वंदे मातरम्: रचना से राष्ट्रगीत तक, दो पद से छह पद तक और 2026 के नए विवाद की पूरी कहानी
Vande Mataram History: ‘वंदे मातरम्’ के 1905 के इतिहास से 2026 के लाल किले तक की पूरी कहानी जानिए। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रंगपुर के 200 बच्चों और इस गीत के संघर्ष की कहानी पढ़ें।
Vande Mataram History 1905 Explained
Vande Mataram History: 15 अगस्त, 2026 की सुबह लाल किले पर राष्ट्रगान से पहले वह गीत गाया गया, जिसे गाने और बोलने की कभी सजा मिलती थी। 1905 में बंगाल के रंगपुर में एक स्कूल के दो सौ बच्चों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाया गया था। उनका अपराध था—‘वंदे मातरम्’ कहना। उस समय पांच रुपये किसी स्कूली बच्चे और उसके परिवार के लिए बहुत बड़ी रकम थी।और 121 साल बाद उसी गीत पर लाल किले के ऊपर भारतीय वायुसेना के दो एमआई-17 हेलिकॉप्टर पुष्पवर्षा कर रहे थे। एक राष्ट्रीय ध्वज के साथ था और दूसरा ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने की स्मृति लिए हुए।
तब जुर्माना लगा था। आज फूल बरसे।
बीच में 121 वर्ष हैं। और एक आदमी है, जिसने इसमें से कुछ भी नहीं देखा। उस आदमी तक पहुंचने से पहले केवल तीन दिन पीछे चलते हैं।12 अगस्त, 2026 को पश्चिम बंगाल के नैहाटी में कांठालपाड़ा मोहल्ले के एक पुराने घर के सामने भारतीय सेना की पूर्वी कमान की ब्रह्मास्त्र कोर का बैंड पहुंचा। वहां वही धुन बजाई गई, जो तीन दिन बाद लाल किले पर गूंजने वाली थी—‘वंदे मातरम्’।
सामने वह पुराना घर था। बंकिमचंद्र का परिवार था। मोहल्ले के लोग थे। आसपास के स्कूलों के बच्चे और शिक्षक थे। सेना की पूर्वी कमान ने अपने आधिकारिक विवरण में शांतनु चट्टोपाध्याय का नाम लिया और उन्हें बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की पांचवीं पीढ़ी का वंशज बताया।
अब उस घर के भीतर चलिए। असली कहानी वहीं से शुरू होती है।
कांठालपाड़ा। 1838।
27 जून, 1838 को एक परंपरागत बंगाली ब्राह्मण परिवार में एक बच्चा पैदा हुआ। नाम रखा गया—बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय। पिता यादवचंद्र चट्टोपाध्याय ब्रिटिश प्रशासन में सरकारी अधिकारी थे।आगे चलकर मेदिनीपुर के डिप्टी कलेक्टर बने। परिवार में साहित्य का संस्कार भी था। बंकिम के भाई संजीबचंद्र चट्टोपाध्याय भी आगे चलकर लेखक बने। उनकी पलामौ बांग्ला साहित्य की चर्चित कृतियों में गिनी गई। बंकिम ने हुगली में पढ़ाई की, फिर हुगली मोहसिन कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज पहुंचे। और यहां एक तथ्य ऐसा है जो आज सुनने में अविश्वसनीय लगता है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय की पहली स्नातक परीक्षा हुई। केवल दो विद्यार्थी सफल हुए—जदुनाथ बोस और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय। ये दोनों उस विश्वविद्यालय के पहले स्नातक बने। 1858 में बंकिम सरकारी सेवा में आ गए। वे डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर बने। जिस ब्रिटिश राज के विरुद्ध उनके लिखे शब्द आगे चलकर विद्रोह का उद्घोष बनने वाले थे, उसी राज की प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर उन्होंने तीन दशक से अधिक नौकरी की।
बेटे ने एक अर्थ में पिता का रास्ता चुना था। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि इसी रास्ते पर चलते हुए वह कुछ ऐसा लिख देगा जो उस शासन के लिए चुनौती बन जाएगा जिसकी तनख्वाह वह खुद पाता था। अब उनकी जिंदगी का वह हिस्सा, जो अक्सर पीछे छूट जाता है।
