TMC Revolt: भतीजे Abhishek Banerjee के अहंकार ने डुबोई TMC? Mamata Banerjee की पार्टी में बगावत की अंदरूनी कहानी
TMC Revolt: तृणमूल कांग्रेस गंभीर अंदरूनी संकट का सामना कर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के केंद्र में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी बताए जा रहे हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने उन पर अहंकारी रवैया, भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने और चुनावी रणनीतिकार आई-पैक पर अत्यधिक निर्भरता जैसे आरोप लगाए हैं। इन्हीं कारणों को आधार बनाकर पार्टी के कई बड़े नेता लगातार टीएमसी से दूरी बना रहे हैं।
TMC Revolt: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस वक्त भारी उथल-पुथल मची हुई है। अपनी स्थापना के पच्चीस वर्षों में तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है। इस पूरी बगावत के केंद्र में कोई और नहीं बल्कि पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी हैं। दिग्गज और पुराने नेताओं का गुस्सा उन्हीं पर फूट रहा है। हालत यह है कि महज एक हफ्ते के भीतर पार्टी को कई तगड़े झटके लग चुके हैं। एक तरफ जहां गुरुवार को प्रकाश चिक बराइक ने राज्यसभा से अपना इस्तीफा सौंप दिया, वहीं उससे ठीक एक दिन पहले सुष्मिता देव ने भी उच्च सदन से किनारा करते हुए पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। इससे भी पहले सुखेंदु शेखर राय जैसे वरिष्ठ नेता ने बेलगाम भ्रष्टाचार और लचर प्रशासन का हवाला देते हुए टीएमसी से अपना नाता तोड़ लिया था।
विधानसभा से लेकर संसद तक दरकती दीवारें
पार्टी के भीतर आई यह दरार सिर्फ चंद नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी की बुनियाद पूरी तरह हिल चुकी है। करीब साठ विधायकों ने बागी नेता ऋतब्रता बनर्जी के समर्थन में झंडा बुलंद कर दिया है। ऋतब्रता ने खुद को नेता प्रतिपक्ष घोषित करते हुए यह तक कह दिया है कि ममता बनर्जी को अब मुख्य सलाहकार की भूमिका में आ जाना चाहिए। बगावत की यह चिंगारी संसद के गलियारों तक भी पहुंच चुकी है। पार्टी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने साफ तौर पर एनडीए को अपना समर्थन देने की बात कही है और उनका दावा है कि उनके साथ उन्नीस अन्य सांसद भी खड़े हैं। इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच ममता बनर्जी ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की है। इस मुलाकात ने उन चर्चाओं को और हवा दे दी है जिनमें टीएमसी के कांग्रेस में विलय होने की बात कही जा रही है।
निशाने पर अभिषेक बनर्जी
बागी खेमे का साफ तौर पर मानना है कि उनकी असली नाराजगी ममता बनर्जी से नहीं है। उनके निशाने पर दरअसल अभिषेक बनर्जी की वो कार्यशैली है, जिसे वे बेहद अहंकारी और तानाशाही भरा मानते हैं। पार्टी के पुराने चेहरों को शिकायत है कि अभिषेक ने बाहरी एजेंसी आई-पैक को जरूरत से ज्यादा तरजीह देकर जमीन से जुड़े नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। इस पर वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी का दर्द भी खुलकर सामने आया। उनका कहना था कि उन्होंने अपने जीवन के पैंतालीस साल राजनीति को दिए हैं और अभिषेक उन्हें इस तरह अपमानित नहीं कर सकते। कल्याण बनर्जी ने साफ शब्दों में अल्टीमेटम दिया कि अगर दीदी को अभिषेक पर ही निर्भर रहना है तो वे अपना रास्ता अलग कर लेंगे, लेकिन अगर वे अभिषेक से दूरी बनाती हैं, तो वे पूरी तरह उनके साथ खड़े हैं।
भ्रष्टाचार की जड़ें और कार्यकर्ताओं की अनदेखी
पार्टी छोड़ने के बाद सुखेंदु शेखर राय ने जो बातें कहीं, वो टीएमसी के अंदरुनी हालात की एक डरावनी तस्वीर पेश करती हैं। उन्होंने आरजी कर अस्पताल की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि सत्ता का नशा नेताओं के सिर पर सवार हो चुका है। आज मंत्री से लेकर पंचायत के नेता तक आम जनता की पहुंच से कोसों दूर जा चुके हैं। राय ने यह संगीन आरोप लगाया कि जिन जमीनी कार्यकर्ताओं ने अपना खून-पसीना बहाकर इस पार्टी को सींचा, उन्हें किनारे करके आज पार्टी में दलाल, चोर और बलात्कारी हावी हो गए हैं। हालात ऐसे हैं कि गांव के सबसे आलीशान घर पंचायत नेताओं के होते हैं, जिनमें विदेशी पक्षियों से लेकर स्विमिंग पूल तक की सुख-सुविधाएं मौजूद हैं।
फर्जी दस्तखत का विवाद और परिवारवाद का ठप्पा
इस पूरी आग में घी डालने का काम शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने वाले प्रस्ताव से जुड़े फर्जी हस्ताक्षर विवाद ने किया। बागी गुट को इस मामले में सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी पर शक है क्योंकि यह प्रस्ताव उन्हीं की तरफ से भेजा गया था। इसी कलह के बीच तीन जून को विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्रनाथ बोस ने बागी गुट के साठ विधायकों को मुख्य विपक्षी दल की मान्यता दे दी। हालांकि, इससे पहले ऋतब्रता बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। काफी समय से अभिषेक बनर्जी को ममता का सियासी वारिस माना जाता रहा है, लेकिन उनका यही बढ़ता कद अब पुराने नेताओं की आंखों में खटक रहा है। बागी नेता उन्हें परिवारवाद का जीता-जागता उदाहरण बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि वे पूरी तरह से पार्टी पर अपना कब्जा जमाना चाहते हैं।