One House, Three Durga Puja: एक घर, तीन दुर्गा पूजा… आखिर क्या है रानी रासमणि की राजबाड़ी का राज?
One House, Three Durga Puja: Rani Rashmoni Rajbari में आज भी तीन दुर्गा पूजाएं होती हैं। जानें परिवार के बंटवारे और इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।
One House, Three Durga Puja: What’s the Secret of Rani Rashmoni’s Jhanbazar Rajbari?
One House, Three Durga Puja: भारत में दुर्गा पूजा एक भव्य धार्मिक उत्सव के तौर पर मनाई जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसकी रौनक और परंपराओं का रंग कुछ अलग ही नजर आता है। हुगली नदी के किनारे बसा कोलकाता अपनी भव्य दुर्गा पूजा, ऐतिहासिक राजबाड़ियों और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। इन्हीं अनोखी परंपराओं में रानी रासमणि की जानबाजार राजबाड़ी की दुर्गा पूजा भी खास है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर की स्थापना के लिए प्रसिद्ध रानी रासमणि के इस पैतृक घर में आज भी हर साल तीन अलग-अलग दुर्गा पूजाएं होती हैं। आखिर एक ही राजबाड़ी में तीन पूजा क्यों होती हैं और इसके पीछे रानी रासमणि के परिवार का क्या इतिहास है? आइए जानते हैं पूरी कहानी।
1805 में शुरू हुआ था भव्य राजबाड़ी का निर्माण
मध्य कोलकाता स्थित जानबाजार राजबाड़ी का इतिहास 19वीं सदी की शुरुआत से जुड़ा है। बताया जाता है कि धनी व्यवसायी बाबू प्रीताराम दास ने 1805 में इस विशाल भवन का निर्माण शुरू कराया था। उनके बेटे बाबू राज चंद्र दास ने 1813 में इसे पूरा करवाया।
कभी यह परिसर अपने विशाल आकार के लिए जाना जाता था। इसमें करीब 300 कमरे, छह बड़े आंगन, ठाकुर दालान, नाट मंदिर, शस्त्रागार और एक तालाब होने का उल्लेख मिलता है। उस दौर में यह केवल रहने की जगह नहीं था, बल्कि सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र था।
राज चंद्र दास की असामयिक मृत्यु के बाद परिवार और संपत्ति की जिम्मेदारी उनकी पत्नी रानी रासमणि के हाथों में आई। यहीं से इस राजबाड़ी और रानी रासमणि की कहानी और ज्यादा रोचक किस्सों में लोकप्रिय हो गई।
पति की मौत के बाद संभाली परिवार की बड़ी जिम्मेदारी
रानी रासमणि ने कम उम्र में पति को खो दिया था। उस समय महिलाओं के लिए बड़े आर्थिक और जमींदारी मामलों को संभालना आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने परिवार की संपत्ति और प्रशासनिक मामलों की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली।
उनकी पहचान केवल एक प्रभावशाली जमींदार परिवार की महिला के तौर पर नहीं रही। धार्मिक कार्यों, दान और सामाजिक सरोकारों के कारण भी उनका नाम बंगाल के इतिहास में दर्ज हुआ। दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण उनकी सबसे प्रसिद्ध विरासतों में से एक है।
आखिर एक घर में तीन दुर्गा पूजा क्यों?
जानबाजार राजबाड़ी की तीन दुर्गा पूजाओं के पीछे परिवार का बंटवारा सबसे अहम वजह माना जाता है। रानी रासमणि के निधन के बाद उनकी विशाल संपत्ति और राजबाड़ी उनके परिवार की अलग-अलग शाखाओं में बंट गई।
समय के साथ राजबाड़ी के अलग हिस्से अलग पारिवारिक इकाइयों से जुड़े रहे। इसी वजह से एक ही मूल राजबाड़ी परिसर में तीन अलग दुर्गा पूजा परंपराएं विकसित हुईं। यानी तीन पूजा किसी अलग-अलग देवी परंपरा के कारण शुरू नहीं हुईं, बल्कि परिवार के विभाजन के बाद अलग शाखाओं में जारी रही धार्मिक परंपरा का परिणाम हैं।
आज भी यह व्यवस्था इस बात की याद दिलाती है कि पुराने बंगाली परिवारों में दुर्गा पूजा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी। यह परिवार को एक साथ जोड़ने और अपनी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी थी।
रानी रासमणि का सामाजिक कार्यों में भी रहा खास योगदान
रानी रासमणि का जीवन धार्मिक गतिविधियों के साथ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ा रहा। उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए कई तरह के दान कार्य किए। उनके बारे में यह भी उल्लेख मिलता है कि उन्होंने शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़े कार्यों में आर्थिक सहयोग दिया।
हुगली नदी में मछली पकड़ने पर लगाए गए कर के विरोध से जुड़ी उनकी कहानी भी काफी चर्चित है। इसके अलावा बंगाल में सामाजिक सुधारों के दौर में सती प्रथा और बाल विवाह जैसे मुद्दों पर सुधारवादी विचारों को समर्थन देने की बात भी उनके जीवन से जोड़ी जाती है।
जानबाजार राजबाड़ी आज केवल एक पुरानी हवेली नहीं है। इसकी दीवारों में बंगाल के सामाजिक इतिहास, पारिवारिक परंपराओं और धार्मिक संस्कृति की कई झलकियां दिखाई देती हैं। खास तौर पर दुर्गा पूजा के दौरान यहां की गतिविधियां इस विरासत को हर बार जीवंत कर देती हैं।