शुरुआत उन्होंने कविता से की। ईश्वरचंद्र गुप्त के ‘संवाद प्रभाकर’ में उनकी शुरुआती रचनाएं छपीं। फिर उन्होंने बांग्ला में एक कथा लिखी और उसे पुरस्कार प्रतियोगिता में भेज दिया।वे हार गए। पुरस्कार नहीं मिला। वह पांडुलिपि प्रकाशित भी नहीं हुई और समय के साथ लगभग लुप्त हो गई। जरा सोचिए। जिस आदमी को आगे चलकर आधुनिक बांग्ला कथा-साहित्य के महानतम निर्माताओं में गिना जाना था, उसकी शुरुआती कथा एक प्रतियोगिता हारकर इतिहास में लगभग खो गई।लेकिन लेखक नहीं खोया।अगली बार उसने भाषा बदल दी।
1864 में ‘राजमोहन’स वाइफ’ अंग्रेजी में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। जिस व्यक्ति के लिखे बांग्ला शब्द आगे करोड़ों भारतीयों में जोश भरने वाले थे, उसके उपन्यासकार जीवन की प्रकाशित शुरुआत अंग्रेजी से हुई।फिर बंकिम अपनी भाषा की ओर लौटे। नौकरी के दौरान वे आरामबाग क्षेत्र में भी रहे। उसी इलाके में गढ़ मंदारण का पुराना किला था। उसके खंडहरों ने बंकिम की कल्पना को छुआ और आगे चलकर दुर्गेशनंदिनी की कथा-भूमि बने।1865 में ‘दुर्गेशनंदिनी’सप्रकाशित हुई। इसे बिना किसी सावधानी के ‘बांग्ला का पहला उपन्यास’ कहना ठीक नहीं होगा।,क्योंकि उससे पहले भी बांग्ला में उपन्यासात्मक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी थीं। लेकिन दुर्गेशनंदिनी आधुनिक बांग्ला उपन्यास परंपरा की आधारशिला रखने वाली पहली महान और अत्यंत प्रभावशाली कृतियों में निर्विवाद रूप से शामिल है।
एक असफल पांडुलिपि से दुर्गेशनंदिनी तक—बीच में कुछ वर्ष और एक आदमी की जिद। इसके बाद कलम रुकी नहीं।’कपालकुंडला’, ‘मृणालिनी’, ‘विषवृक्ष’, ‘कृष्णकांतेर विल’, ‘राजसिंह’, ‘देवी चौधरानी’, ‘सीताराम’—एक के बाद एक रचनाएं आती गईं। बंकिम केवल कहानियां नहीं लिख रहे थे। वे आधुनिक बांग्ला गद्य की भाषा और उसकी संभावनाओं को आकार दे रहे थे।
1872 में उन्होंने अपनी पत्रिका ‘बंगदर्शन’ शुरू की। साहित्य, समाज, धर्म, इतिहास, दर्शन और तत्कालीन बौद्धिक प्रश्नों पर यह पत्रिका बंगाल के नवजागरण का महत्वपूर्ण मंच बनी। आगे चलकर रवींद्रनाथ ठाकुर भी उसके संसार से जुड़े। 1901 में बंगदर्शन फिर निकला तो उसके संपादक स्वयं रवींद्रनाथ बने।लेकिन बंकिम के जीवन की एक दूसरी धारा भी थी। तीन दशक से अधिक की सरकारी नौकरी।
एक तरफ ब्रिटिश सरकार की सेवा और दूसरी तरफ भारतीय समाज, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को लेकर लगातार गहराता उनका चिंतन। उनके प्रशासनिक जीवन से ब्रिटिश अधिकारियों से टकराव के अनेक प्रसंग जोड़े जाते हैं। ऐसा ही एक चर्चित किस्सा बहरामपुर का है, जिसमें उनकी पालकी अंग्रेज अधिकारियों के क्रिकेट मैदान से गुजरने और एक ब्रिटिश अधिकारी से विवाद की बात कही जाती है। बाद में कथित रूप से मामला अदालत पहुंचा और अधिकारी को माफी मांगनी पड़ी। लेकिन इस प्रसंग के ठोस प्राथमिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं।इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय प्रचलित कथा के रूप में ही देखना चाहिए।
प्रमाणित इतिहास इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसी सरकारी अधिकारी के भीतर एक दूसरा बंकिम तैयार हो रहा था। और फिर आए वे दो शब्द—
वंदे मातरम्।
भारत सरकार 7 नवंबर, 1875 को इसकी रचना की तिथि मानते हुए इसके 150 वर्ष पूरे होने का समारोह मना रही है, हालांकि इसकी सटीक रचना-तिथि और प्रथम प्रकाशन को लेकर साहित्येतिहास में कुछ मतभेद मिलते हैं। निर्विवाद तथ्य यह है कि बंकिम ने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में स्थान दिया और 1882 में पुस्तक रूप में प्रकाशित आनंदमठ के साथ यह गीत बड़े पाठक-वर्ग तक पहुंचा।
‘वंदे’—मैं वंदना करता हूं।
