Ankita Bhandari Case: एक सीट, एक नौकरी और एक जिंदगी की कीमत शून्य क्यों?
Ankita Bhandari Case: अंकिता भंडारी, पवन शर्मा और दलजीत की मौत ने इंसानी जिंदगी की कीमत, बढ़ती हिंसा, वीआईपी संस्कृति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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Ankita Bhandari Case: सितंबर, 2022 में हुई अंकिता भंडारी की हत्या और पिछले सप्ताह हुई पवन शर्मा और दलजीत की मौतें समाज से सिर्फ एक सवाल पूछ रहीं हैं कि इंसान की जिंदगी इतनी सस्ती क्यों है? एक आम आदमी के लिए न्याय के लिए लड़ना इतना बड़ा सवाल क्यों है, रसुखदार के लिए इतनी छूट क्यों है? किसी की जिंदगी एक नौकरी के दौरान समझौता न करने की एवज में खत्म हो जाती है, तो किसी की एक सीट को लेकर हुए विवाद में और किसी की इसलिए कि वह अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ न्याय की उम्मीद करता है। सब घटनाएं अलग-अलग हैं, परिस्थितियां भी अलग हैं, लेकिन इन सबके भीतर एक बहुत बेचैन कर देने वाली समानता है। क्या समाज में इंसान की जिंदगी का मूल्य लगातार कम होता जा रहा है? कानून, सामाजिक मर्यादाएं और मानवीय संवेदनाएं उस समय बौने हो जातें हैं, जब कानून के सामने ताकत, सामाजिक मर्यादाओं के सामने अहंकार और मानवीय संवेदनाओं के सामने प्रभाव का प्रदर्शन होता है।
देवभूमि उत्तराखंड की 19 वर्षीया अंकिता भंडारी, दिल्ली मेट्रो में जान गंवाने वाले 48 वर्षीय पवन शर्मा और दिल्ली के एक नाइटक्लब में कथित मारपीट के बाद मारे गए 29 वर्षीय दलजीत की ये घटनाएं इस सवाल को हमारे सामने खड़ा करती हैं। सबसे पहली बात ये कतई एक ही तरह के अपराध नहीं थे और न ही एक-दूसरे से संबंधित। लेकिन ये उस सामाजिक मानसिकता पर सवाल जरूर उठाते हैं जिसमें एक छोटी-सी बात हिंसा में बदल गई, कमजोर व्यक्ति की सुरक्षा संकट में पड़ गई और बेटी के लिए न्याय की मांग के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
सितंबर, 2022 में उत्तराखंड के ऋषिकेश स्थित वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करने वाली 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या ने उत्तराखंड के पहाड़ों समेत पूरे देश को झकझोर दिया था। अपने परिवार की कमजोर आर्थिक परिस्थितियों के बीच घर से बाहर काम करने को निकली एक युवा लड़की के सामने अपना भविष्य बनाने के सपने थे। अपने परिवार को आर्थिक सहायता देने की जिम्मेदारी थी लेकिन उसकी जिंदगी असमय छीन ली गई क्योंकि उसने अपनी नौकरी के लिए अपनी देह से समझौता करने से मना कर दिया था। इस मामले में वनंतरा रिसॉर्ट के पूर्व मालिक पुलकित आर्य और उसके दो साथियों सौरभ भास्कर व अंकित गुप्ता को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई। फिलहाल यह विवाद एक बार फिर चर्चा में आया है। अंकिता के परिवार ने कथित वीआईपी एंगल की सीबीआई जांच पूरी होने तक उनकी नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग की है।
अंकिता का मामला मात्र एक हत्या की कहानी नहीं है, यह
