2 साल पहले राघव चड्ढा के BJPमें शामिल होने का तैयार हो गया था ‘ब्लूप्रिंट’,अमित शाह ने लिखी थी पटकथा
Raghav Chadha: आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा समेत कई सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना और उनमें से कुछ का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना भारतीय राजनीति की एक बड़ी और चौंकाने वाली घटना बन गया है।
Raghav Chadha
Raghav Chadha: आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा समेत कई सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना और उनमें से कुछ का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना भारतीय राजनीति की एक बड़ी और चौंकाने वाली घटना बन गया है। हालांकि यह घटनाक्रम अचानक हुआ प्रतीत होता है, लेकिन इसकी नींव कई महीनों पहले ही रखी जा चुकी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पूरा घटनाक्रम एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसकी शुरुआत 2024 में हुई थी।
माना जा रहा है कि अमित शाह की पंजाब यात्रा और मोगा में आयोजित ‘बदलाव रैली’ के दौरान ही भाजपा ने AAP के असंतुष्ट नेताओं को अपने पाले में लाने की रणनीति बना ली थी। इस रैली को अब इस बड़े राजनीतिक बदलाव की अहम कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, AAP के भीतर असंतोष धीरे-धीरे बढ़ रहा था, खासकर पंजाब सरकार के कामकाज को लेकर। इस्तीफा देने वाले सात सांसदों में से छह पंजाब से जुड़े थे, जिससे यह साफ होता है कि राज्य स्तर पर भी नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे थे। इसी बीच दिल्ली चुनावों की तैयारियां भी तेज हो रही थीं, जिससे पार्टी के अंदर दबाव और बढ़ गया।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 2 अप्रैल को राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटा दिया गया। पार्टी ने उन पर महत्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया, लेकिन इस फैसले ने असंतोष को और बढ़ा दिया। उनकी जगह आंशिक रूप से जिम्मेदारी संभालने वाले अशोक कुमार मित्तल भी बाद में पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए, जो इस बात का संकेत है कि नेतृत्व स्थिति को संभालने में असफल रहा। इस घटनाक्रम में संदीप पाठक की भूमिका भी अहम रही। आईआईटी पृष्ठभूमि वाले पाठक कभी अरविंद केजरीवाल के करीबी रणनीतिकार माने जाते थे और उन्होंने कई चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन समय के साथ उनकी जिम्मेदारियां कम होती गईं, जिससे उनके भीतर भी असंतोष पनपा।
पार्टी के अंदर मतभेद सिर्फ कुछ नेताओं तक सीमित नहीं थे। संसदीय रणनीति को लेकर भी कई सांसदों ने असहमति जताई। कुछ नेताओं ने यहां तक कहा कि उन्हें संसद में “फ्री हैंड” दिया गया, जिससे वे पार्टी लाइन से अलग जाकर काम करने लगे। हरभजन सिंह ने भी माना कि कई बार उन्हें अपनी समझ के अनुसार मुद्दे उठाने पड़े। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि AAP के भीतर आंतरिक असंतोष लंबे समय से पनप रहा था, जिसे समय रहते संबोधित नहीं किया गया। अब जब कई बड़े चेहरे पार्टी छोड़ चुके हैं, तो यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या यह उसके लिए एक बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत है।