खेला तो अब शुरू हुआ है! विजय सिन्हा बहाना, सवर्णों पर निशाना? BJP के भीतर मची खलबली

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की सुरक्षा में कटौती ने नए राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। उनकी सुरक्षा श्रेणी को Z प्लस से घटाकर Z किए जाने के फैसले के बाद कई सवाल उठने लगे हैं।

Update:2026-04-19 11:08 IST

Vijay Kumar Sinha

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की सुरक्षा में कटौती ने नए राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। उनकी सुरक्षा श्रेणी को Z प्लस से घटाकर Z किए जाने के फैसले के बाद कई सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या यह फैसला केवल प्रोटोकॉल के तहत लिया गया है या इसके पीछे कोई राजनीतिक कारण छिपा है।

राज्य के गृह विभाग का कहना है कि सुरक्षा पद के अनुसार दी जाती है और चूंकि अब विजय कुमार सिन्हा उपमुख्यमंत्री नहीं हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा श्रेणी कम की गई है। हालांकि, विपक्ष और कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे सामान्य प्रशासनिक फैसला मानने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि यह कदम मौजूदा सत्ता समीकरणों और नीतीश कुमार के प्रभाव से जुड़ा हो सकता है। दरअसल, विजय कुमार सिन्हा और नीतीश कुमार के बीच टकराव का इतिहास भी रहा है। मार्च 2022 में, जब सिन्हा विधानसभा अध्यक्ष थे, तब सदन में एक डीएसपी से जुड़े मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस हुई थी। उस दौरान नीतीश कुमार ने सदन में आकर कड़ी नाराजगी जताई थी और संवैधानिक सीमाओं का हवाला देते हुए स्पीकर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। इस घटना ने उस समय भी राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया था और विपक्ष ने इसे सदन के आसन का अपमान बताया था।

विजय कुमार सिन्हा के आक्रामक स्वभाव को लेकर भी पार्टी के भीतर चर्चा होती रही है। कई मौकों पर उनका सख्त रवैया सामने आया, जिससे सहयोगी नेताओं के साथ मतभेद भी देखने को मिले। उदाहरण के तौर पर, एक बार सदन में ऑनलाइन जवाब को लेकर उनकी तीखी बहस सम्राट चौधरी से भी हुई थी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा की रणनीति में भी बदलाव आया है। अब पार्टी का फोकस पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग पर अधिक केंद्रित होता दिख रहा है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सवर्ण नेतृत्व की भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि मुख्यमंत्री पद मिलने की स्थिति में भी पार्टी पिछड़े वर्ग के नेता को प्राथमिकता दे सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार भाजपा के अंदरूनी समीकरणों और भविष्य की रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में संगठनात्मक चुनाव और राजनीतिक फैसले इस दिशा को और स्पष्ट कर सकते हैं।

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