Dussehra Mela in Jaipur: जयपुर का रावण अनोखा क्यों? दस सिरों में एक गधे का सिर

Ravan Dahan in Jaipur: जयपुर के आदर्श नगर दशहरे में जलने वाला 105 फीट ऊंचा रावण खास है—इसके दस सिरों में एक गधे का सिर होता है।

Update:2025-09-23 15:17 IST

Dussehra Celebration in Jaipur Unique Ravana Dahan Information in Hindi(Image Credit-Social Media)

Dussehra Mela in Jaipur:  नवरात्रों के आरंभ के साथ ही अब राम के 14 वषों के वनवास बाद अयोध्या वापसी की तैयारियां भी जोरों पर हैं। मंदिर से लेकर पंडालों में विविध प्रकार की भव्य सजावट इस शुभता की ओर संकेत देती हुई नजर आ रही है। दीपोत्सव के साथ ही रावण दहन हिन्दू धर्म में बेहद बड़ा पर्व माना जाता है। यही वजह है कि इन दिनों पूरे देश में रावण अपने खास आध्यात्मिक महत्व के साथ ही नए रूप और कद-काठी के चलते लोगों के बीच रोमांच का केंद्र बना हुआ है। भारत की खासियत यही है कि यहां हर त्योहार केवल धार्मिक रस्मों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिलों को जोड़ने और समाज को एक सूत्र में पिरोने का जरिया बन जाता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में दशहरे का मेला इस बात की सबसे खूबसूरत मिसाल पेश करता है। आदर्श नगर के दशहरा मैदान में हर साल जलने वाला 105 फीट ऊंचा रावण और 90 फीट का कुम्भकर्ण कोई साधारण कारीगर नहीं, बल्कि मथुरा से आए एक मुस्लिम परिवार के हाथों से तैयार होता है। यह परंपरा आज नहीं, बल्कि पांच पीढ़ियों से चल रही है। आइए जानते हैं इस अनोखी गंगा जमुनी परम्परा के बारे में विस्तार से -

डेढ़ महीने लगातार दिनरात की मेहनत के बाद कहीं तैयार होता है कुंभकर्ण



लंबे समय से चली आ रही परम्परा के मुताबिक हर जन्माष्टमी के अगले ही दिन यह मुस्लिम परिवार जयपुर पहुंच जाता है। श्रीराम मंदिर प्रन्यास आदर्श नगर के परिसर में वे अपना डेरा डालते हैं। करीब डेढ़ महीने तक मंदिर ही उनका घर बन जाता है। इसी दौरान बांस, कपड़ा, कागज और रंगों से रावण और कुम्भकर्ण की विशाल काया खड़ी होती है। खास बात यह है कि जब तक वे मंदिर में रहते हैं, पूरा परिवार शाकाहारी जीवन अपनाता है और धार्मिक अनुशासन का पालन करता है।

पिछली पांच पीढ़ियों से चली आ रही ये परम्परा

कारीगर चांद बाबू, जिनके परिवार ने पिछली पांच पीढ़ियों से इस परंपरा को जीवित रखा है, गर्व से बताते हैं कि उनके दादा-परदादा ने सबसे पहले 20 फीट का रावण बनाया था। आज वही रावण बढ़कर 105 फीट का हो चुका है। उनका कहना है कि भले ही परिवार का मूल पेशा कपड़े की सिलाई और चांदी की पाजेब बनाना है, लेकिन दशहरे के समय सबकुछ छोड़कर वे जयपुर आते हैं। उनके लिए यह काम सिर्फ आजीविका नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ाव के साथ ही समाज से जुड़ने का ज़रिया भी है।

आपसी मेल-जोल और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बन चुका है ये मेला

श्रीराम मंदिर प्रन्यास आदर्श नगर, जयपुर में होने वाले इस आयोजन के संयोजक राजीव मनचंदा का इस बारे में कहना है कि, यह मेला केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल भी बन चुका है। मंदिर में इस भव्य आयोजन के प्रति मुस्लिम परिवार का समर्पण यह दिखाता है कि धर्म कभी दीवार नहीं बनाता, बल्कि रिश्तों को मजबूत करता है। कारीगर राजा खान इस मेले के बारे में और भी गहरी बात कहते हैं। उनका कहना है कि, यह मेला केवल रावण जलाने का प्रतीक नहीं बल्कि यह जाति और मजहब की दूरी मिटाने का संदेश भी देता है।

क्या है गधे का सिर और उससे जुड़ी मान्यता

आदर्श नगर का रावण अपने रूप से भी खास है। यहां रावण के दस सिरों में से एक सिर गधे का होता है। यह परंपरा मंदसौर से ली गई है। मान्यता है कि यह गधे का सर असल में अहंकार का प्रतीक है, जो इंसान को मूर्खता की ओर धकेलता है। यही वजह है कि यहां आने वाले लोग रावण को सिर्फ देखने नहीं, बल्कि उससे सीखने भी आते हैं।

इतना ही नहीं, दशहरे से पहले नवविवाहित जोड़े और नवजात शिशु इस रावण से आशीर्वाद लेने आते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और बच्चे का भविष्य उज्ज्वल रहता है।

रिमोट कंट्रोल से जलाया जाता है यहां रावण


पहले रावण दहन परंपरागत तरीके से होता था, लेकिन अब समय के साथ तकनीक जुड़ गई है। 105 फीट ऊंचे रावण और 90 फीट के कुम्भकर्ण को रिमोट कंट्रोल से जलाया जाता है। इससे जहां सुरक्षा पुख्ता होती है, वहीं हजारों की भीड़ को रोमांचक अनुभव भी मिलता है। आतिशबाज़ी और नारों के बीच यह रावण दहन से यह मेला स्थल भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठता है। जयपुर का यह दशहरा महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का उत्सव है। जब मुस्लिम परिवार मंदिर परिसर में रहकर महीनों तक रावण बनाता है और हिंदू समाज उनके योगदान का सम्मान करता है, तो यह भारत की असली पहचान सामने आती है। यहां रावण केवल बुराई का प्रतीक नहीं रहता, बल्कि इंसानियत को जोड़ने वाला पुल बन जाता है। जयपुर राम मंदिर में चली आ रही यह अनोखी परंपरा भारत की उस आत्मा को उजागर करती है, जहां विविधता के बीच एकता सबसे बड़ा उत्सव माना जाता रहा है।

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