Rishika Jain Story: नौ लाख रुपये के सालाना पैकेज को छोड़ वैराग्य की राह पर चलीं इंजीनियर ऋषिका
Rishika Jain Story: मध्यप्रदेश के दमोह की 27 वर्षीय इंजीनियर ऋषिका जैन ने नौ लाख रुपये सालाना पैकेज का नौकरी प्रस्ताव छोड़कर आध्यात्मिक जीवन चुना। बड़ौत में जैन संतों के सानिध्य में साधना के साथ वह जैन दर्शन में पीएचडी भी कर रही हैं।
Rishika Jain Story (Image Credit-Social Media)
बड़ौत, 19 अक्टूबर 2026। आज जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद युवा बेहतर नौकरी और आकर्षक वेतन पाने की कोशिश करते हैं, तब मध्यप्रदेश के दमोह की 27 वर्षीय ऋषिका जैन ने अलग राह चुनी है। सूचना प्रौद्योगिकी में बीटेक करने के बाद उन्हें जबलपुर की एक कंपनी से नौ लाख रुपये सालाना पैकेज का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने नौकरी स्वीकार करने के बजाय आध्यात्मिक जीवन को प्राथमिकता दी। पिछले दो महीने से वह बड़ौत के अजितनाथ सभागार में जैन संतों के सानिध्य में ब्रह्मचर्य जीवन बिता रही हैं।
शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखती हैं ऋषिका
ऋषिका का परिवार शिक्षित और संपन्न है। उनके पिता राजेश जैन व्यापारी हैं, जबकि उनके भाई रोहित, सचल और शोभित जैन तथा भाभियां शेफाली और ऋजुता जैन भी इंजीनियरिंग क्षेत्र से जुड़ी हैं। परिवार ने उनके निर्णय का विरोध करने के बजाय उसका सम्मान किया और उनका उत्साह बढ़ाया। ऋषिका ने वर्ष 2022 में जबलपुर के राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज से सूचना प्रौद्योगिकी में बीटेक पूरा किया था। पढ़ाई के बाद नौकरी का अवसर मिलने के बावजूद उन्होंने अपने लिए आध्यात्मिक साधना का मार्ग चुना।
आध्यात्मिक साधना के साथ जैन दर्शन में पीएचडी
ऋषिका का जीवन अब केवल साधना तक सीमित नहीं है। वह दमोह स्थित एकलव्य यूनिवर्सिटी से जैन दर्शन में पीएचडी कर रही हैं और अपनी थीसिस लिख रही हैं। इंजीनियरिंग की तकनीकी शिक्षा के बाद दर्शनशास्त्र के अध्ययन की ओर उनका रुख उनके जीवन में आए बदलाव को दर्शाता है। उनके निर्णय को समझने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वह शिक्षा से नाता तोड़कर नहीं, बल्कि एक अलग बौद्धिक और आध्यात्मिक दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
व्यक्तिगत आस्था और जीवन-दृष्टि से जुड़ा निर्णय
ऋषिका के बारे में उपलब्ध जानकारी उनके परिवार, शिक्षा, नौकरी के प्रस्ताव और वर्तमान जीवनचर्या तक सीमित है। उन्होंने वैराग्य चुनने के पीछे अपने विचारों और अनुभवों को विस्तार से सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया है। इसलिए उनके निर्णय को केवल नौकरी छोड़ने या वेतन ठुकराने की घटना के रूप में देखने के बजाय व्यक्तिगत आस्था और जीवन-दृष्टि से जुड़ा चुनाव समझना अधिक उचित होगा। उनके परिवार का समर्थन भी बताता है कि यह फैसला उनके निकटजनों के बीच स्वीकार किया गया है।
नौकरी के अवसर से अलग साधना और अध्ययन को प्राथमिकता
ऋषिका की कहानी एक ऐसे युवा के जीवन-चयन को सामने लाती है, जिसने पेशेवर अवसरों के बीच अपने लिए आध्यात्मिक अध्ययन और साधना का रास्ता चुना। नौ लाख रुपये के पैकेज का प्रस्ताव इस बदलाव को समाचार का आकर्षक पहलू बनाता है, लेकिन उनके वर्तमान जीवन का केंद्र जैन दर्शन का अध्ययन और संतों के सानिध्य में बिताया जा रहा समय है।