आईना दिखाता है उस सामाजिक व्यवस्था को भी जिसमें छोटे शहरों और कस्बों से निकलकर काम करने वाली युवतियों को आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़े होने से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता करनी पड़ती है। भले ही परिवार से दूर रहकर नौकरी करना उनके लिए आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और स्वावलंबन की नई राह खोलता है, पर साथ ही उस राह पर स्वतंत्रता अधूरी रह जाती है जब कार्यस्थलों पर सुरक्षा न हो, शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई न होती हो और सबसे महत्वपूर्ण प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित न हो। दरअसल वीआईपी संस्कृति उत्तरदायित्व के नाम पर देश की राजनीतिक जड़ों के साथ-साथ सामाजिक जड़ों में भी मट्ठा डाल रही है। किसी लड़की को रोजगार दे देने भर से किसी भी संस्था की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। किसी लड़की को नौकरी दे देना उसके ऊपर किसी भी तरह का अवांछनीय अधिकार नहीं दे देता है, कि उससे दूसरों के सामने पर उसे परोसे जाने की कुत्सित इच्छा पूरी करना चाहें। उसकी गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि उसे नौकरी दे देना। अंकिता के परिवार द्वारा की जा रही न्याय संबंधी गुहार याद दिलाती हैं कि किसी मामले में दोषियों को सजा हो जाना महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह गए हों, तो उनकी जांच भी पारदर्शी और कानून सम्मत तरीके से होनी चाहिए। फिर भी सवाल यह उठ खड़ा होता है कि घर से बाहर निकली लड़कियों की सुरक्षा आखिर किसकी जिम्मेदारी है?
हाल ही में दिल्ली मेट्रो में पवन शर्मा की मौत का मामला हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में बढ़ती विसंगतियों और असंवेदनशीलता की एक और भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 48 वर्षीय पवन अपनी मां दुर्गा देवी के साथ मेट्रो में यात्रा कर रहे थे। बुजुर्गों के लिए आरक्षित सीट को लेकर हुए एक मामूली विवाद में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी संजय प्रताप सिंह और उनके बेटे सिद्धार्थ सिंह ने पवन के साथ इतनी मारपीट की कि घटना के बाद पवन की मौत हो गई। मौत का कारण चाहे जो भी रहे लेकिन उस कारण के मूल में मेट्रो में आरक्षित सीट को लेकर हुए विवाद में हुई मारपीट ही है।
पुलिस द्वारा दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है तथा अपनी तरफ से निर्णय सुनाने से पहले मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्षों का इंतजार किया जाना चाहिए।
यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एक सीट को लेकर विवाद क्यों हुआ? बल्कि असली सवाल यह है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर असहमति जताने का हमारा तरीका इतना हिंसक क्यों होता जा रहा है? किसी एक व्यक्ति की सामाजिक हैसियत, पद या प्रभाव ने उसे दूसरे इंसान के साथ अपमानजनक व्यवहार करने का अधिकार कब से दे दिया है? आखिर क्यों किसी विवाद में अपनी बात मनवाने के लिए शारीरिक बल का प्रयोग बहुत सामान्य होता जा रहा है? मेट्रो जैसा सार्वजनिक परिवहन जिसमें प्रतिदिन लाखों लोग यात्रा करते हैं। वहां सीट, लाइन, धक्का-मुक्की या पहले रास्ता देने जैसे छोटे-छोटे मुद्दों पर मतभेद होना अ सामान्य सी बात है। लेकिन मतभेद और हिंसा के बीच में कोई तो अंतर होना चाहिए। जब एक व्यक्ति अपने गुस्से पर नियंत्रण खो देता है, तब कोई एक मामूली सा विवाद किसी
परिवार की पूरी दुनिया को उजाड़ सकता है। किसी भी यात्री के साथ इस तरह से की गई इतनी मारपीट कि यात्री की जान चली जाए नितांत अक्षम्य अपराध है। मेट्रो में यात्रा कर रहे पवन की मां के सामने ही उनके बेटे की जिंदगी खत्म हो जाना उस पीड़ा का अहसास कराता है, जिसे कोई न्यायिक आदेश कभी भी पूरी तरह दूर नहीं कर सकता। भले ही माननीय न्यायालय ने दोनों अपराधियों को हिरासत में लेने का फैसला सुना दिया हो पर यह घटना सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा, हिंसक व्यवहार को रोकने और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाती है।
