MP Boat Tragedy: कौन कहेगा, किसकी सुनेंगे

Bargi Dam Cruise Boat Tragedy: मध्य प्रदेश के बरगी बांध में हुए क्रूज हादसे ने सुरक्षा मानकों की अनदेखी और व्यवस्थागत लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह लेख नाव दुर्घटनाओं के कारणों, नियमों के उल्लंघन और जनजागरूकता की आवश्यकता पर गहराई से विचार करता है।

Update:2026-05-04 20:31 IST

MP Bargi Dam Cruise Boat Tragedy

Bargi Dam Cruise Boat Tragedy: मध्य प्रदेश के जबलपुर में 30 अप्रैल की शाम बरगी बांध में एक क्रूज नाव के आंधी -तूफान के कारण उठी तेज लहरों की चपेट में आकर पलटने से ‌ एक भयानक हादसा हुआ, जिसमें वह क्रूज‌ बरगी बांध में ही डूब गया। यह खबर लगातार 2 दिन से हम देख, पढ़ और सुन रहे हैं। लगातार खबर से संबंधित वीडियो भी अपडेट हो रहे हैं। क्रूज पलटने से हुए हादसे की त्रासदी ने एक बार फिर नागरिक सुरक्षा को लेकर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। सभी ने उस मां की फोटो भी जरूर देखी होगी जिसमें हादसे के समय उसने अपने बच्चे को अपनी ही लाइफ जैकेट में घुसा लिया था और मां ने अपने बेटे को इस तरह से पकड़ रखा है कि उनकी मृत्यु के बाद भी उन्हें एक -दूसरे से अलग करना मुश्किल रहा। ‌ ‌क्या ख्याल ‌आएं होंगे उस मां ‌को उन आखिरी क्षणों में ‌, बेटे ने मां की गोद को ही सबसे सुरक्षित जगह माना होगा और मां ‌ने भी यह सुनिश्चित ‌करने ‌ पूरी कोशिश की होगी कि उसके बच्चे के लिए मां के हाथ और उसकी गोदी दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह रहे और इसी बचाने के उपक्रम में उसने अपने बच्चे पर से बिल्कुल भी अपनी पकड़ ढीली नहीं की होगी। वह मां जिसने उसे जन्म दिया था, उसके साथ ही वह बच्चा भी उसकी गोद में हमेशा के लिए सो गया। इस तरह की फोटो जब सामने आती है तो ऐसे दर्दनाक हादसे लापरवाही का हादसा से अधिक जानबूझकर की गई हत्या जैसे लगने लग जाते हैं। निर्देशों की अनदेखी, नियमों के प्रति लापरवाही और किसी भी तरह की चेतावनी या बातों को नजरअंदाज करने की कीमत आज सिर्फ उस बांध में डूबने वाले ही नहीं उठा रहे बल्कि उनके परिजन, उनके रिश्तेदार उस घटना को एक लंबे समय तक जनहानि के उस भयानक मंजर के रूप में याद रखेंगे, जिससे पार पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है।


