SIR Form 6: फॉर्म 6 में बदलाव पर दो चुनाव आयुक्तों ने क्यों जताई आपत्ति? SIR से जुड़ा पूरा विवाद

SIR Form 6: एसआईआर से जुड़े फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने आपत्ति क्यों जताई? जानिए फॉर्म 6 में किए गए बदलाव, कानूनी आधार और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की पूरी कहानी।

Update:2026-09-23 19:31 IST

SIR Form 6: भारत चुनाव आयोग के भीतर गम्भीर मतभेदों की खबर सामने आई है। इन मतभेदों में एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का मसला प्रमुख रूप से शामिल हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़े सवाल जोड़ने को लेकर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने अलग-अलग समय पर आपत्ति दर्ज कराई थी। दोनों का कहना था कि फॉर्म 6 कानून के तहत तय किया गया फॉर्म है और इसमें बदलाव चुनाव आयोग अपने स्तर पर नहीं कर सकता। इसके लिए निर्वाचन संबंधी नियमों में संशोधन और केंद्र सरकार की मंजूरी जरूरी है।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को हटाने और मूल फॉर्म को बहाल करने की बात कही थी। संधू ने अगस्त में अधिकारियों को लिखे एक पत्र में पोर्टल पर किए गए बदलाव को 'अनधिकृत और अवैध' बताया और कहा कि इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए, ताकि पात्र युवा और पहली बार वोट देने वाले लोग बिना किसी परेशानी के कानून के मुताबिक मतदाता के रूप में अपना पंजीकरण करा सकें।

फॉर्म 6 में आखिर क्या बदला गया?

फॉर्म 6 वह आवेदन पत्र है जिसके जरिए कोई व्यक्ति पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। इस साल इसमें एसआईआर से संबंधित एक नया हिस्सा जोड़ा गया। इसके तहत नए मतदाता से यह बताने को कहा गया कि उसका या उसके परिवार के किसी सदस्य का नाम पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान तैयार मतदाता सूची में था या नहीं।

नए सवाल में आवेदक को तीन विकल्पों में से एक चुनना था। पहला, उसका अपना नाम पिछली एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में था। दूसरा, उसके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस सूची में था। तीसरा, न तो उसका नाम और न ही उसके माता-पिता का नाम उस सूची में था।

कागज पर इस हिस्से को अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन व्यवहार में आवेदक इस सवाल का जवाब दिए बिना फॉर्म आगे बढ़ाकर जमा नहीं कर सकता था। यही बात इस बदलाव को लेकर उठे सवालों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

दो चुनाव आयुक्तों ने क्यों जताई आपत्ति?

मामला मई में चुनाव आयोग के सामने आया था। 16 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने एसआईआर के तहत फॉर्म 6 में बदलाव के प्रस्ताव पर अपनी आपत्ति दर्ज की। उनके अनुसार एसआईआर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 21(3) के तहत कराई जा रही थी। इस प्रावधान के तहत चुनाव आयोग मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराने का आदेश दे सकता है।

जोशी ने अपने नोट में यह भी कहा कि एसआईआर के लिए बनाए गए फॉर्म इस विशेष प्रक्रिया के लिए तैयार किए गए थे और उनका आधार वैधानिक नियम नहीं था। लेकिन फॉर्म 6 और फॉर्म 8 की स्थिति अलग है। फॉर्म 6 नए मतदाता के पंजीकरण के लिए और फॉर्म 8 मतदाता सूची में बदलाव या सुधार के लिए इस्तेमाल होता है। ये दोनों फॉर्म चुनाव संबंधी नियमों में निर्धारित हैं।

उनका तर्क था कि इन वैधानिक फॉर्म में बदलाव केवल किसी एसआईआर आदेश या दिशा-निर्देश के जरिए नहीं किया जा सकता। इसके लिए पंजीकरण नियम, 1960 में बाकायदा संशोधन करना होगा।

जोशी ने यह भी कहा कि कानूनी रूप से सुरक्षित रास्ता यही होगा कि फॉर्म में बदलाव का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाए और नियमों में जरूरी संशोधन कराया जाए। उन्होंने फॉर्म 6 और फॉर्म 8 में प्रस्तावित बदलाव का मसौदा भी तुरंत आयोग के सामने रखने का सुझाव दिया।

19 मई को संधू ने भी सहमति जताई

तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में विवेक जोशी के बाद चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी 19 मई को उनके विचार से सहमति जताई। यानी उस समय आयोग के तीन में से दो सदस्यों ने रिकॉर्ड पर यह राय दर्ज की थी कि फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़ा बदलाव सीधे आयोग के स्तर पर नहीं किया जा सकता।

इसके बावजूद बाद में चुनाव आयोग के ईसीआईनेट पोर्टल पर बदला हुआ फॉर्म 6 दिखाई देने लगा।

इसके बाद 13 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस मुद्दे पर अधिकारियों को पत्र लिखा।

