दो बिस्कुट का कर्ज और वफादारी का 'एंटीना': हमारे बेजुबान पहरेदारों की अनसुनी दास्तां

International Guide Dog Day: दो बिस्कुट का कर्ज और जान की बाजी: इलाहाबाद के 'चेतक' से लेकर बनारस की 'कुत्तों की पंगत' तक, जानिए इन बेजुबान पहरेदारों की वफादारी की वह दास्तां जो दिल छू लेगी।

Update:2026-04-28 17:40 IST

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29 अप्रैल को 'इंटरराष्ट्रीय गाइड डॉग डे' है। यह दिन उन बेजुबानों के सम्मान का है जो किसी की आँखें बनते हैं, लेकिन हमारे समाज में एक ऐसा तबका भी है जो बिना किसी ट्रेनिंग के हमारी गलियों और घरों का 'अघोषित रक्षक' बना हुआ है। कुत्ता दुनिया का एकमात्र ऐसा जीव है जो मात्र दो बिस्कुट के निवेश पर अपना सर्वस्व आपके नाम कर देता है। जिसे हम 'स्ट्रीट डॉग' कहते हैं, वह असल में हमारा सबसे ईमानदार और बिना वेतन का 'वॉचमैन' है।

1. चेतक: वह रक्षक जिसने 'काटा' नहीं, 'संभाला'

मुझे अपना एक व्यक्तिगत संस्मरण याद आता है। मेरे जन्म के समय इलाहाबाद में एक आवारा कुत्ता हमारे घर की देहली पर आ बसा था। मेरी माताजी ने उसे नाम दिया था—'चेतक'। वह केवल घर का पहरेदार नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य बन गया था। एक दिन जब अम्मा मुझे लिटाकर घर के अंदर गईं और चेतक को 'देखते रहने' की जिम्मेदारी सौंपी, तब एक अपरिचित महिला ने मुझे उठाने की कोशिश की। चेतक ने तुरंत झपटकर उसका हाथ पकड़ लिया। लेकिन उसकी समझदारी देखिए—उसने 'काटा' नहीं, सिर्फ मुँह में दबाकर उसे 'रोका' था। बिना किसी ट्रेनिंग के एक 'आवारा' कुत्ते में यह बोध होना कि कब और कितनी ताकत का इस्तेमाल करना है, उसकी अद्भुत बुद्धिमत्ता और वफादारी का प्रमाण है।

2. डॉ. डेविड और बनारस की वह 'पंगत'

बनारस की शास्त्रीनगर कॉलोनी के डॉ. डेविड का संस्मरण रोंगटे खड़े कर देता है। रात के ढाई बजे, जब पूरी दुनिया सोती थी, वह स्टेशन से कॉलोनी तक कुत्तों को दूध और ब्रेड खिलाते हुए आते थे। उस समय जो दृश्य दिखता था, वह किसी अनुशासित सेना की पंगत जैसा था। कुत्ते बिना किसी शोर या झगड़े के अपनी बारी का इंतजार करते थे। यह अनुशासन भय से नहीं, बल्कि उस 'पुचकार' और 'निवाले' के अहसान से पैदा हुआ था। डॉ. डेविड उन बीमार और लंगड़ाते कुत्तों का इलाज भी करते थे, जिन्हें समाज ने दुत्कार दिया था।

3. गाँवों की चौखट और 'देसी' रक्षकों की वीरता

गाँव के बुजुर्ग अक्सर सुनाते हैं कि कैसे घर की 'जूठन' पर पलने वाले कुत्तों की टोली पूरे कुनबे की ढाल बनी रहती थी। डकैतों के हमले हों या जंगली जानवरों की घुसपैठ, ये देसी कुत्ते अपनी जान की परवाह किए बिना भिड़ जाते थे। बदमाशों को गाँव की सरहद से खदेड़ना और परिवार की अनहोनी से रक्षा करना इनका 'धर्म' था। इन्होंने उस 'नमक' का हक अपनी जान जोखिम में डालकर अदा किया।

4. वफादारी का वह 'एंटीना' और हमारी बेरहमी

कुत्ता जंगली जानवर नहीं, वह पूरी तरह से मानव-आश्रित है। वह आपके दो पैरों के साथ अपनी चार टांगों का तालमेल बिठाकर चलना चाहता है। जब आप उसे एक बार बिस्कुट खिला देते हैं, तो वह आपकी तस्वीर अपने जेहन में उतार लेता है और अगली बार देखते ही प्रेम के 'इजहार रूपी एंटीना' (पूँछ) को हिलाते हुए आपसे लिपटने की कोशिश करता है। विडंबना यह है कि रात भर जागकर पहरेदारी करने वाले इन जीवों को हम सुबह पत्थर मारकर भगाते हैं, उन्हें विकलांग कर देते हैं, फिर भी वे हमारा मोह नहीं छोड़ पाते।

एक सवाल

क्या एक वक्त के भोजन के लिए कोई इंसान अपनी आजादी और अनुशासन इस तरह किसी के चरणों में रख सकता है? अगर नहीं, तो इन 'लालू, कालू और चेतक' को कमतर समझने की भूल हमें नहीं करनी चाहिए। कल का दिन केवल प्रशिक्षित कुत्तों का नहीं, बल्कि हर उस 'देसी वॉचमैन' का है जो हमारी एक पुचकार पर अपनी जान देने को तैयार खड़ा है।

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