Muhammad Ali Biography: बॉक्सिंग चैंपियन से अदालत तक, क्यों अमेरिका से भिड़ गए थे मुहम्मद अली?
मुMuhammad Ali Biography: हम्मद अली ने 1967 में अमेरिकी सेना में भर्ती होकर वियतनाम युद्ध में जाने से इनकार कर दिया था। जानिए धार्मिक विश्वास, नस्लभेद, जेल की सजा और बॉक्सिंग करियर पर इसका असर।
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Muhammad Ali Biography: 1967 में दुनिया के सबसे मशहूर मुक्केबाजों में शामिल मुहम्मद अली के सामने एक ऐसा फैसला लेने का समय आया, जिसने उनका पूरा जीवन बदल दिया। अमेरिकी सरकार ने उन्हें सेना में भर्ती होकर वियतनाम युद्ध में जाने का आदेश दिया था। उस समय अली दुनिया के हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन थे और अपने करियर के सबसे शानदार दौर में थे। लेकिन उन्होंने सेना में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। उनका यह फैसला केवल युद्ध में भाग न लेने का मामला नहीं था, बल्कि धर्म, नस्लभेद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नैतिकता से जुड़ा एक बड़ा विरोध था। इसकी कीमत उन्हें अपना विश्व खिताब, बॉक्सिंग करियर के कई महत्वपूर्ण साल और जेल जाने का खतरा उठाकर चुकानी पड़ी।
मुहम्मद अली कौन थे और उस समय अमेरिका में क्या चल रहा था?
मुहम्मद अली का जन्म 17 जनवरी 1942 को अमेरिका के केंटकी राज्य के लुइसविल शहर में कैसियस मार्सेलस क्ले जूनियर के नाम से हुआ था। उन्होंने 1960 के रोम ओलंपिक में बॉक्सिंग का गोल्ड मेडल जीता और जल्द ही पेशेवर मुक्केबाजी की दुनिया में अपनी पहचान बना ली। 1964 में उन्होंने सोनी लिस्टन को हराकर विश्व हैवीवेट चैंपियन का खिताब जीता। इसी साल उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने और अपना नाम बदलकर मुहम्मद अली रखने की घोषणा की।
यह वह दौर था जब अमेरिका वियतनाम युद्ध में तेजी से शामिल हो रहा था। अमेरिकी सरकार युवाओं को सेना में भर्ती कर युद्ध के लिए भेज रही थी। दूसरी तरफ देश के भीतर अश्वेत नागरिक नस्लीय भेदभाव, अलगाव और असमान अधिकारों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। अली भी इस सामाजिक और राजनीतिक माहौल से प्रभावित थे। इसलिए जब उन्हें सेना में शामिल होने का आदेश मिला, तो उन्होंने इसे केवल सैन्य जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपने विश्वास और अंतरात्मा से जुड़ा सवाल माना।
अली ने वियतनाम युद्ध में जाने से इनकार क्यों किया?
अली के इनकार के पीछे दो प्रमुख आधार थे। पहला उनका धार्मिक विश्वास और दूसरा युद्ध को लेकर उनकी नैतिक तथा राजनीतिक आपत्ति। वे नेशन ऑफ इस्लाम (Nation of Islam) से जुड़े थे और उसके धार्मिक विचारों के अनुसार सेना में जाकर युद्ध करना उनके विश्वास के खिलाफ था। अली ने कहा था कि उनका धर्म उन्हें ऐसे युद्ध में भाग लेने की अनुमति नहीं देता।
इसके साथ ही अली अमेरिका में अश्वेत लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर भी मुखर थे। उनका सवाल था कि जब उनके अपने देश में अश्वेत नागरिकों को बराबरी और सम्मान नहीं मिल रहा, तो वे किसी दूसरे देश में जाकर वहां के लोगों के खिलाफ हथियार क्यों उठाएं? उनका विरोध केवल वियतनाम के लोगों के प्रति सहानुभूति नहीं था, बल्कि अमेरिकी समाज में मौजूद नस्लीय असमानता पर भी सवाल था। अली के लिए यह फैसला उनके व्यक्तिगत विवेक और धार्मिक आस्था का मामला था।
28 अप्रैल 1967 को अली ने ऐसा क्या किया, जिससे पूरा अमेरिका हिल गया?
अमेरिकी सरकार ने अली को 28 अप्रैल 1967 को टेक्सास के ह्यूस्टन स्थित सैन्य भर्ती केंद्र में रिपोर्ट करने का आदेश दिया। वे तय समय पर वहां पहुंचे। जब सेना में शामिल होने के लिए उनका नाम पुकारा गया, तो उन्होंने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। अधिकारियों ने उन्हें परिणामों के बारे में चेतावनी दी और एक बार फिर मौका दिया, लेकिन अली अपने फैसले पर कायम रहे।
यह घटना तुरंत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबर बन गई। उस समय अली केवल एक खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि दुनिया के सबसे चर्चित खेल सितारों में से एक थे। उनके इस कदम ने अमेरिका में युद्ध समर्थकों और युद्ध विरोधियों के बीच चल रही बहस को और तेज कर दिया। कुछ लोगों ने उन्हें देश के प्रति गैरजिम्मेदार बताया, जबकि कई लोगों ने उनके साहस और अपने सिद्धांतों पर टिके रहने की प्रशंसा की।
क्या अली को जेल हुई और उन पर कौन-सा मुकदमा चला?
