जब लोकतंत्र का प्रहरी अपना धर्म भूल जाए

लेख में नीट परीक्षा विवाद के बहाने लोकतंत्र, मीडिया की भूमिका, पत्रकारिता की निष्पक्षता, जवाबदेही और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

Update:2026-07-28 21:35 IST

जब लोकतंत्र का प्रहरी अपना धर्म भूल जाए (Photo- Social Media)

नीट पेपर लीक को लेकर देशभर में हुआ छात्र आंदोलन केवल भारत की परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करने के कारण ही याद नहीं रखा जाएगा। इसने लोकतंत्र में मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया के एक वर्ग की बदलती भूमिका से जुड़े कहीं अधिक गहरे संकट को भी सामने ला दिया।

देश के सामने मूल प्रश्न बेहद सीधा था, क्या उस राष्ट्रीय परीक्षा की विश्वसनीयता से समझौता हुआ था, जिस पर लाखों छात्रों का भविष्य निर्भर करता है? लेकिन इस बुनियादी सवाल की पड़ताल करने के बजाय मीडिया के एक हिस्से ने दूसरी राह चुन ली। धीरे-धीरे बहस का केंद्र परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से हटकर स्वयं आंदोलन की विश्वसनीयता पर आ गया।

शुरुआत से ही कई तरह के नैरेटिव गढ़े गए। किसी ने इस आंदोलन को भारत की छवि खराब करने के लिए विदेशी ताकतों द्वारा प्रायोजित अभियान बताया। कुछ ने इसमें चीन की भूमिका की ओर संकेत किया। वहीं कुछ अन्य ने इसे राजनीतिक रूप से तैयार किया गया ऐसा अभियान करार दिया जिसका उद्देश्य देश में अराजकता फैलाना था। पेपर लीक और संस्थागत विफलताओं के आरोपों की निष्पक्ष जांच करने के बजाय काफी ऊर्जा उन लोगों की मंशा पर सवाल उठाने में खर्च की गई जो जवाबदेही की मांग कर रहे थे।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी टेलीविजन चैनलों पर तीखी बहस का विषय बन गई। कई टिप्पणीकारों ने तर्क दिया कि यदि ऐसी मांग स्वीकार कर ली गई तो यह एक गलत परंपरा स्थापित करेगी। इस मांग से सहमत या असहमत होना अलग बात है, लेकिन इससे बड़ा प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया। क्या सार्वजनिक विमर्श का पहला केंद्र परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता नहीं होना चाहिए था, उसके राजनीतिक परिणामों का आकलन बाद में किया जाना चाहिए था?

बहस का एक और चिंताजनक पक्ष यह था कि पूरे छात्र आंदोलन को दलगत राजनीति के चश्मे से देखा जाने लगा। विशेष रूप से राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेताओं की भूमिका पर अत्यधिक चर्चा हुई, मानो उनके समर्थन ने छात्रों की चिंताओं की वैधता को कम कर दिया हो।

यह दृष्टिकोण संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना को समझने में एक गंभीर भूल को दर्शाता है। सरकार का दायित्व शासन चलाना है, जबकि विपक्ष का दायित्व सरकार से प्रश्न पूछना और जनता की शिकायतों को आवाज़ देना है। यदि राजनीतिक दल लाखों छात्रों को प्रभावित करने वाले किसी मुद्दे को उठाते हैं, तो मीडिया की जिम्मेदारी उनके राजनीतिक उद्देश्य तलाशना नहीं, बल्कि उस मुद्दे की वास्तविकता और उसके गुण-दोषों की जांच करना है। पत्रकारिता का धर्म तथ्यों की पड़ताल करना है, इरादों का पूर्वनिर्णय करना नहीं।

इस पूरे अनुभव ने मुझे एक असहज करने वाला प्रश्न पूछने के लिए विवश किया, क्या भारतीय पत्रकारिता ने सरकार की रक्षा और राष्ट्र की रक्षा को एक ही चीज़ मानना शुरू कर दिया है?

