पंजाब में बिजली संकट से हाहाकार, सड़कों पर किसान; हाईवे जाम, धान की फसल पर मंडराया खतरा
Punjab Power Crisis: पंजाब में बिजली संकट गहराने से किसान और उद्योग परेशान हैं। 16,519 MW की पीक डिमांड के बीच मोगा में किसानों ने हाईवे जाम कर प्रदर्शन किया।
Punjab Power Crisis: पंजाब में बिजली संकट लगातार गहराता जा रहा है। बढ़ती मांग, थर्मल पावर प्लांटों की यूनिटों में तकनीकी खराबी और निजी बिजली संयंत्रों में कम कोयला स्टॉक ने राज्य की बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। हालात का असर उद्योग, घरेलू उपभोक्ताओं और किसानों—तीनों पर दिखाई दे रहा है। बिजली की अनियमित आपूर्ति से नाराज किसान कई जिलों में सड़कों पर उतर आए हैं और हाईवे तक जाम कर दिए हैं।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में बिजली की मांग 16,000 मेगावाट के पार बनी हुई है और शनिवार को यह करीब 16,619 मेगावाट तक पहुंच गई। यह सामान्य सितंबर की तुलना में असामान्य रूप से ज्यादा मांग है। अधिकारियों के मुताबिक गर्मी, कम बारिश और धान की सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों पर बढ़ती निर्भरता बिजली की मांग को लगातार ऊंचा बनाए हुए है।
किसानों का गुस्सा, कई जगह सड़कें जाम
बिजली की पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिलने से धान की फसल को लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है। मोगा, बठिंडा, मानसा, बरनाला और फरीदकोट समेत कई जिलों में किसानों ने प्रदर्शन किया है। किसानों की मुख्य मांग है कि कृषि क्षेत्र को वादे के मुताबिक रोजाना 8 घंटे निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जाए।
मोगा में किसानों ने बाघापुराना मुख्य चौक, निहाल सिंह वाला चौक, अजीतवाल में फिरोजपुर-लुधियाना रोड, धर्मकोट के कडियाल पावर ग्रिड और समालसर के पास मोगा-कोटकपूरा रोड पर प्रदर्शन किया। इससे कई प्रमुख मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ। इससे पहले बठिंडा-फरीदकोट नेशनल हाईवे और बाघापुराना-कोटकपूरा रोड पर भी किसानों ने रास्ता रोका था।
किसानों का कहना है कि धान की फसल इस समय सिंचाई के लिए बेहद संवेदनशील दौर में है। बिजली के लंबे और अनियमित कटों के कारण ट्यूबवेल नहीं चल पा रहे हैं। उनका आरोप है कि 8 घंटे बिजली देने के सरकारी दावे के बावजूद कई इलाकों में वास्तविक आपूर्ति इससे काफी कम है।
'8 घंटे की जगह सिर्फ एक घंटे बिजली'
मोगा के किसानों ने आरोप लगाया कि उन्हें कृषि कनेक्शन पर 8 घंटे बिजली देने का आश्वासन मिला था, लेकिन कई जगह केवल एक घंटे के आसपास ही सप्लाई मिल रही है। इससे खेतों में खड़ी धान की फसल सूखने का खतरा पैदा हो गया है।
किसानों के मुताबिक एक एकड़ धान की फसल तैयार करने में बीज, जुताई, मजदूरी, खाद, कीटनाशक और सिंचाई समेत बड़ा खर्च हो चुका है। अगर समय पर पानी नहीं मिला तो फसल को नुकसान होने के साथ उनकी पूरी लागत डूबने का खतरा है।
बीकेयू (एकता उगराहां) समेत विभिन्न किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर बिजली आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। पंजाब में इससे पहले भी बिजली आपूर्ति को लेकर किसानों ने पावर ग्रिड और सड़कों पर प्रदर्शन किया है।
उद्योगों पर भी बिजली कटौती की मार
किसानों के साथ पंजाब का औद्योगिक क्षेत्र भी बिजली संकट से बुरी तरह प्रभावित है। लुधियाना, जालंधर, अमृतसर, मोहाली और राजपुरा जैसे औद्योगिक केंद्रों में उद्योगों को लंबे पावर कट का सामना करना पड़ रहा है।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक कुछ श्रेणी-2 और श्रेणी-3 औद्योगिक इकाइयों के लिए बिजली कटौती बढ़कर 12 से 14 घंटे तक पहुंच गई। शनिवार शाम करीब 4:30 बजे से रविवार सुबह 6 बजे तक कई औद्योगिक इलाकों में सप्लाई बंद रहने से उत्पादन प्रभावित हुआ। घरेलू उपभोक्ताओं को भी कई इलाकों में रोजाना 4-5 घंटे तक अघोषित कटौती झेलनी पड़ रही है।
मोहाली के उद्योगपतियों का कहना है कि बिजली कटौती के कारण उत्पादन और डिलीवरी का शेड्यूल बिगड़ रहा है। कई इकाइयां महंगे डीजल जनरेटर का सहारा लेने को मजबूर हैं। जालंधर में लंबे कट से परेशान लोगों ने सोढल चौक पर प्रदर्शन कर PSPCL के खिलाफ नारेबाजी भी की।
बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर क्यों?
