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उत्तराखंड में 300 से ज्यादा जलस्रोत सूखने की कगार पर, संरक्षण के लिए बनेगा स्प्रिंग एटलस
Uttarakhand News: उत्तराखंड में स्प्रिंग एटलस तैयार करने के लिए जलस्रोतों की गणना जारी है। अब तक 11 जिलों में 46,358 जलस्रोतों की गणना हो चुकी है।
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Uttarakhand News: उत्तराखंड में प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और उनके पुनर्जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। प्रदेश में जलस्रोतों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए स्प्रिंग एटलस तैयार किया जाएगा। इसके लिए राज्यभर में जलस्रोतों की गणना का अभियान चल रहा है। जनवरी से अब तक 11 जिलों में 46,358 जलस्रोतों की गणना की जा चुकी है। यह अभियान दिसंबर तक जारी रहेगा।
गणना पूरी होने के बाद प्रदेश के प्राकृतिक जलस्रोतों की स्थिति का व्यापक आकलन किया जाएगा। इसके आधार पर उनके संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए जरूरत के अनुसार कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कितने जलस्रोत सक्रिय हैं, कितने सूख चुके हैं और किन स्रोतों में पानी का प्रवाह कम हो रहा है।
300 से ज्यादा जलस्रोत सूखने की कगार पर
उत्तराखंड में प्राकृतिक जलस्रोत पेयजल और स्थानीय जरूरतों को पूरा करने का प्रमुख आधार हैं। हालांकि, प्रदेश के कई क्षेत्रों में जलस्रोतों के सूखने और उनके जलप्रवाह में कमी आने की समस्या सामने आती रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नीति आयोग की पूर्ववर्ती एक रिपोर्ट में भी राज्य के 300 से ज्यादा जलस्रोतों के सूखने या सूखने की कगार पर पहुंचने का उल्लेख किया गया था।
ऐसे में स्प्रिंग एटलस तैयार होने से जलस्रोतों की मौजूदा स्थिति का आकलन करने में मदद मिलेगी। इसके आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा सकेगी, जहां जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए प्राथमिकता से काम करने की जरूरत है। जिन स्रोतों पर सूखने का खतरा अधिक है, उनके लिए विशेष प्रयास किए जा सकेंगे।
दिसंबर तक चलेगा जलस्रोतों की गणना का अभियान
केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के निर्देशों के क्रम में प्रदेश में लघु सिंचाई विभाग के माध्यम से जलस्रोतों की गणना कराई जा रही है। गणना पूरी होने के बाद जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर स्प्रिंग एटलस तैयार किया जाएगा।
लघु सिंचाई विभाग के विभागाध्यक्ष बीके तिवारी के अनुसार, जलस्रोतों की गणना जिलेवार की जा रही है। इस दौरान प्रत्येक स्रोत की भौगोलिक स्थिति, अक्षांश-देशांतर और पानी की उपलब्धता समेत विभिन्न जानकारियां जुटाई जा रही हैं। इसके साथ ही जलस्रोतों की तस्वीरें भी जलशक्ति मंत्रालय के पोर्टल पर अपलोड की जा रही हैं।
उन्होंने बताया कि जो जलस्रोत सूख चुके हैं, उनकी जानकारी भी एकत्र कर पोर्टल पर दर्ज की जा रही है। वर्षाकाल के दौरान गणना का कार्य नहीं हो पाया था। अब हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर समेत प्रदेश के सभी जिलों में यह काम शुरू किया जा रहा है।
अल्मोड़ा में सबसे ज्यादा जलस्रोतों की गणना
अब तक हुई गणना में अल्मोड़ा जिला सबसे आगे है। यहां 10,130 जलस्रोतों की गणना की जा चुकी है। इसके बाद चमोली में 8,714 और चंपावत में 4,593 जलस्रोत दर्ज किए गए हैं।
जिलावार गणना के आंकड़े इस प्रकार हैं:
अल्मोड़ा- 10,130
चमोली- 8,714
चंपावत- 4,593
टिहरी- 4,281
उत्तरकाशी- 4,185
पिथौरागढ़- 3,672
पौड़ी- 3,222
बागेश्वर- 3,058
रुद्रप्रयाग- 2,519
देहरादून- 1,338
नैनीताल- 646
स्प्रिंग एटलस तैयार होने के बाद प्रदेश के प्राकृतिक जलस्रोतों से जुड़े आंकड़ों के आधार पर संरक्षण की प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिलेगी। इससे जलस्रोतों के संरक्षण और भविष्य में जल उपलब्धता बनाए रखने के प्रयासों को दिशा मिल सकेगी।


