Socialism in India: समाजवाद यदि नारा है, तो हर भारतीय समाजवादी है
Socialism in India: असम के प्रमुख कवि और राजनेता हेम बरुआ ने 1970 के लोकसभा भाषण में समाजवाद, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और भूमि सुधार पर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए।
Socialism in India
Socialism in India: मैंने राष्ट्रपति का भाषण सुना है। श्री हनुमन्तव्या ने उनके भाषण को शानदार बताया है, पर मैं इसमें ऐसी कोई बात नहीं पाता हूं। मैं चाहता था कि यह अभिभाषण सरकार के विचारों का आभास दे और साथ ही साथ इसमें देश के सामाजिक परिवर्तन का भी वर्णन होना चाहिए था, परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ भी नहीं है। यह अभिभाषण तो एकदम निष्प्राण-सा है। मेरे विचार से राष्ट्रपति और राज्यपालों का पद केवल सम्मानसूचक है, जिसको बनाए रखने के लिए साधारण करदाताओं पर भार पड़ता है। अतएव राष्ट्रपति और राज्यपालों का पद समाप्त कर देना चाहिए। अभिभाषण में कृषि क्रांति का वर्णन किया गया है, मैं इसके लिए बधाई देता हूं, परंतु इसमें भूमि सुधार का केवल संकेत दिया गया है। लेकिन जब तक भूमि गरीब किसानों को नहीं दी जाती है, तब तक कृषि क्रांति को पूर्ण नहीं माना जा सकता है। कृषि क्रांति के साथ-साथ मूल्यों में वृद्धि आई है। सरकार इस वृद्धि को रोकने के लिए क्या कर रही है, इसके बारे में. अभिभाषण में कुछ भी नहीं कहा गया है। मूल्यों की वृद्धि को रोकना आवश्यक है, क्योंकि इससे आम आदमी प्रभावित होता है।
हम समाजवाद की बात करते हैं, पर समाजवाद केवल एक नारा नहीं है। यदि यह केवल नारा है. तो हर भारतीय समाजवादी है। और यदि समाजवाद का तात्पर्य कार्यक्रम बनाकर उसे क्रियान्वित करना है, तो इस देश में कोई समाजवादी नहीं है। समाजवाद के नाम पर साधारण आदमी का शोषण किया जाता है। समाजवाद और प्रजातंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। आज लोगों की आय में अंतर है, जिसे दूर करना है, पर अभिभाषण में इसका कोई वर्णन नहीं है। जो एकाधिकारी अधिनियम बनाया गया है, उसमें भी कई दोष हैं। इस समय भारत में दो प्रकार की सभ्यताएं हैं- एक तो कुछ अमीरों की सभ्यता और दूसरी गरीबों की सभ्यता। इसके लिए अविभक्त कांग्रेस उत्तरदायी है। वे प्रतिक्रियावादी की बातें करते हैं, परंतु उन्होंने स्वयं इस प्रवृत्ति को बढ़ाया है। यदि आप एकाधिकारी तत्वों पर रोक लगाना चाहते हैं, तो कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
सरकार आय पर अधिकतम सीमा निर्धारित करने की बात कर रही है। पर हमारी 82 प्रतिशत ग्रामीण जनता प्रतिदिन एक रुपया से कम व्यय करती है। दूसरी ओर टाटा, बिड़ला, मफतलाल आदि की आय करोड़ों रुपये बढ़ रही है। इस प्रकार समाजवादी कार्यक्रम के बिना समाजवाद की बातें करना निरर्थक है। राजनीति में नीति-शास्त्र का होना आवश्यक है। अय्यर आयोग और मुधोलकर आयोग ने बिहार के कुछ राजनीतिज्ञों के विरुद्ध निर्णयात्मक टिप्पणी दी है, मेरा कांग्रेस तथा देश के अन्य राजनीतिक दलों से अनुरोध है कि वे इस प्रकार के व्यक्तियों को राजनीतिक दलों में आने से रोकें। ऐसा करके वे यह सिद्ध कर सकेंगे कि राजनीतिक दलों में ईमानदारी विद्यमान है।
इस देश में समाजवाद की बातें करना आसान है, पर उस पर अमल करना बहुत कठिन। जो समाजवाद की बातें करते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि समाजवाद एक जीवन पद्धति है। यह अभिभाषण देश में शिक्षित बेरोजगारी की समस्या पर चुप है। देश में इनकी संख्या बढ़ रही है और वे अशांत हो रहे हैं। सरकार ने इस दिशा में क्या किया है? सरकार को रोजगार के अवसर सुलभ कराने चाहिए।
( साभार ‘अमर उजाला’ , असम के प्रमुख कवि और राजनेता के 27 फ़रवरी, 1970 को लोकसभा में दिये गये भाषण के अंश।)
-हेम बरुआ