‘ मातरम्’—मां की।
दो शब्द।
लेकिन आगे चलकर इन्हीं दो शब्दों से एक साम्राज्य परेशान होने वाला था।’आनंदमठ’सकी पृष्ठभूमि अठारहवीं सदी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के अकाल-काल से जुड़ी थी। उपन्यास में मातृभूमि केवल भूगोल नहीं रहती; वह मां के रूप में सामने आती है। यही कल्पना आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवाद के सबसे शक्तिशाली सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल गई।1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। रवींद्रनाथ ठाकुर ने वहां ‘वंदे मातरम्’ गाया। गीत साहित्य के पन्ने से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर पहुंच चुका था।
लेकिन इसे देखने के लिए बंकिम मौजूद नहीं थे। वे 1891 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राय बहादुर की उपाधि और बाद में ‘कम्पैनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर’ का सम्मान दिया। इतिहास का विरोधाभास देखिए—साम्राज्य ने जिस अधिकारी को सम्मानित किया, उसी अधिकारी के लिखे शब्द कुछ वर्षों बाद उसी साम्राज्य के विरुद्ध सबसे प्रभावशाली नारों में शामिल हो गए।
8 अप्रैल, 1894 को कलकत्ता में बंकिमचंद्र की मृत्यु हो गई।उम्र केवल 55 वर्ष।रवींद्रनाथ द्वारा कांग्रेस के मंच पर गीत गाए जाने में अभी दो वर्ष बाकी थे। रंगपुर के बच्चों पर जुर्माना लगने में ग्यारह वर्ष थे। और भारत की स्वतंत्रता 53 वर्ष दूर थी।
बंकिम चले गए।लेकिन उनके दो शब्दों की असली यात्रा अब शुरू हुई।
1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन किया। इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन खड़ा हुआ और ‘वंदे मातरम्’ उसकी धड़कन बन गया। 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता में बंगाल विभाजन के विरोध की ऐतिहासिक सभा और उससे निकले आंदोलन में यह उद्घोष चारों ओर फैल गया। गीत अब गीत नहीं रहा था। वह राजनीतिक प्रतिरोध की भाषा बन चुका था।फिर नवंबर, 1905 में रंगपुर की वह घटना हुई।एक स्कूल के दो सौ विद्यार्थियों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना।
अपराध—‘वंदे मातरम्’ कहना।
अप्रैल 1906 में बरिसाल के बंगाल प्रांतीय सम्मेलन में प्रशासन ने ‘वंदे मातरम्’ के सार्वजनिक उद्घोष पर रोक लगाने की कोशिश की। प्रतिनिधियों और युवाओं ने आदेश मानने से इनकार किया। पुलिस कार्रवाई हुई। सम्मेलन बाधित हुआ। लेकिन नारा नहीं रुका। 1908 में बेलगाम में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को मांडले भेजे जाने के समय ‘वंदे मातरम्’ बोलने वाले युवकों पर पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियों के विवरण भी सरकारी ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलते हैं।
अंग्रेज सरकार जितना रोकती गई, गीत उतना फैलता गया। बंकिम का प्रभाव केवल गीत तक सीमित नहीं था। उनके ‘अनुशीलन’ संबंधी विचारों ने उस बौद्धिक वातावरण को प्रभावित किया जिसमें आगे प्रमथनाथ मित्र और दूसरे राष्ट्रवादियों से जुड़ी अनुशीलन समिति जैसी क्रांतिकारी संस्थाएं उभरीं। बंगाल के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद पर बंकिम के विचारों की गहरी छाप दिखाई देती है।श्री अरविंद ने बंकिम को केवल साहित्यकार नहीं माना। उनके लेखन में एक आरंभिक बंकिम था—कवि और कलाकार। और एक बाद का बंकिम था—द्रष्टा और राष्ट्र-निर्माता।शायद बंकिम के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि राष्ट्र-निर्माण में उनकी भूमिका उनकी मृत्यु के बाद कहीं अधिक दिखाई दी।
