Opinion

अगर तबलीगी जमात आपराधिक लापरवाही नहीं करती तो हम लोग अब तक यह सोचना शुरु कर देते कि इस तालाबंदी से कैसे छुटकारा पाया जाए! किन-किन मामलों में कितनी-कितनी ढील दी जाए।

कोरोना-युद्ध में केंद्र और दिल्ली की सरकार को उसी सख्ती का परिचय देना चाहिए था, जो इंदिरा गांधी ने 1984 में पंजाब में दिया था। दो हफ्ते तक मरकजे-तबलीगी जमात के जमावड़े को वह क्यों बर्दाश्त करती रही?

कोरोना वायरस पर सोशल मीडिया, वाट्सऐप और इंटरनेट के माध्यम से कई बातें फैल रही हैं। इनमें से कुछ सही हैं, तो बहुत-सी बातें बिल्कुल निराधार हैं। ऐसे समय में जब कोरोना वायरस महामारी बनकर दुनियाभर में हजारों लोगों की जान ले चुका है, तो इससे जुड़े कुछ अनिवार्य पहलुओं के बारे में जानना जरूरी है। 

चीन की अर्थव्यवस्था को कोरोना की वजह से तगड़ा झटका लगा है। इस तिमाही में चीन की इकॉनमी में 9% की गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है। जनवरी-फरवरी में खुदरा बिक्री 23.5% तक गिर गयी। औद्योगिक उत्पादन में 13.5% की गिरावट दर्ज की गई।

भारत में कोरोना ने इतना वीभत्स रुप धारण नहीं किया था, जितना उसने चीन, इटली, स्पेन और अमेरिका जैसे देशों में कर लिया है लेकिन निजामुद्दीन के मरकजे-तबलीगी जमात ने भारत में भी खतरे की घंटियां बजवा दी हैं।

दुनिया के सभी देशों में वक्त का पहिया ठहर गया है। रफ़्तार रुक गई है। कोरोना से जो वैश्विक संकट आया है। इस संकट से उबरने का जो तरीक़ा है, वह बस यही है-“हौसला और घोंसला मत छोड़िये सब ठीक हो जायेगा। युद्ध थोड़ा अलग है, दूरी बनाकर लड़िये।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के उन लोगों से माफी मांगी है, जिन्हें इस तालाबंदी (लाॅकडाउन) के कारण अपने गांवों की तरफ दौड़ना पड़ा है। लेकिन उन्होंने तालाबंदी की मजबूरी पर भी जोर दिया है। मोदी की इस विनम्रता और सहृदयता पर किसी को भी शक नहीं होना चाहिए।

कोरोना वायरस से जारी जंग में लापरवाही बरतने वाले या नियमों को तोड़ने वाले न सिर्फ अपनी ज़िंदगी से बल्कि दूसरों की ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ये कहना है प्रबुद्ध नागरिकों का जो प्रधानमंत्री की अपील का अक्षरशः पालन कर रहे हैं।

बेनी प्रसाद वर्मा (बेनी बाबू, 79) के छात्र जीवन (1958-60) की दो विशिष्टताएं रहीं। तब वे शिक्षा की दहलीज पर थे। प्रचलन यह था कि जनपदीय छात्र डिग्री कॉलेज में दाखिले की कोशिश ही करते थे।

जिले में प्रशासन भले ही कोरोना वायरस के खिलाफ सक्रिय है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इतनी जागरूकता व सख्ती के बावजूद भी लोग इकट्ठा होने से बाज नहीं आ रहे हैं। गोपीगंज क्षेत्र के कुछ गावों में युवा क्रिकेट खेलने से बाज नहीं आ रहे हैं।