अली के इनकार के बाद अमेरिकी सरकार ने उनके खिलाफ सैन्य भर्ती के आदेश का पालन न करने का मामला चलाया। 20 जून 1967 को एक संघीय अदालत की जूरी ने उन्हें दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें पांच साल की जेल और 10,000 डॉलर जुर्माने की सजा सुनाई। हालांकि, अपील की प्रक्रिया के दौरान वे जेल से बाहर रहे। अली ने अदालत में अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर यह दलील दी थी कि उन्हें ईमानदार धार्मिक आपत्तिकर्ता यानी Conscientious Objector माना जाना चाहिए। अमेरिकी कानून में ऐसे लोगों को सैन्य सेवा से छूट मिल सकती थी, जो अपने धार्मिक या नैतिक विश्वासों के कारण सभी युद्धों में भाग लेने का विरोध करते हों। लेकिन उस समय संबंधित बोर्ड ने उनकी छूट की मांग स्वीकार नहीं की थी। यही विवाद आगे चलकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
अली को इसकी सबसे बड़ी कीमत अपने बॉक्सिंग करियर में कैसे चुकानी पड़ी?
अली के इनकार के तुरंत बाद बॉक्सिंग की दुनिया में उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई। न्यूयॉर्क स्टेट एथलेटिक कमीशन और कई अन्य बॉक्सिंग संस्थाओं ने उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया। उनसे विश्व हैवीवेट चैंपियन के रूप में मान्यता भी छीन ली गई। इसके कारण वे अमेरिका में अपने पेशेवर मुकाबले नहीं लड़ सके और उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण दौर रुक गया।
1967 से 1970 तक लगभग साढ़े तीन साल वे पेशेवर बॉक्सिंग से दूर रहे। यह किसी भी खिलाड़ी के लिए बहुत बड़ा नुकसान था, खासकर ऐसे मुक्केबाज के लिए जो अपनी शारीरिक क्षमता और लोकप्रियता के चरम पर था। इस दौरान उन्हें कई करोड़ रुपये के संभावित मुकाबलों और कमाई का नुकसान हुआ। उनकी प्रसिद्धि बनी रही, लेकिन रिंग में उतरने का अवसर उनसे छीन लिया गया। यह उनके फैसले की सबसे बड़ी व्यावहारिक कीमतों में से एक थी।
क्या अली को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिला?
अली ने अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखी और उनका मामला 1971 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 28 जून 1971 को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से उनकी दोषसिद्धि पलट दी। अदालत ने पाया कि संबंधित अपील बोर्ड को न्याय विभाग की ओर से दी गई कानूनी सलाह में गंभीर गलती थी। इस कारण अली के धार्मिक आपत्तिकर्ता होने के दावे को अस्वीकार करने का आधार कानूनी रूप से सही नहीं था।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे यह घोषणा नहीं की थी कि अली हर कानूनी कसौटी पर Conscientious Objector साबित हो गए हैं। अदालत ने उनकी दोषसिद्धि को उस कानूनी प्रक्रिया में हुई गलती के आधार पर पलटा था। फिर भी यह फैसला अली के लिए बड़ी जीत था, क्योंकि पांच साल की जेल की सजा और आपराधिक दोषसिद्धि का खतरा समाप्त हो गया।
क्या अली ने बॉक्सिंग में वापसी के बाद अपना खोया हुआ मुकाम हासिल किया?
1970 में कानूनी प्रक्रिया के दौरान ही अली को दोबारा बॉक्सिंग करने का अवसर मिला। उन्होंने जेरी क्वैरी के खिलाफ मुकाबले से वापसी की। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पुरानी लय हासिल की और दुनिया के सबसे बड़े मुक्केबाजी मुकाबलों का हिस्सा बने।
1974 में जॉर्ज फोरमैन को हराकर उन्होंने फिर से विश्व हैवीवेट चैंपियन का खिताब हासिल किया। यह मुकाबला जायरे में हुआ था और इसे 'रंबल इन द जंगल' के नाम से जाना जाता है। इस जीत ने साबित कर दिया कि लंबे अंतराल के बावजूद अली दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाजों में शामिल थे। बाद में वे बॉक्सिंग इतिहास के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में गिने जाने लगे।
क्या अली का यह फैसला केवल खेल और युद्ध तक सीमित था?
नहीं, समय के साथ उनका यह फैसला नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बहस का भी हिस्सा बन गया। 1960 के दशक में अमेरिका में वियतनाम युद्ध के खिलाफ आंदोलन बढ़ रहा था। इसी समय अश्वेत नागरिक अधिकार आंदोलन भी अपने निर्णायक दौर में था। अली ने इन दोनों मुद्दों को अपने सार्वजनिक भाषणों में जोड़ा और विश्वविद्यालयों तथा सामाजिक संगठनों में जाकर अपने विचार रखे।
उनके विरोध का एक पहलू यह भी था कि वे एक ऐसे समय में सत्ता और लोकप्रिय जनमत के खिलाफ खड़े हुए, जब ऐसा करना उनके लिए आर्थिक और सामाजिक रूप से नुकसानदेह था। हालांकि उनके फैसले की आलोचना भी हुई और कई अमेरिकी नागरिकों ने उन्हें देशभक्ति के खिलाफ माना। लेकिन अली ने अपने विचारों से पीछे हटने के बजाय उनके परिणाम स्वीकार किए। इसी वजह से उनकी पहचान केवल एक महान मुक्केबाज की नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली सामाजिक आवाज की भी बनी।
अली की कहानी इसलिए याद रखी जाती है क्योंकि उन्होंने अपने करियर के सबसे अच्छे दौर में भी उस काम को करने से इनकार कर दिया, जिसे वे अपने सिद्धांतों के खिलाफ मानते थे।