 गर्मियों की एक सामान्य शाम जैसे कि आमतौर पर कोई भी शाम होती है , लोग घूमने निकलते हैं, लोगों में उत्साह होता है, मूड हल्का रखते हैं और इस उत्साह में ज्यादातर कोई भी सुरक्षा के प्रति इतना सचेत नहीं होता है जितना कि आमतौर पर होना चाहिए। क्रूज या नाव पर की जाने वाली सवारी किसी को भी रोमांचकारी लग सकती है। किसी के लिए यह रोजगार या दैनिक आवाजाही का साधन होती है तो कहीं पर यह घूमने का माध्यम होती है। जिनके लिए यह रोज की आवाजाही का साधन होती है, उनके लिए यह एक सामान्य सी बात होती है और जो लोग घूमने के लिए क्रूज पर सवारी कर रहे होते हैं, उनके लिए पानी से पानी के टकराने से उठती हुई लहरों की ठंडक ‌ और उन्हें देखना बहुत ही सुकून भरा एहसास होता है। लेकिन जब यही एहसास, जब यही उत्साह इस तरह की दुर्घटना में तब्दील हो जाता है तो वहीं रोमांच मातम में बदल जाता है । अब तक इस विषय पर बहुत कुछ लिखा- सुना भी गया है और तब से अब तक इस घटना के बाद से उस बरगी बांध में न जाने कितना पानी बह चुका होगा। पर क्या पानी के बह जाने से इस दुर्घटना की क्रूर यादें भी बह जाएंगी। अभी कुछ दिनों पहले वृंदावन में भी इसी तरह का एक हादसा यमुना नदी पर हुआ। जगह बदल गई, हादसा बदल गया पर हादसे के तरीके लगभग वही होते हैं। हम चाहे गंगासागर जाएं , अरब सागर पर या गंगा नदी पर या किसी भी बड़ी नदी पर हम जब नौका विहार करते हैं तब अधिकांशत: यह होता है कि जितने ‌ लोगों की बैठने की क्षमता नाव पर या क्रूज पर होती है, उनके आधार पर लोगों को बैठाया जाता है लेकिन उसमें बच्चों की गिनती नहीं की जाती है। कहीं-कहीं पर बच्चों की भी गिनती कर ली जाती है क्योंकि उन्हें टिकट के पैसे जो मिल रहे होते हैं पर अधिकांशतः उनकी अनदेखी कर दी जाती है और कुल क्षमता से अधिक लोग बैठा लिए जाते हैं। ब्रह्मपुत्र पर भी जब एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के लिए रोज चलने वाली नावों की हम स्थिति देखते हैं तो हम समझ सकते हैं कि उनमें कितना खतरा होता है। क्योंकि वे पूरी तरह से ओवरलोड चलती हैं और ऐसी नांवों में सुरक्षा के किसी भी मानक का, किसी भी नियम का पालन नहीं किया जाता है। न तो उनमें किसी भी तरह की कोई अधिकतम यात्री संख्या होती है और न ही उनमें किसी भी तरह के सुरक्षा इंतजाम होतें है। यहां तक की उन नावों या क्रूज की उम्र कितनी हो चुकी है, उसके बारे में भी कोई बात नहीं की जाती है।


बरगी बांध पर दुर्घटना की शिकार हुआ क्रूज लगभग 20 साल पुराना था, जिस पर न तो सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम थे और न ही स्थानीय मौसम के पूर्वानुमान की किसी भी तरह की कोई व्यवस्था थी। जबकि मौसम विभाग द्वारा मौसम को लेकर ऑरेंज अलर्ट जारी कर दिया गया था। तो क्या ऑरेंज अलर्ट की अनदेखी करके उस क्रूज को बरगी बांध में चलाया गया। तो इसमें मौसम की खराबी होने से अधिक व्यवस्थागत लापरवाही का प्रतिशत होगा ‌। पर देखा जाता है कि जब हम किसी भी क्रूज या नाव पर घूमने के मकसद से जा रहे होते हैं तो किसी ने भी जीवन रक्षक जैकेट नहीं पहनी होती है। क्यों? क्या आप भी आज अगर किसी क्रूज पर घूमने जा रहे हैं तो क्या आप हर समय जीवन रक्षक जैकेट पहनने के लिए राजी हो पाएंगे। अधिकांश लोग उसको न कह देंगे, कहेंगे नहीं, हम ऐसे ही ठीक हैं क्योंकि न फोटोस में, न वीडियो में और न ही रील्स में उनकी ड्रेस का कोई गेटअप आएगा। दूसरी बात यह भी है कि नाव संचालक / क्रूज संचालक भी जीवन रक्षक जैकेट किन्हीं भी यात्रियों को अधिकतर न देते हैं न ही उसको पहनने के लिए दवाब बनाते हैं और जब तक आपात स्थिति में इन जैकेट्स को दिया जाता है तब तक न तो लोगों को संभलने का मौका मिलता है और न ही पहनने का मौका मिलता है। जो चीज हम नजरअंदाज कर चुके होते हैं उसका सिला हमें इस तरह से मिलता है। ‌ क्रूज का पलटना , आंधी -तूफान के कारण तेज लहरों का उठना एक बात है और जीवन रक्षक जैकेट न पहनना और नौका चालकों को उचित प्रशिक्षित न होना यह इसके समानांतर दूसरी बात है।