पंजाब में इस समय बिजली संकट की सबसे बड़ी वजह मांग और उपलब्ध उत्पादन के बीच बढ़ता अंतर है। सितंबर में भी तापमान सामान्य से ज्यादा रहने और बारिश की कमी के कारण बिजली की खपत ऊंची बनी हुई है। वहीं धान की फसल के लिए ट्यूबवेल चलने से कृषि क्षेत्र की मांग भी बढ़ी है।
पंजाब की मांग पिछले साल की तुलना में कई हजार मेगावाट ज्यादा चल रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा सितंबर में मांग पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 4,000 MW अधिक है।
1,900 MW से ज्यादा उत्पादन क्षमता प्रभावित
संकट को और गंभीर बना रही है बिजली उत्पादन इकाइयों की बंदी। हाल के दिनों में तलवंडी साबो पावर प्लांट की 660 MW यूनिट और नाभा पावर के राजपुरा प्लांट की 700 MW यूनिट बंद रही हैं। तकनीकी खराबी के कारण कुछ सरकारी थर्मल यूनिट भी प्रभावित हुईं।
10 सितंबर को एक साथ कई यूनिटों के ट्रिप होने से 2,000 MW से अधिक उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई थी। PSPCL के मुताबिक बाद में कुछ यूनिटों को दोबारा चालू किया गया, लेकिन निजी प्लांटों की यूनिटों के बंद रहने और कोयला स्टॉक की समस्या ने संकट को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया।
निजी प्लांटों में कोयले का संकट
पंजाब के निजी थर्मल पावर प्लांटों में कोयले का स्टॉक भी चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ प्लांटों में स्टॉक बेहद कम स्तर तक पहुंच गया था, जिससे उत्पादन प्रभावित हुआ।
हालांकि इस मुद्दे पर केंद्र और पंजाब सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। पंजाब सरकार की ओर से कोयले की उपलब्धता को बिजली संकट की प्रमुख वजह बताया जा रहा है, जबकि केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि पंजाब के पावर प्लांटों के लिए पर्याप्त कोयला उपलब्ध कराया गया है और केंद्र ने निजी बिजली संयंत्रों तक कोयला पहुंचाने के लिए कदम उठाए हैं।
PSPCL ने निजी बिजली उत्पादकों को निर्धारित कोयला स्टॉक बनाए रखने में कमी को लेकर नोटिस भी जारी किए हैं। संकट से निपटने के लिए पंजाब के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक की तैयारी है।
पंजाब को ग्रिड से खरीदनी पड़ रही ज्यादा बिजली
राज्य में अपनी उत्पादन क्षमता कम होने के कारण PSPCL को उत्तरी ग्रिड से बड़ी मात्रा में बिजली खरीदनी पड़ रही है। एक समय राज्य निर्धारित आवंटन से ज्यादा बिजली ग्रिड से खींच रहा था। अधिकारियों के मुताबिक यह स्थिति तब बनी जब मांग 16,000 MW से ऊपर बनी रही और कई उत्पादन इकाइयां उपलब्ध नहीं थीं।
यानी पंजाब के सामने इस समय दोहरी चुनौती है कि एक तरफ रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची मांग और दूसरी तरफ सीमित घरेलू उत्पादन।
बिजली मंत्री बोले- राष्ट्रीय स्तर का कोयला संकट
पंजाब के बिजली मंत्री तरुणप्रीत सिंह सौंद ने मौजूदा स्थिति को राष्ट्रीय स्तर की कोयला समस्या से जोड़ते हुए कहा है कि देश के कई निजी बिजली संयंत्र बेहद कम कोयला स्टॉक पर चल रहे हैं। उन्होंने केंद्र से पंजाब के हिस्से की अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराने की मांग की है और दावा किया है कि बंद यूनिटों को जल्द से जल्द बहाल करने की कोशिश की जा रही है।
दूसरी ओर, विपक्ष ने बिजली संकट को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार पर हमला तेज कर दिया है। शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और बीजेपी नेताओं ने कृषि, घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं को हो रही परेशानी को लेकर सरकार से जवाब मांगा है। बीजेपी ने इसे सरकार के बिजली संबंधी दावों की विफलता बताया है।
AAP की ओर से केंद्र पर पर्याप्त कोयला उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाया गया है, जबकि केंद्र का कहना है कि पंजाब के पावर प्लांटों के लिए कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है।
अब सबसे बड़ी चुनौती धान की फसल बचाने की
पंजाब के बिजली संकट का सबसे तत्काल असर कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। धान की फसल के महत्वपूर्ण चरण में खेतों को लगातार पानी की जरूरत है। अगर बिजली कटौती इसी तरह जारी रही तो ट्यूबवेल आधारित सिंचाई प्रभावित होगी और किसानों को फसल खराब होने का खतरा बढ़ेगा।
वहीं उद्योगों के लंबे शटडाउन से उत्पादन और सप्लाई चेन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में सरकार के सामने एक साथ तीन मोर्चों: कृषि, उद्योग और घरेलू बिजली आपूर्ति- को संभालने की चुनौती है।
फिलहाल पंजाब सरकार की नजर बंद पड़ी बिजली उत्पादन इकाइयों को जल्द चालू कराने, अतिरिक्त बिजली खरीदने और कोयला आपूर्ति को सामान्य करने पर है। लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक खेतों में निर्धारित 8 घंटे बिजली नहीं पहुंचती, तब तक सिर्फ सरकारी आश्वासन से संकट दूर नहीं होगा।