अंतिम वर्षों में वे श्रीमद्भगवद्गीता पर टीका लिख रहे थे। काम पूरा नहीं हुआ। मरणोपरांत प्रकाशित उनकी गीता-व्याख्या चौथे अध्याय के उन्नीसवें श्लोक तक पहुंचकर रुक जाती है।एक अधूरी टीका। एक समाप्त जीवन।और उसके बाद शुरू होती एक ऐसी कहानी, जिसका अंत आज भी नहीं हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दशकों में ‘वंदे मातरम्’ कांग्रेस के अधिवेशनों, स्वदेशी आंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों और जेलों तक पहुंचा। लेकिन स्वतंत्रता के करीब आते-आते गीत के कुछ बाद के अंशों में देवी-रूपकों को लेकर आपत्तियां भी सामने आईं। इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन में सामान्यतः उसके पहले दो पदों को सार्वजनिक राष्ट्रीय प्रयोग में प्राथमिकता मिली।
24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया। यहां एक ऐतिहासिक सावधानी जरूरी है। संविधान सभा ने अलग प्रस्ताव पारित करके ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत घोषित नहीं किया था। राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को उसके समान सम्मान और दर्जा मिलेगा।
यह अंतर छोटा लगता है, लेकिन इतिहास लिखते समय महत्वपूर्ण है।अब एक बार फिर कांठालपाड़ा लौटिए। वह घर, जहां बंकिम का जीवन और स्मृति बसी है, आज बंकिम भवन गवेषणा केंद्र है। 11 दिसंबर, 2025 को संसद में इस भवन को लेकर सवाल उठा। पूछा गया कि क्या रखरखाव की कमी के कारण यह अपनी उपयोगिता खो रहा है और क्या इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की कोई योजना है। केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि यह पश्चिम बंगाल सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के अधीन एक स्वायत्त शोध संस्थान है। भवन का पुनरुद्धार हुआ है और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी राज्य व्यवस्था के अधीन है। इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन नहीं था।
दूसरा पक्ष भी है। बंकिम भवन से संबंधित उपलब्ध विवरण और तस्वीरें बताते हैं कि भवन के जीर्ण हिस्सों पर समय-समय पर काम हुआ है। इसलिए यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि वहां कभी कुछ हुआ ही नहीं। सही प्रश्न यह है कि बंकिम जैसी विरासत के संरक्षण के लिए जितना होना चाहिए, क्या उतना लगातार हो रहा है? बंकिम के वंशज सजल चट्टोपाध्याय ने भी इच्छा जताई कि जिस तरह बंगाल में रवींद्रनाथ की स्मृति में रवींद्र भवन सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र बने हैं, उसी तरह बंकिम के नाम पर भी सांस्कृतिक केंद्र विकसित होने चाहिए।और आवाज वहां पहुंच रही है।
एनसीसी कैडेट बंकिम भवन पहुंचे। परिवार के सदस्यों को सम्मानित किया गया। फिर 12 अगस्त, 2026 को भारतीय सेना का बैंड उसी चौखट तक पहुंचा। शांतनु चट्टोपाध्याय वहां मौजूद थे। वह धुन बजी जिसे उनके पूर्वज ने शब्द दिए थे। नैहाटी आज भी बंकिम को अपने भीतर लेकर चलता है। सड़कें, शिक्षण संस्थान और स्थानीय सांस्कृतिक स्मृतियां उनके नाम से जुड़ी हैं। जिस कांठालपाड़ा के एक घर में 1838 में एक बच्चा पैदा हुआ था, उसी इलाके की पहचान आज उस बच्चे के नाम से अलग करना कठिन है।और अब मैं इस कहानी के उस हिस्से पर लौटता हूं जो मुझे सबसे अधिक परेशान करता है।
मैं अठारह साल से न्यूज डेस्क पर बैठा हूं। दूसरों की लिखी लाइनें पढ़ता हूं, ठीक करता हूं और आगे बढ़ा देता हूं।
लेकिन बंकिम की कहानी पढ़ते हुए बार-बार उनकी उस पहली पांडुलिपि का खयाल आता है।वह पांडुलिपि जो प्रतियोगिता हार गई।जिसे पुरस्कार नहीं मिला।जो प्रकाशित नहीं हुई।और जो लगभग हमेशा के लिए खो गई।
सोचता हूं—अगर उस दिन बंकिम टूट जाते तो?