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ 

चार दशक से अधिक समय पत्रकारिता में बिताने के दौरान - हॉट-मेटल प्रिंटिंग के दौर से लेकर सैटेलाइट टेलीविजन और अब सोशल मीडिया के युग तक मैंने भारतीय मीडिया का असाधारण परिवर्तन देखा है। मैंने वह समय भी देखा है जब पत्रकारिता स्वयं को एक सार्वजनिक विश्वास मानती थी, और आज वह समय भी देख रहा हूँ जब वह तेजी से नैरेटिव की प्रतिस्पर्धा में बदलती जा रही है। यह परिवर्तन जितना स्पष्ट नीट आंदोलन के दौरान दिखाई दिया, उतना शायद पहले कभी नहीं दिखा।

मीडिया को अक्सर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उत्पत्ति न तो लोकतंत्र से हुई है और न ही लिखित संविधान से। यह मनुष्य की स्वाभाविक स्वतंत्रता है, प्रकृति का दिया हुआ सबसे बड़ा उपहारों में से एक। लोकतंत्र केवल वह संस्थागत ढांचा उपलब्ध कराता है जिसमें यह स्वतंत्रता फलती-फूलती है। किंतु हर स्वतंत्रता अपने साथ समान रूप से उत्तरदायित्व भी लेकर आती है। उत्तरदायित्व से रहित स्वतंत्रता अंततः स्वच्छंदता में बदल जाती है।

पत्रकारिता की संस्था ने एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा तय की है। प्राचीन रोम के एक्टा डायुर्ना (Acta Diurna) से लेकर आज के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक उसका मूल उद्देश्य कभी नहीं बदला, समाज को सत्यनिष्ठ सूचना देना और नागरिकों को सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाना। तकनीक ने संचार के स्वरूप को बदल दिया है, लेकिन उसने पत्रकारिता के नैतिक दायित्व को नहीं बदला।

भारत में पत्रकारिता

भारत में पत्रकारिता ने अपना सबसे गौरवपूर्ण स्थान स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अर्जित किया। उस समय अखबार उन करोड़ों भारतीयों की आवाज़ बने, जिनके पास न धन था, न राजनीतिक शक्ति। उन्होंने आम लोगों को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा दी और राष्ट्र की चेतना को जागृत किया। उस दौर में पत्रकारिता एक पेशा बनने से पहले एक मिशन थी।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अनेक महानायक - महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, अटल बिहारी वाजपेयी और असंख्य अन्य - अपने जीवन के विभिन्न चरणों में पत्रकार भी रहे। वे जानते थे कि पत्रकारिता की असली शक्ति सत्ता की निकटता से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से आती है।

स्वतंत्र भारत ने राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे हैं। समाचार-पत्रों की संख्या बढ़ी, टेलीविजन ने संचार की दुनिया में क्रांति ला दी, डिजिटल मीडिया ने भौगोलिक सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया और सोशल मीडिया ने हर स्मार्टफ़ोन को एक चलता-फिरता प्रिंटिंग प्रेस तथा हर नागरिक को एक संभावित प्रकाशक बना दिया।

संचार का यह लोकतंत्रीकरण निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसके साथ एक अनपेक्षित परिणाम भी सामने आया है। सूचना की कोई कमी नहीं रही, किंतु विश्वसनीयता दुर्लभ होती चली गई।

मीडिया पर व्यावसायिक दबाव

आज अधिकारों की मांग पहले से कहीं अधिक मुखरता के साथ की जाती है, लेकिन उनके साथ जुड़ी जिम्मेदारियों को अक्सर भुला दिया जाता है। मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा तीव्र व्यावसायिक दबावों के बीच काम कर रहा है, जहाँ टीआरपी, विज्ञापन से होने वाली आय और बाज़ार की प्रतिस्पर्धा कई बार संपादकीय विवेक पर भारी पड़ जाते हैं। परिणामस्वरूप पत्रकारिता के सार्वजनिक सेवा बने रहने से पहले उसके केवल एक कारोबार में बदल जाने का खतरा बढ़ता जा रहा है।

सोशल मीडिया ने इस चुनौती को और अधिक गंभीर बना दिया है। उसने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन साथ ही बिना सत्यापन, बिना संपादकीय संयम और बिना किसी जवाबदेही के तत्काल राय व्यक्त करने की प्रवृत्ति को भी वैधता प्रदान कर दी है। आज हर स्मार्टफ़ोन धारक स्वयं एक प्रकाशक है। सत्य को अफवाहों से, तथ्य को फॉरवर्ड किए गए संदेशों से और प्रमाण को गढ़ी हुई धारणाओं से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। सोशल मीडिया में गति को सटीकता से अधिक, आक्रोश को विवेक से अधिक और सनसनी को सार्थकता से अधिक महत्व मिलता है।

