Shiv Sena Crisis: उद्धव ठाकरे को छोड़ शिंदे गुट में क्यों गए? शिवसेना के पहले बागी सांसद ने बताई असली वजह
Shiv Sena Crisis: शिवसेना (यूबीटी) के सांसद नागेश अष्टीकर ने एकनाथ शिंदे गुट में शामिल होने की पुष्टि कर दी है। उन्होंने विकास कार्यों और फंड की कमी को वजह बताया। उद्धव ठाकरे से नाराजगी से इनकार करते हुए कहा कि विचारधारा नहीं बदली। अब ओमप्रकाश राजे निंबालकर के फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं।
Shiv Sena Crisis: शिवसेना (यूबीटी) के सांसद नागेश अष्टीकर ने अब खुलकर बता दिया है कि वह एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना के साथ जुड़ने वाले हैं। रविवार को सार्वजनिक तौर पर उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी। उनके इस कदम ने महाराष्ट्र की राजनीति में फिर से हलचल तेज कर दी है, खासकर इसलिए क्योंकि जिन छह सांसदों के बागी होने की अटकलें थीं, उनमें से अष्टीकर ने सबसे पहले सामने आकर अपनी स्थिति साफ की है। 2022 की टूट के बाद उद्धव गुट के लिए यह एक और बड़ा राजनीतिक संकट माना जा रहा है।
पाला बदलने की मुख्य वजह
अपने इस बड़े फैसले के पीछे अष्टीकर ने किसी तरह की व्यक्तिगत नाराजगी को कारण नहीं बताया है। उनका कहना है कि उनके इलाके में विकास के कई अहम काम अटके पड़े थे। सरकार की तरफ से जरूरी फंड नहीं मिल पा रहा था, जिससे जनता को परेशानी हो रही थी। अष्टीकर के मुताबिक, अपने समर्थकों और क्षेत्र के लोगों के हित में उन्हें सत्ता पक्ष के साथ जाने का यह कदम उठाना ही पड़ा। उनका मानना है कि बिना सत्ता के लोगों के रुके हुए काम करवाना काफी मुश्किल हो गया था।
उद्धव ठाकरे से कोई गिला-शिकवा नहीं
अपनी पुरानी पार्टी और नेताओं के प्रति सम्मान जताते हुए अष्टीकर ने स्पष्ट किया कि उन्हें उद्धव ठाकरे से कोई शिकायत या नाराजगी नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कहा कि पार्टी नेता संजय राउत उनके लिए पिता समान हैं और वे उनके इस फैसले से खफा नहीं हैं। वैचारिक बदलाव के सवालों पर भी उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी विचारधारा बिल्कुल नहीं छोड़ी है; वह बस एक शिवसेना से निकलकर दूसरी शिवसेना में जा रहे हैं, इसलिए उनकी मूल राजनीतिक पहचान पहले जैसी ही रहेगी।
निंबालकर के फैसले पर टिकी निगाहें
इधर, बागी माने जा रहे एक अन्य सांसद ओमप्रकाश राजे निंबालकर ने फिलहाल जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया है। रविवार को उन्होंने कहा कि वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कोई भी कदम उठाने से पहले अपने संसदीय क्षेत्र की जनता के बीच जाएंगे। समर्थकों से विस्तार से राय-मशविरा करने के बाद ही वह तय करेंगे कि उन्हें क्या करना है। इस बीच, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को अब भी पूरी उम्मीद है कि निंबालकर पार्टी का साथ नहीं छोड़ेंगे।