एक और घटना में दिल्ली के इंद्रलोक इलाके में स्थित एक नाइटक्लब में पिछले सप्ताह 29 वर्षीय दलजीत की मौत ने एक और चिंताजनक तस्वीर समाज के सामने रखी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सारा विवाद किसी के कपड़ों पर बीयर गिरने की एक घटना के बाद शुरू हुआ। आरोप है कि क्लब के प्रबंधक, मालिक और तीन बाउंसरों ने दलजीत तथा उसके साथियों के साथ मारपीट की। दलजीत गंभीर रूप से घायल हुआ और बाद में उसे अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया। बताया जाता है कि दलजीत अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था और उसके पीछे पत्नी तथा छोटा बेटा रह गए। एक मामूली विवाद का इतना भयावह किसी की जिंदगी ले लेने वाला परिणाम किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
नाइटक्लब, बार के साथ -साथ मनोरंजन के अन्य सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल ग्राहकों तक सीमित नहीं हो सकती। वहां तैनात कर्मचारियों और बाउंसरों को विवाद शांत करने का प्रशिक्षण अवश्य ही मिलना चाहिए, लेकिन किसी को सबक सिखाने के नाम पर हिंसा करने की छूट नहीं होनी चाहिए। किसी ग्राहक द्वारा अनुचित व्यवहार की शिकायत हो तो उसके लिए पुलिस और कानूनी प्रक्रिया मौजूद है या साथ ही उसे बातचीत के आधार पर भी सुलझाया जा सकता है। किसी को पीटने, धमकाने या उसकी जान लेने का अधिकार किसी भी निजी प्रतिष्ठान को नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही गुवाहाटी के एक नाइट क्लब से भी एक महिला के साथ उसके बाउंसरों द्वारा अभद्र व्यवहार करने की घटना सामने आई थी। ये घटनाएं सवाल यह भी पूछती है कि क्या हमारे शहरों में मनोरंजन के नाम पर चलने वाले प्रतिष्ठानों की निगरानी पर्याप्त है? क्या लाइसेंस, सुरक्षा नियमों, कर्मचारियों के आचरण और हिंसक घटनाओं पर जवाबदेही की नियमित समीक्षा होती है? किसी व्यक्ति की जान जाने के बाद कार्रवाई होना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने की व्यवस्था पहले से मौजूद होनी चाहिए।
अंकिता, पवन और दलजीत की मौत की घटनाओं की परिस्थितियां अलग हैं। इन तीनों को एक ही श्रेणी में रखकर उनके कानूनी और मूल तथ्यों के अंतर को मिटाना सही नहीं होगा। फिर भी, इनके बीच एक साझा सामाजिक चिंता है कि क्या हम दूसरे व्यक्ति की गरिमा और जीवन के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं? क्या अधिकार और ताकत का अर्थ दूसरों पर नियंत्रण स्थापित करना हो गया है? क्या गुस्सा, अहंकार और तात्कालिक आवेश अब बातचीत और विवेक की जगह लेते जा रहे हैं?
इन सवालों का उत्तर केवल सिर्फ कानून के माध्यम से ढूंढने से नहीं मिलेगा। कानून अपराधियों के लिए दंड निर्धारित कर सकता है, लेकिन हिंसा को रोकने के लिए, इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सामाजिक व्यवहार में भी बदलाव बहुत जरूरी है। बच्चों को बचपन से यह सिखाना होगा कि सामने वाले की असहमति किसी का अपमान नहीं है, किसी मामले में हार स्वीकार करना कमजोरी नहीं है और किसी विवाद में पीछे हट जाना अपनी प्रतिष्ठा खो देना नहीं बल्कि उस प्रतिष्ठा को बचाए रखना है।