अगर उन्होंने मान लिया होता कि वे लेखक नहीं हैं?अगर एक प्रतियोगिता का फैसला उन्होंने अपने पूरे जीवन का फैसला मान लिया होता?अगर उन्होंने दूसरी किताब न लिखी होती? अगर ‘दुर्गेशनंदिनी’सन आती? अगर बंगदर्शन न निकलता?अगर आनंदमठ न लिखा जाता?और अगर एक दिन उनकी कलम से वे दो शब्द न निकलते—
वंदे मातरम्।
तो शायद 15 अगस्त, 2026 की सुबह लाल किले के ऊपर उड़ते हेलिकॉप्टरों में से एक पर कुछ और लिखा होता।इस पूरी कहानी से तीन बातें आज मेरी डायरी में गईं।
पहली—पहली हार आखिरी फैसला नहीं होती। जिस आदमी की शुरुआती पांडुलिपि प्रतियोगिता में हारकर लगभग गुम हो गई, वही आगे आधुनिक बांग्ला साहित्य के सबसे बड़े नामों में शामिल हुआ।
दूसरी—रास्ते में पड़ा हर खंडहर सिर्फ खंडहर नहीं होता। गढ़ मंदारण के टूटे हुए किले ने एक लेखक की कल्पना को छुआ और उससे ‘दुर्गेशनंदिनी’सजैसी ऐतिहासिक कृति निकली। दुनिया जिसे मलबा समझकर निकल जाती है, लेखक कभी-कभी उसी में कहानी देख लेता है।
तीसरी—जो बीज बोता है, फल हमेशा वही नहीं देखता। बंकिम स्वतंत्रता से 53 वर्ष पहले चले गए। उन्होंने रंगपुर के उन बच्चों को नहीं देखा। बरिसाल का संघर्ष नहीं देखा। क्रांतिकारियों के मुंह से अपना गीत नहीं सुना। स्वतंत्र भारत का तिरंगा नहीं देखा। संविधान सभा में अपने गीत को मिला सम्मान नहीं देखा। और लाल किले पर आसमान से बरसते वे फूल तो कल्पना से भी बहुत दूर थे।फिर भी बीज उनका था।
इस कहानी से कुछ नाम और तारीखें अपने पास रखिए—कांठालपाड़ा, गढ़ मंदारण, दुर्गेशनंदिनी, बंगदर्शन, 7 नवंबर, 1875, आनंदमठ, 1896 का कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन, रंगपुर 1905 और 24 जनवरी, 1950। अगली बार कोई बच्चा पूछे कि ‘वंदे मातरम्’ केवल दो शब्द हैं या इसके पीछे कोई इतिहास भी है, तो कहानी आपके पास होगी।और अगर आपको लगता है कि 15 अगस्त, 2026 की सुबह लाल किले की प्राचीर पर गूंजा वह गीत केवल किसी सरकारी समारोह का हिस्सा नहीं था, तो एक बार रंगपुर के उन दो सौ बच्चों को याद कीजिए।
1905 में उनके ‘वंदे मातरम्’ कहने पर पांच-पांच रुपये वसूले गए थे।
2026 में उसी गीत पर आसमान से फूल बरसे।
तब सजा थी। आज सम्मान है।
शायद इतिहास अपने पुराने हिसाब इसी तरह चुकाता है।
और शायद रंगपुर के उन दो सौ बच्चों में से किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि जिस नारे के लिए उनके घरवालों को जुर्माना देना पड़ रहा है, एक दिन उसी स्वतंत्र देश की वायुसेना उस गीत के सम्मान में लाल किले के ऊपर पुष्पवर्षा करेगी।
इसलिए इस कहानी को अपनी वॉल पर रहने दीजिए। हो सकता है इसे पढ़कर कोई पिता या मां अपने बच्चे को बताए कि आज हम जिन शब्दों को सहजता से बोल देते हैं, उन्हें बोलने की आजादी कभी मुफ्त में नहीं मिली थी।
और अगली बार जब ‘वंदे मातरम्’ गूंजे, तो केवल गीत मत सुनिएगा।उसके पीछे खड़े रंगपुर के उन दो सौ बच्चों को भी देखिएगा।उस कांठालपाड़ा के घर को भी।उस खोई हुई पहली पांडुलिपि को भी।और उस लेखक को भी, जिसने अपने लगाए वृक्ष की छाया कभी नहीं देखी।
वंदे मातरम्।
(लेखक ऐसे लोगों, घटनाओं और जगहों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, जिनके नाम तो लगभग सब जानते हैं, लेकिन जिनकी पूरी कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।)
कमेंट में एक बात जरूर बताइए—आपने ‘वंदे मातरम्’ पहली बार कब और कहां गाया था? स्कूल की प्रार्थना में, किसी मैदान में, किसी राष्ट्रीय पर्व पर, या किसी ऐसी सुबह जिसे आप आज भी नहीं भूले हैं?