीट की ऊँचाई पर स्थित केदारताल हिमालय की प्रसिद्ध हिमनदीय झीलों में शामिल है। गंगोत्री से लगभग 18 किलोमीटर लंबा पर्वतीय मार्ग केदारगंगा नदी के किनारे ऊँचे पहाड़ों, बर्फीली ढलानों, चट्टानी रास्तों और अस्थिर हिमनदीय मलबे वाले क्षेत्रों से होकर गुजरता है। ऊँचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की उपलब्धता कम होती है और तापमान तेजी से गिर सकता है। भारी बर्फबारी तथा हिमस्खलन के दौरान सामान्यतः पहचाने जाने वाले रास्ते भी ढक जाते हैं। बचावकर्मियों को लगातार बदलते मौसम, बर्फ की गहराई और हिमस्खलन के खतरे के बीच काम करना पड़ता है। यही कारण है कि केदारताल जैसे क्षेत्रों में किसी लापता दल को ढूँढ़ना सामान्य खोज अभियान से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। 

उत्तराखंड में पहले भी हो चुकी हैं ऐसी बड़ी दुर्घटनाएँ

उत्तराखंड के ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में पहले भी भारी बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण पर्वतारोहियों की जान जा चुकी है। अक्टूबर 2021 में हर्षिल के निकट लमखागा दर्रा मार्ग पर प्रतिकूल मौसम के कारण एक पर्वतारोहण दल के सात सदस्यों की मृत्यु हुई थी। इसी महीने बागेश्वर जिले के सुंदरढूंगा ग्लेशियर क्षेत्र में पाँच पर्वतारोहियों की जान गई थी। अक्टूबर 2022 में उत्तरकाशी के द्रौपदी का डांडा-2 क्षेत्र में हिमस्खलन से 27 लोगों की मृत्यु हुई थी। जून 2024 में सहस्त्रताल क्षेत्र में खराब मौसम में फँसे एक दल के पाँच पर्वतारोहियों की मृत्यु हुई और चार लापता हो गए थे। इन घटनाओं ने पर्वतीय पर्यटन में मौसम की चेतावनी, सुरक्षित यात्रा अवधि, संचार उपकरण और आपदा प्रतिक्रिया व्यवस्था की आवश्यकता को बार-बार सामने रखा है। 

तंबू और बैग मिलने से उम्मीद, लेकिन आठों की स्थिति अब भी अज्ञात

सोमवार शाम तक उपलब्ध पुष्ट जानकारी के अनुसार केदारताल क्षेत्र में लापता आठों लोगों का कोई पता नहीं चला था। बचाव दल को उनका सामान मिला है, लेकिन न किसी व्यक्ति के सुरक्षित मिलने की पुष्टि हुई है और न किसी की मृत्यु की। प्रशासन ने प्रतिकूल मौसम के कारण तलाशी अभियान अस्थायी रूप से रोक दिया है। पर्वतीय बचाव दल केदार खड़क क्षेत्र में मौजूद हैं और मौसम अनुकूल होने पर दोबारा खोज शुरू करने की तैयारी है। लापता लोगों के परिवारों की निगाहें अब राहत और बचाव दलों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल केवल आठ लोगों की सुरक्षित वापसी का नहीं, बल्कि ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में पर्वतारोहण की सुरक्षा व्यवस्था का भी है। जब मौसम की चेतावनी मिलने के बाद पर्वतारोहियों तक सूचना पहुँचाने का साधन उपलब्ध नहीं होता, जब कई स्थानों पर हिमस्खलन से रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते हैं और जब बचाव दलों को खुद अपनी सुरक्षा के कारण अभियान रोकना पड़ता है, तब पर्वतीय पर्यटन के लिए अधिक प्रभावी संचार और आपदा प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है। फिलहाल प्रशासन और बचाव दल के सामने सबसे जरूरी काम लापता आठों लोगों का पता लगाना और परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर उन्हें सुरक्षित निकालने का हर संभव प्रयास करना है।

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