जल पर्यटन एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर हमेशा मौसम के पूर्वानुमान की व्यवस्था होनी चाहिए, उसे लगातार अपडेट करा जाना चाहिए। प्रत्येक नाव या क्रूज जब भी अपनी यात्रा शुरू करें यह सख्त नियम होने चाहिए कि वह मौसम के पूर्वानुमान के नियमों को मानें और ‌ और उनको लागू कराया जाना चाहिए। ऋषिकेश में भी गंगा पर जब राफ्टिंग के लिए ले जाया जाता है, कश्मीर में भी जब राफ्टिंग के लिए ले जाया जाता है तब लाइफ जैकेट पहनी जाती है और उसके बाद उसमें से कई बार नाव में सवारी कर रहे लोगों को सीधे गंगा की लहरों में उतार भी दिया जाता है। कभी-कभी इस तरह की मस्ती -मजाक के जो क्षण होते हैं वे जरा सी लापरवाही या अधिक उत्साह में जानलेवा साबित हो सकते हैं। इस तरह की गतिविधियों में जहां पर रील बनाने के लिए या अधिक मौज मस्ती के लिए इस तरह के उपक्रम किए जाते हैं उन पर जरूर रोक लगनी चाहिए। बांध इत्यादि में जब पानी छोड़ा जाए तो उसके पहले से ही उसकी पूर्व सूचना दी जानी चाहिए।

इनलैंड वेसल्स एक्ट 2021 के अनुसार, हर यात्री को यात्रा शुरू होने से पहले लाइफ जैकेट देना और पहनाना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश नाव दुर्घटनाओ में इस नियम का पालन नहीं होता है। अधिकतर क्रूज में जितनी क्षमता होती है उससे कहीं अधिक टिकट जारी किए जाते हैं , शेष पैसा ‌या तो नाव चालक या संचालक अपनी पॉकेट में डाल लेता है। ‌लेकिन उसका यह लालच ‌कितने लोगों की जान जोख़िम में डाल देता है। इन हादसों का मुख्य कारण क्षमता से अधिक यात्री, सुरक्षा जैकेट की कमी और खराब मौसम रहा है। इन घटनाओं में अक्सर "चलता है" वाली संस्कृति के कारण सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता, जिससे निर्दोष लोगों को जान गंवानी पड़ती है। नाव चलाने वाले नियमों का खुला उल्लंघन करते हैं, उनकी नावों की स्थिति अकसर खराब होती है।तकनीकी खराबी , इंजन, स्टीयरिंग या अन्य यांत्रिक प्रणालियों का फेल हो जाना या नाविक को स्थानीय जलमार्ग या आपातकालीन स्थितियों को संभालने का पर्याप्त अनुभव न होना भी इस के कारण होते हैं। नाव चलाते समय चालक का नशे में होना, जो निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। 


देश के प्रमुख नाव हादसों में मथुरा यमुना नाव हादसा जिसमें 10 लोगों की मौत हो गई।अंडमान सागर हादसा में बांग्लादेशियों-रोहिंग्याओं से भरी नाव पलटने से लगभग 250 लोग डूब गए । जम्मू-कश्मीर के गंडबल में झेलम नदी में नाव डूबने से कई लोगों की जान गई थी। ओडिशा के हीराकुंड जलाशय में नाव डूबने से बड़ा हादसा हुआ था।रामदास जहाज आपदा भारत के इतिहास में सबसे बड़ी समुद्री त्रासदियों में से एक है।असम में ब्रह्मपुत्र नदी में समय-समय पर नाव हादसे की खबरें आती रहती हैं, जिनमें कई यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ती है या वे लापता हो जाते हैं। बरपेटा जिले के चेन्गा इलाके में ब्रह्मपुत्र नदी में एक निजी नाव के पलट जाने से 6 से ज्यादा लोग लापता हो गए थे। धुबरी जिले में एक पुल के खंभे से टकराकर नाव पलटने से कई लोग लापता हो गए। बताया गया कि नाव पर 50 से अधिक लोग सवार थे। निमती घाट के पास दो नावों की आमने-सामने की टक्कर में एक नाव डूब गई, जिसमें 100 से ज्यादा लोग सवार थे। इन दुखद मौतों को रोका जा सकता है ‌बशर्ते नियमों ‌की अनदेखी न की जाए। लेकिन कौन कहेगा और किसकी सुनेंगे।

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