संधू ने फिर उठाया वही सवाल

13 अगस्त के पत्र में संधू ने मई में विवेक जोशी की ओर से दर्ज की गई आपत्ति का हवाला दिया। उन्होंने याद दिलाया कि फॉर्म 6 कानून के तहत तय फॉर्म है और इसमें बदलाव सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकता।

संधू ने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की स्पष्ट राय के बावजूद पोर्टल पर फॉर्म 6 में किए गए बदलाव हटाए नहीं गए हैं और मूल फॉर्म को बहाल नहीं किया गया है।

उन्होंने इस बदलाव को 'अनधिकृत और अवैध' बताते हुए इसे तुरंत हटाने की मांग की। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए जरूरी है ताकि वे युवा और पहली बार मतदाता बनने वाले लोग, जो कानून के मुताबिक पात्र हैं, बिना किसी परेशानी के अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज करा सकें।

यानी आयोग के एक सदस्य ने अपने ही संस्थान के पोर्टल पर मौजूद बदलाव को लेकर स्पष्ट आपत्ति दर्ज की थी।

नए मतदाताओं पर इसका असर क्यों महत्वपूर्ण है?

फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़ा यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मतदान का अधिकार व्यक्ति की अपनी पात्रता पर निर्भर करता है। इसके लिए उसकी उम्र, भारतीय नागरिकता और संबंधित क्षेत्र में निवास जैसी कानूनी शर्तें देखी जाती हैं। किसी व्यक्ति का मतदाता बनने का अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली मतदाता सूची में था या नहीं।

मान लीजिए कोई युवक 18 साल की उम्र में पहली बार मतदाता बनने के लिए आवेदन करता है। उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में नहीं था। ऐसे मामले में उसके सामने दिए गए पहले दो विकल्प लागू नहीं होते। उसे तीसरा विकल्प चुनना पड़ेगा, लेकिन इस विकल्प को चुनने के बाद उसके आवेदन पर आगे क्या प्रक्रिया होगी, इसकी स्पष्ट जानकारी फॉर्म में नहीं दी गई थी।

इससे यह सवाल उठता है कि पहली बार मतदाता बनने वाले व्यक्ति को अपने माता-पिता के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से क्यों जोड़ना चाहिए और उसके आवेदन के मूल्यांकन पर इसका क्या असर पड़ेगा।

पहले भी फॉर्म 6 में बदलाव ऐसे ही नहीं हुआ था

इस पूरे मामले में वर्ष 2022 का एक उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। 2021 में संसद ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 में संशोधन किया था। इसके बाद मतदाताओं से आधार संख्या जैसी जानकारी लेने के लिए कानूनी व्यवस्था में बदलाव किया गया।

लेकिन उस समय फॉर्म 6 में बदलाव चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर सीधे नहीं कर दिया था। 17 जून 2022 को कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने पंजीकरण नियमों में जरूरी बदलाव अधिसूचित किए। इसके बाद फॉर्म 6 में भी संबंधित परिवर्तन किए गए।

यानी उस मामले में पहले कानून और नियमों में जरूरी बदलाव हुआ और उसके बाद निर्धारित फॉर्म में संशोधन किया गया। यही उदाहरण इस साल एसआईआर से जुड़े बदलाव को लेकर उठी आपत्तियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है।

असली विवाद सिर्फ एक सवाल का नहीं

फॉर्म 6 में जोड़ा गया सवाल देखने में छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे चुनावी कानून और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा बड़ा सवाल है। यदि किसी फॉर्म को कानून या नियमों के तहत निर्धारित किया गया है, तो क्या आयोग अपने प्रशासनिक आदेश या दिशा-निर्देश के जरिए उसमें बदलाव कर सकता है? या इसके लिए पहले संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी है? विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की दर्ज आपत्तियों का केंद्र यही सवाल था।

पहली बार वोट देने वालों के लिए क्यों अहम है फॉर्म 6?

देश में हर चुनाव के साथ बड़ी संख्या में युवा 18 वर्ष की उम्र पूरी करके पहली बार मतदाता बनते हैं। उनके लिए फॉर्म 6 मतदाता बनने की प्रक्रिया का शुरुआती और जरूरी दस्तावेज है।

ऐसे में फॉर्म को सरल और स्पष्ट रखना महत्वपूर्ण है। यदि किसी नए मतदाता से उसके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड के बारे में ऐसी जानकारी मांगी जाती है, जिसका उसके अपने मतदाता बनने के अधिकार से सीधा संबंध स्पष्ट नहीं है, तो उसके लिए यह जानना जरूरी है कि यह जानकारी क्यों मांगी जा रही है और इसका आवेदन पर क्या असर पड़ेगा।

यही वजह है कि संधू ने अपने पत्र में खास तौर पर युवा और पहली बार वोट देने वाले लोगों का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि जो लोग कानून के अनुसार पात्र हैं, उन्हें बिना परेशानी के मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने का अवसर मिलना चाहिए।

फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़े इस बदलाव का कानूनी आधार क्या था और जब आयोग के दो सदस्यों ने पहले ही इस पर आपत्ति दर्ज कर दी थी, तब इसे पोर्टल से हटाने की मांग पर आगे क्या कार्रवाई हुई।

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