Dharemendra Pradhan Will Not Resign: धर्मेंद्र प्रधान क्यों नहीं देंगे इस्तीफा? इन बड़े संकेतों से जानिए अंदर की बात
Why Dharemendra Pradhan Will Not Resign: NEET पेपर लीक, UGC-NET और CBSE मार्किंग विवादों के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तेज है, लेकिन उनके पद छोड़ने की संभावना फिलहाल कम दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सरकार की कार्यशैली, शीर्ष नेतृत्व का भरोसा और सिस्टम सुधार पर जोर ऐसी प्रमुख वजहें हैं, जिनके चलते धर्मेंद्र प्रधान पर तत्काल कार्रवाई की संभावना नहीं है।
Why Dharemendra Pradhan Will Not Resign: NEET पेपर लीक और CBSE मार्किंग विवाद को लेकर विपक्षी दल और छात्र संगठन लगातार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है, लेकिन इसके बावजूद शिक्षा मंत्री के पद छोड़ने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और मौजूदा पैटर्न के आधार पर इसके पीछे 4 प्रमुख वजहें दिखाई देती हैं:
1. सरकार के काम करने की शैली और इतिहास
वर्तमान सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों के इस्तीफे न होने का एक अघोषित नियम सा बन गया है। साल 2015 में जब तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर गंभीर आरोप लगे थे, तब तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कहा था कि इस सरकार में मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते।
इतिहास गवाह है कि केवल अपवाद स्वरूप मामलों (जैसे 2018 में एम.जे. अकबर का मामला) को छोड़कर, सरकार ने विपक्ष के भारी दबाव या संसद ठप करने की धमकियों के आगे झुककर कभी किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया।
2. भूल स्वीकार करने पर जायेगा गलत राजनीतिक संदेश
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, यूपीए शासनकाल के दौरान दबाव में आकर कई मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा था, जिससे सरकार बैकफुट पर आ गई थी। मौजूदा सरकार ने उस दौर से सबक लिया है।
यदि धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लिया जाता है, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार से कोई बड़ी गलती हुई है या वह दबाव में आ गई है। सरकार किसी भी कीमत पर अपनी छवि को कमजोर या मजबूर नहीं दिखाना चाहती। रणनीतिक तौर पर इस्तीफा केवल तभी संभव होता है जब कोई जांच एजेंसी सीधे तौर पर आरोप तय कर दे।
3. धर्मेंद्र प्रधान की डिलीवरी लीडर की छवि और शीर्ष नेतृत्व का भरोसा
धर्मेंद्र प्रधान साल 2014 से ही कैबिनेट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी 'उज्ज्वला योजना' को सफलतापूर्वक लागू करने का श्रेय प्रधान को ही जाता है, जिसके तहत 10 करोड़ से अधिक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन बांटे गए। करीब 7 साल तक पेट्रोलियम मंत्रालय संभालने के कारण उनकी छवि एक कुशल 'डिलीवरी लीडर' की बनी।
इसके अलावा, 'नई शिक्षा नीति 2020' भी उन्हीं की देखरेख में तैयार हुई। वे बेहद गंभीर, लो-प्रोफाइल और मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले नेता माने जाते हैं। उत्तराखंड, यूपी, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों के चुनावों में संगठन के स्तर पर भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई है, जिससे वे पीएमओ और पार्टी नेतृत्व के बेहद करीबी और भरोसेमंद बने हुए हैं।
4. पद छोड़ने के बजाय व्यवस्था सुधारने पर जोर
सरकार इस समय इस्तीफे की राजनीति के बजाय सिस्टम को ठीक करने का नैरेटिव तैयार कर रही है। इसके तहत कई कड़े प्रशासनिक कदम उठाए गए हैं:
• जांच और गिरफ्तारियां: नीट मामले की जांच सीबीआई और राज्य पुलिस कर रही हैं, जिसमें पेपर-सेटिंग कमेटी के विशेषज्ञों सहित कई आरोपियों को पकड़ा गया है।
• दोबारा परीक्षा पर सख्त निगरानी: प्रभावित परीक्षाओं को रद्द कर नए सिरे से आयोजित किया जा रहा है, जिसमें सुरक्षा के लिए सेना और वायुसेना की मदद ली जा रही है।
• प्रशासनिक बदलाव: एनटीए (NTA) में नए संयुक्त निदेशकों की नियुक्ति की गई है और सीबीएसई के विवादित अधिकारियों को हटाया गया है।
• तकनीकी सुधार: सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और सुरक्षा खामियों को दूर करने के लिए आईआईटी मद्रास और कानपुर के विशेषज्ञों की टीम को काम पर लगाया गया है।
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल के 5 बड़े विवाद
धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते हुए अब तक 5 प्रमुख परीक्षाओं और नियमों पर सवाल उठे हैं:
1. NEET UG 2024: नतीजों में एक ही सेंटर के कई बच्चों को पूरे अंक मिलने और पेपर लीक के आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोबारा परीक्षा करानी पड़ी थी।
2. UGC NET 2024: परीक्षा के दिन ही पेपर टेलीग्राम पर बिकने की जानकारी मिलने के बाद मंत्रालय ने परीक्षा रद्द कर दी थी और मामला सीबीआई को सौंपा गया था।
3. NEET UG 2026: सोशल मीडिया पर परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र लीक होने की बात सामने आई, जिसमें पुणे के कुछ शिक्षकों और एनटीए के अंदरूनी लोगों की संलिप्तता पाई गई।
4. CBSE 12वीं मार्किंग विवाद (2026): पहली बार लागू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली में गड़बड़ी के कारण पास प्रतिशत गिर गया और लाखों छात्रों ने री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन किया। जिस कंपनी को ठेका दिया गया, उस पर पहले भी अन्य राज्यों में गड़बड़ी के आरोप लग चुके थे।
5. CUET 2026 और UGC नियम: तकनीकी खराबी के कारण हजारों छात्र परीक्षा देने से वंचित रह गए। इसके अलावा यूनिवर्सिटीज में नियमों को लेकर हुए विवाद पर सुप्रीम कोर्ट को स्टे लगाना पड़ा था।
क्या हैं सरकार के पास विकल्प?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कैबिनेट और संगठन के स्तर पर आगामी बदलावों के दौरान सरकार बीच का रास्ता निकाल सकती है। सरकार के पास मुख्य रूप से दो विकल्प दिखाई देते हैं:
• मंत्रालय में बदलाव: धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय की जगह किसी अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी जाए। अतीत में सुरेश प्रभु और स्मृति ईरानी के मामलों में भी ऐसा देखा जा चुका है, जहां विवादों के बाद मंत्रियों के विभाग बदल दिए गए थे ताकि विपक्ष के दबाव की बात भी सामने न आए और काम भी चलता रहे।
• संगठन में वापसी: उन्हें सरकार से हटाकर पार्टी संगठन के काम में सक्रिय किया जा सकता है।
यदि आने वाले दिनों में कोई बदलाव होता भी है, तो सरकार उसे किसी दबाव के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य और नियमित प्रक्रिया के तौर पर ही पेश करेगी।