चिकन नेक की कमजोरी का तोड़! नॉर्थ-ईस्ट से जुड़ने के लिए इन 4 रास्तों पर काम कर रहा भारत
भारत सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पूर्वोत्तर को जोड़ने वाले कई वैकल्पिक रास्ते तैयार कर रहा है।
Chicken Neck, Northeast India: भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र देश के बाकी हिस्सों से मुख्य रूप से एक बेहद संकरे रास्ते के जरिए जुड़ा है, जिसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर या 'चिकन नेक' कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में मौजूद यह इलाका अपने सबसे संकरे हिस्से में करीब 20 किलोमीटर चौड़ा है। यही वजह है कि इसे भारत की सबसे अहम रणनीतिक कमजोरियों में गिना जाता है।
लेकिन अब भारत सिर्फ इस एक रास्ते पर निर्भर रहने के बजाय कई दूसरे ऑप्शन तैयार करने की कोशिश कर रहा है। मोदी सरकार के दौर में पुराने कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को नई रफ्तार दी गई है और बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल और भूटान के रास्ते सड़क, रेल, नदी और समुद्री कनेक्टिविटी का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।
इन 4 नए विकल्पों पर भारत कर रहा है काम:
1. कालादान प्रोजेक्ट से मिजोरम को वैकल्पिक रास्ता
इस रणनीति में कालादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट काफी अहम है। इसका समझौता 2008 में हुआ था, लेकिन मोदी सरकार के दौरान इसे फिर से गति मिली। मई 2023 में म्यांमार के सित्तवे पोर्ट का उद्घाटन किया गया और पूरे प्रोजेक्ट को 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस रूट के जरिए भारत का पूर्वोत्तर समुद्र के रास्ते म्यांमार से जुड़ सकता है। सामान कोलकाता से समुद्र के रास्ते सित्तवे पहुंचेगा और फिर नदी तथा सड़क के जरिए मिजोरम तक ले जाया जा सकेगा। हालांकि इसकी एक चुनौती भी है। यह पूरा रास्ता म्यांमार की स्थिति पर निर्भर करता है और वहां राजनीतिक व सुरक्षा हालात काफी अस्थिर रहे हैं।
2. त्रिपुरा को बांग्लादेश के रास्ते नई कनेक्टिविटी
भारत ने त्रिपुरा के लिए भी बांग्लादेश के जरिए वैकल्पिक रास्ते तैयार किए हैं। अगरतला-अखौरा रेल लिंक इसका बड़ा उदाहरण है। इसकी शुरुआत से त्रिपुरा को बांग्लादेश के रेल नेटवर्क से सीधा संपर्क मिला है। नवंबर 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बांग्लादेश प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस रेल लिंक का उद्घाटन किया था।
इसके अलावा मैत्री सेतु भी बेहद अहम है। यह पुल त्रिपुरा के सबरूम को बांग्लादेश के रामगढ़ से जोड़ता है। मार्च 2021 में इसका उद्घाटन हुआ था। यह पुल चटगांव पोर्ट से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर है। इन दोनों कनेक्शनों से त्रिपुरा के पास सामान पहुंचाने के लिए एक वैकल्पिक लॉजिस्टिक रास्ता तैयार हुआ है।
3. चटगांव और मोंगला पोर्ट का भी इस्तेमाल
भारत और बांग्लादेश के बीच ऐसे समझौते भी हुए हैं जिनके तहत भारतीय सामान को चटगांव और मोंगला बंदरगाहों के जरिए पूर्वोत्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई है। इस व्यवस्था में समुद्र के साथ-साथ नदी, सड़क और रेल नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी बंगाल की खाड़ी से आने वाला सामान कई माध्यमों के जरिए पूर्वोत्तर तक पहुंच सकता है। संकट के समय ईंधन और दूसरे जरूरी सामान की सप्लाई के लिए यह व्यवस्था काफी अहम हो सकती है।
4. म्यांमार के रास्ते दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ने की कोशिश
भारत की योजना सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। India-Myanmar-Thailand Trilateral Highway के जरिए पूर्वोत्तर को म्यांमार और आगे थाईलैंड से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। इस प्रोजेक्ट का विचार 2002 में सामने आया था, लेकिन 2014 के बाद मोदी सरकार की Act East Policy के तहत इसे फिर गति मिली।
अगर यह नेटवर्क पूरी तरह तैयार होता है तो पूर्वोत्तर सिर्फ भारत के बाकी हिस्सों से जुड़ा इलाका नहीं रहेगा, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंचने का रास्ता भी बन सकता है।
क्या खत्म हो जाएगी 'चिकन नेक' की अहमियत?
ऐसा नहीं है कि इन नए रास्तों के बनने से सिलीगुड़ी कॉरिडोर की अहमियत खत्म हो जाएगी। बड़े पैमाने पर सैन्य आवाजाही और कई जरूरी लॉजिस्टिक जरूरतों के लिए यह रास्ता अब भी बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। लेकिन फर्क यह होगा कि किसी संकट की स्थिति में भारत के पास दूसरे विकल्प भी होंगे।