Language and Thought: क्या सोचने के लिए भाषा जरूरी है? वैज्ञानिक शोध ने बदल दी दशकों पुरानी धारणा
Language and Thought: क्या सोचने के लिए भाषा जरूरी है? जानिए प्लेटो, नोम चॉम्स्की और एमआईटी की वैज्ञानिक एवेलिना फेडोरेंको के शोध के आधार पर भाषा, मस्तिष्क और चिंतन के संबंध पर दिलचस्प विश्लेषण।
Language and Thought: हजारों वर्षों से दार्शनिक भाषा के उद्देश्य के बारे में बहस करते रहे हैं। प्लेटो का मानना था कि सोचने के लिए भाषा जरूरी है। उन्होंने लिखा कि विचार आत्मा का खुद से एक मौन आंतरिक संवाद है। 1960 के दशक की शुरुआत में भाषाविद नोम चोस्की नै तर्क दिया कि हंम तर्क और अन्य प्रकार के विचारों के लिए भाषा का उपयोग करते हैं। उन्होंने लिखा, 'यदि भाषा की गंभीर कमी है, तो विचार की भी गंभीर कमी होगी।'
स्नातक की छात्रा एवेलिना फेडोरेंको ने क्लास में डॉ. चोम्स्की को अपने सिद्धांत की व्याख्या करते सुना। उन्हें वह विचार पसंद था, लेकिन इसके पक्ष में सबूत नहीं होने से वह हैरान थीं। उन्होंने कहा, वह जो कुछ भी कह रहे थे, वह ऐसे कहा गया, जैसे वे तथ्य या सत्य हों। डॉ. फेडोरेंको बाद में एमआईटी में तंत्रिका वैज्ञानिक बनीं। उन्होंने मस्तिष्क स्कैनिंग का उपयोग करके यह पता लगाने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भाषा निर्मित करता है। और 15 वर्षों के शोध ने उन्हें एक चौंकाने वाले निष्कर्ष पर पहुंचाया कि सोचने के लिए हमें भाषा की जरूरत नहीं है। वह कहती हैं, 'जब आप इसका मूल्यांकन करना शुरू करते हैं, तो आपको चिंतन में भाषा की भूमिका का सबूत नहीं मिलता है।'
शुरुआती अध्ययनों से पता चला कि मस्तिष्क के जो क्षेत्र भाषा के लिए जरूरी थे, वे तर्क या गणित के सवाल हल करते समय भी सक्रिय रहते हैं। लेकिन डॉ. फेडोरेंको व अन्य शोधकर्ताओं ने पाया कि यह एक मृगतृष्णा थी। फिर डॉ. फेडोरेंको व उनके सहयोगियों ने शक्तिशाली स्कैनर का उपयोग करके मस्तिष्क के कुछ ऐसे क्षेत्र खोजे, जो केवल तभी सक्रिय होते थे, जब स्वयंसेवक भाषा को समझने का कार्य करते थे। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग तरह से चिंतन करने वाले लोगों के मस्तिष्क को फिर से स्कैन करके कहा कि जब आप चिंतन कर रहे होते हैं, तो मस्तिष्क के अन्य क्षेत्र वास्तव में कड़ी मेहनत करते हैं, पर भाषा का नेटवर्क शांत रहता है। यदि विचार के लिए भाषा नहीं, तो भाषा की जरूरत क्या है? डॉ. फेडोरको एवं सहयोगी कहते हैं कि संवाद के लिए। डॉ. चोम्स्की और अन्य ने शब्दों की अस्पष्टता और हमारे अंतर्ज्ञान को जोर से व्यक्त करने में कठिनाई का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया है। व्यापक अध्ययनों से पता चला है कि सूचना को कुशलतापूर्वक स्थानांतरित्त करने के लिए भाषाओं को तैयार किया गया है। एक अध्ययन में पाया कि अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द छोटे होते हैं, जिससे भाषा सीखना आसान हो जाता है और सूचना का प्रवाह तेज हो जाता है।
( साभार ‘ द न्यूयार्क टाइम्स’ एव ‘ अमर उजाला’।)
-कार्ल जिमर