बदलेगा महाराजगंज का चुनावी खेल? अमरमणि त्रिपाठी का बड़ा ऐलान- फरेंदा से लड़ेंगे चुनाव, बेटे के लिए भी सीट तय
अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। बेटे अमनमणि त्रिपाठी के नौतनवा से चुनाव लड़ने की बात कही। जानिए किस पार्टी से मिल सकता है टिकट और क्या बदलेंगे महाराजगंज के सियासी समीकरण।
UP Politics News: पूर्वांचल की सियासत में त्रिपाठी परिवार एक बार फिर सक्रिय नजर आ रहा है। महाराजगंज जिले की राजनीति में अमरमणि त्रिपाठी के एक बयान ने चुनावी हलचल बढ़ा दी है। नौतनवा में एक कार्यक्रम के दौरान अमरमणि त्रिपाठी ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपना इरादा साफ करते हुए कहा कि वह फरेंदा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे, जबकि उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी नौतनवा से चुनाव मैदान में उतरेंगे।
अमरमणि त्रिपाठी ने मंच से कहा, "फरेंदा से एमएलए तो मैं लड़ूंगा और नौतनवा से हमारा लड़का लड़ेगा।" उनके इस ऐलान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर त्रिपाठी पिता-पुत्र किस राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे?
नौतनवा के विकास का भी किया जिक्र
अमरमणि त्रिपाठी ने नौतनवा क्षेत्र में हुए विकास कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि इलाके में काफी काम हुआ है। उन्होंने दावा किया कि अब कोई ऐसा घर नहीं बचा है, जहां पक्का मकान न हो।
उन्होंने अपने बेटे अमनमणि त्रिपाठी के राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि अब उनका बेटा राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएगा। अमरमणि के मुताबिक, अमनमणि लंबे समय तक विधायक रहे हैं और उन्हें क्षेत्र की जनता का समर्थन भी मिला है।
अमनमणि का ऐसा रहा चुनावी सफर
अमनमणि त्रिपाठी को वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी ने नौतनवा विधानसभा सीट से टिकट दिया था, लेकिन वह चुनाव हार गए थे। वर्ष 2017 में सपा से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।
इसके बाद अमनमणि त्रिपाठी बहुजन समाज पार्टी में शामिल हुए और पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बाद में उन्हें बसपा से बाहर कर दिया गया। इसके बाद उनके कांग्रेस में जाने की चर्चा हुई। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी कांग्रेस में शामिल होने और चुनाव लड़ने को लेकर अटकलें सामने आई थीं।
जेल से चुनाव जीत चुके हैं अमरमणि
अमरमणि त्रिपाठी का राजनीतिक सफर भी कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। उन्होंने 1985 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार मिली। इसके बाद 1989 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीता। 1996 में भी वह कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने।
बाद में उन्होंने लोकतांत्रिक कांग्रेस का रुख किया। पार्टी में विभाजन के बाद एक धड़ा बीजेपी के समर्थन में चला गया और सरकार बनने पर अमरमणि त्रिपाठी मंत्री भी बने।
वर्ष 2002 में उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव जीता और मायावती सरकार में मंत्री बने। इसके बाद 2007 में उन्होंने जेल में रहते हुए समाजवादी पार्टी के टिकट पर नौतनवा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
किस पार्टी का मिलेगा टिकट?
अमरमणि के ताजा ऐलान के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा टिकट को लेकर है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमरमणि त्रिपाठी और अमनमणि त्रिपाठी किस राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे।
सियासी गलियारों में यह चर्चा जरूर है कि बीजेपी सीधे टिकट देने के बजाय किसी सहयोगी दल के जरिए चुनावी समीकरण साध सकती है। वहीं सपा, बसपा और कांग्रेस के विकल्पों को लेकर भी राजनीतिक अटकलें जारी हैं। हालांकि, इन संभावनाओं पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
46 हजार से ज्यादा वोट के बावजूद तीसरे नंबर पर रहे थे अमनमणि
पिछले चुनाव में अमनमणि त्रिपाठी को हार का सामना करना पड़ा था और वह तीसरे स्थान पर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें 46 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। यही वजह है कि उनके समर्थक इसे नौतनवा क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ के संकेत के तौर पर देखते हैं।
अब अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा और अमनमणि ने नौतनवा से चुनाव लड़ने का संकेत देकर पूर्वांचल की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। अगर पिता-पुत्र दोनों चुनाव मैदान में उतरते हैं तो महाराजगंज की कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
'लाइन हर जगह लगी हुई है'
अमरमणि त्रिपाठी के बयान के बाद यह भी चर्चा तेज है कि त्रिपाठी परिवार अलग-अलग राजनीतिक विकल्पों पर बातचीत कर रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि फरेंदा और नौतनवा में त्रिपाठी परिवार किस पार्टी के साथ मैदान में उतरता है और कौन सा दल उन्हें अपना उम्मीदवार बनाता है।
फिलहाल टिकट को लेकर स्थिति साफ नहीं है, लेकिन अमरमणि के ऐलान ने इतना जरूर तय कर दिया है कि आगामी चुनाव में महाराजगंज की सियासत में त्रिपाठी परिवार फिर से बड़ा फैक्टर बन सकता है।