Periods During Pilgrimage: तीर्थ यात्रा के दौरान पीरियड्स आ जाएं तो क्या करें? दूर होगा आपका भ्रम

Periods During Pilgrimage: पीरियड्स के दौरान मंदिर जाना चाहिए या नहीं? इस सवाल पर प्रेमानंद जी महाराज ने धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जवाब दिया है। जानिए तीर्थ यात्रा के दौरान मासिक धर्म आने पर दर्शन, पूजा और मंदिर प्रवेश को लेकर क्या सलाह दी गई है।

Update:2026-07-10 17:32 IST

Periods During Pilgrimage (Image Credit-Social Media)

Periods During Pilgrimage:  कई महिलाएं महीनों पहले किसी तीर्थ यात्रा या मंदिर दर्शन की योजना बनाती हैं। लेकिन अगर यात्रा के दौरान अचानक मासिक धर्म (पीरियड्स) शुरू हो जाए तो मन में एक बड़ा सवाल उठता है—क्या मंदिर में प्रवेश करना चाहिए या बिना दर्शन किए लौट जाना चाहिए? इस विषय पर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं, जिससे अक्सर भ्रम की स्थिति बन जाती है।

इसी सवाल का जवाब वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज ने अपने एक प्रवचन में दिया था। उन्होंने कहा कि मासिक धर्म एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है और इसे लेकर महिलाओं को अपराधबोध या शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए।

दर्शन का अवसर न छोड़ें: प्रेमानंद जी महाराज

प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, अगर कोई महिला तीर्थ यात्रा पर है और उसी दौरान उसे मासिक धर्म शुरू हो जाए, तो केवल इस कारण भगवान के दर्शन का अवसर नहीं छोड़ना चाहिए। उनका कहना है कि कई बार वर्षों की इच्छा और कठिन प्रयासों के बाद किसी पवित्र धाम तक पहुंचने का अवसर मिलता है, इसलिए इस सौभाग्य से वंचित नहीं होना चाहिए।

कैसे करें दर्शन?

महाराज ने सलाह दी कि ऐसी स्थिति में महिला स्नान कर या गंगाजल का छिड़काव करके मंदिर परिसर में जाए और दूर से भगवान के दर्शन करे।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस दौरान:

  • भगवान की मूर्ति को स्पर्श न करें।
  • फूल या प्रसाद अर्पित न करें।
  • मंदिर की परंपराओं और नियमों का सम्मान करें।

पीरियड्स कोई अपवित्रता नहीं



 प्रेमानंद जी महाराज का कहना है कि मासिक धर्म कोई अपवित्रता नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा महिलाओं को दिया गया एक स्वाभाविक जैविक चक्र है। उन्होंने धार्मिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं को इस अवस्था में स्वयं को हीन या दोषी नहीं समझना चाहिए।

घर पर क्या करें?

अगर महिला घर पर है और परिवार की परंपरा के अनुसार पूजा नहीं करती, तो भी वह:

  • भगवान का नाम जप सकती है।
  • भजन और कीर्तन कर सकती है।
  • मन ही मन ईश्वर का स्मरण कर सकती है।

उनके अनुसार, भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रद्धा और आस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

धार्मिक परंपराओं का भी रखें सम्मान



 भारत के अलग-अलग मंदिरों और संप्रदायों में मासिक धर्म को लेकर अलग-अलग नियम और परंपराएं हैं। इसलिए जिस मंदिर में आप दर्शन के लिए जाएं, वहां के स्थानीय नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करना उचित माना जाता है।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचन और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न संप्रदायों, मंदिरों और विद्वानों की इस विषय पर अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं। यह लेख किसी धार्मिक दावे की पुष्टि नहीं करता है।

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