इस पूरे परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत जनता के विश्वास ने चुकाई है। दुर्भाग्य से अब एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है, जिसमें हर सार्वजनिक मुद्दे को सबसे पहले राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जाता है। तथ्य स्थापित होने से पहले ही निष्कर्ष घोषित कर दिए जाते हैं। जांच पूरी होने से पहले ही लोगों की मंशा तय कर दी जाती है। सार्वजनिक विमर्श अब प्रमाणों की अपेक्षा धारणाओं से अधिक संचालित होने लगा है।

यह स्थिति इसलिए खतरनाक है क्योंकि आज के समय में धारणा सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हथियार बन चुकी है। तथ्यों को प्रमाण चाहिए होते हैं, लेकिन धारणाओं को केवल बार-बार दोहराया जाना पर्याप्त होता है। और जब किसी धारणा को लगातार दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे स्वयं को सत्य का रूप देने लगती है।

पत्रकारिता और प्रचार (प्रोपेगैंडा) के बीच अंतर हमेशा बहुत स्पष्ट रहा है। पत्रकारिता सत्ता में बैठे लोगों से कठिन प्रश्न पूछती है, जबकि प्रोपेगैंडा उन लोगों से कठिन प्रश्न पूछता है जो सत्ता से प्रश्न पूछते हैं। इन दोनों के बीच का अंतर कभी धुंधला नहीं होना चाहिए।

मुझे आज भी उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय विष्णुकांत शास्त्री के साथ हुई एक बातचीत याद है। पत्रकारिता के बदलते चरित्र पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था, "स्वतंत्रता आंदोलन के समय पत्रकारिता एक मिशन थी, बाद में वह एक पेशा बनी और आज उसका बड़ा हिस्सा एक उपद्रव बन गया है।" उस समय उनका यह कथन कुछ कठोर लगा था, लेकिन आज वह आश्चर्यजनक रूप से भविष्यवाणी जैसा प्रतीत होता है।

इसी तरह की चिंता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने भी एक बार मुझसे व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था, "पहले हम अखबार पढ़ते थे, आज केवल उन्हें देखते हैं।" उनका आशय लोगों की साक्षरता से नहीं था, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता से था। उनका संकेत इस ओर था कि प्रस्तुति ने धीरे-धीरे सामग्री पर वर्चस्व स्थापित कर लिया है और गंभीर विश्लेषण की जगह सनसनी ने ले ली है।

समय के साथ नीट आंदोलन भी इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। पेपर लीक को लेकर उठा विवाद समाप्त हो जाएगा। सरकारें बदलेंगी, मंत्री आएंगे और जाएंगे तथा राजनीतिक दल सत्ता के लिए अपना अंतहीन संघर्ष जारी रखेंगे। लेकिन एक प्रश्न हमेशा जीवित रहेगा। क्या पत्रकारिता सत्य के साथ खड़ी थी, या फिर किसी पूर्वनिर्धारित नैरेटिव के साथ?

इस प्रश्न का उत्तर केवल मीडिया की प्रतिष्ठा तय नहीं करेगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य का भी निर्धारण करेगा। लोकतंत्र इसलिए कमजोर नहीं होते कि सरकारें गलतियाँ करती हैं। वे तब कमजोर होने लगते हैं, जब उन गलतियों पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी जिन संस्थाओं को सौंपी गई है, वही संस्थाएँ उन गलतियों को उचित ठहराने लगती हैं।

स्वतंत्र मीडिया की आवश्यकता

एक स्वस्थ लोकतंत्र को निस्संदेह एक मजबूत सरकार की आवश्यकता होती है। उतनी ही आवश्यकता एक सतर्क और प्रभावी विपक्ष की भी होती है। लेकिन इन सबसे बढ़कर उसे ऐसे स्वतंत्र मीडिया की आवश्यकता होती है, जो न सरकार से भय खाए, न विपक्ष से प्रभावित हो और जिसकी जवाबदेही केवल सत्य के प्रति हो।

इतिहास सरकारों का मूल्यांकन इस आधार पर करता है कि उन्होंने सत्ता का उपयोग किस प्रकार किया। वह विपक्ष का आकलन इस आधार पर करता है कि उसने कौन-से मुद्दे उठाए। लेकिन मीडिया के लिए इतिहास का पैमाना इन दोनों से भी अधिक कठोर होता है, सत्य के प्रति उसकी निष्ठा।

जिस दिन लोकतंत्र का प्रहरी जनता की रक्षा करने के बजाय सत्ता की रखवाली करने लगे, उस दिन लोकतंत्र भले ही अपने बाहरी स्वरूप में जीवित दिखाई दे, लेकिन उसकी आत्मा क्षीण होने लगती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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