Religious Conversion Case: धर्म परिवर्तन करने वाली दो बहनों की आजादी बरकरार, 25 लाख के मुआवजे पर हाई कोर्ट की रोक

Religious Conversion Case: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वाली आगरा की दो बालिग बहनों की स्वतंत्रता संबंधी राहत बरकरार रखी है। अदालत ने मुआवजे के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई है।

Update:2026-10-10 19:30 IST

Religious Conversion Case (Image Credit-Social Media)

प्रयागराज। अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाली दो बालिग बहनों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उन्हें मुआवजा दिए जाने के सवाल पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत की खंडपीठ ने आगरा की दो सगी बहनों को उनके पिता की कथित अवैध हिरासत से मुक्त करने संबंधी एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, दोनों बहनों को 25 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने के निर्देश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी गई है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने राज्य सरकार तथा अन्य पक्षों की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि बालिग महिलाओं की स्वतंत्रता से संबंधित एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं दिखता, लेकिन मुआवजे का निर्देश पारित करने से पहले राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया था। इसी प्रक्रियागत आधार पर मुआवजे वाले हिस्से के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाई गई है।

यह विवाद आगरा निवासी अनिल कुमार भाटिया की दो बेटियों अंशु भाटिया और दिया भाटिया से संबंधित है, जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद क्रमशः आमिना और जोया नाम अपनाए। अदालत में प्रस्तुत उनके पक्ष के अनुसार, दोनों ने वर्ष 2020 और 2021 में अपनी स्वतंत्र इच्छा से धर्म परिवर्तन किया था। उनका आरोप था कि पिता इस निर्णय से सहमत नहीं थे और उन्होंने दोनों के शैक्षिक प्रमाणपत्र, पासपोर्ट तथा बैंक पासबुक अपने कब्जे में रख लिए थे। बहनों का यह भी आरोप था कि उन्हें घर में उनकी इच्छा के विरुद्ध रखा गया और स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति नहीं दी गई। दूसरी ओर, पिता ने सदर थाने में अपहरण और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसके बाद पुलिस ने दोनों बहनों को कोलकाता से बरामद किया और पिता के सुपुर्द कर दिया। यही घटनाक्रम बाद में उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुलिस की कार्रवाई की वैधानिकता से जुड़े न्यायिक विवाद का आधार बना।

मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा। कुंवर सुल्तान अली के माध्यम से दाखिल याचिका पर न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने छह अगस्त को दोनों बहनों से बातचीत की और उनकी इच्छा जानने के बाद उन्हें स्वतंत्र रूप से रहने की अनुमति देने का आदेश दिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि बालिग व्यक्ति को अपने धर्म, विश्वास और जीवन के संबंध में निर्णय लेने की संवैधानिक स्वतंत्रता प्राप्त है। माता-पिता की असहमति अपने आप में ऐसा कानूनी आधार नहीं बन सकती जिसके सहारे किसी बालिग संतान को उसकी इच्छा के विरुद्ध घर में रोका जाए। पारिवारिक संबंध, सामाजिक परंपराएँ अथवा धार्मिक मतभेद किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त नहीं कर सकते।

इस विवाद का संवैधानिक महत्व केवल धर्म परिवर्तन तक सीमित नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है। हालाँकि, अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन है। इसी प्रकार धर्म परिवर्तन के संबंध में लागू वैधानिक प्रतिबंधों और स्वेच्छा से लिए गए व्यक्तिगत निर्णयों के बीच अंतर करना आवश्यक है। किसी बालिग व्यक्ति की धार्मिक पसंद से परिवार की असहमति और बल, धोखाधड़ी, प्रलोभन अथवा अन्य निषिद्ध तरीकों से धर्म परिवर्तन कराने का आरोप दो अलग कानूनी प्रश्न हैं। ऐसे आरोपों की जाँच विधि के अनुसार हो सकती है, लेकिन केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त नहीं की जा सकती।

खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार की अपील में मुआवजे का प्रश्न विशेष रूप से उठा। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि एकलपीठ ने मुआवजे का निर्देश जारी करने से पहले सरकार को इस मुद्दे पर सुनवाई का अवसर नहीं दिया था। न्यायिक प्रक्रिया में किसी पक्ष के विरुद्ध आर्थिक दायित्व निर्धारित करने से पहले उसका पक्ष सुनना प्राकृतिक न्याय का महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसी आधार पर खंडपीठ ने मुआवजे के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने बहनों के आरोपों को असत्य घोषित कर दिया है या मुआवजे के उनके दावे को अंतिम रूप से खारिज कर दिया है। मुआवजे की वैधानिकता और उसके आधार पर आगे न्यायिक विचार होना शेष है।

इस आदेश में दो अलग न्यायिक प्रश्नों का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। पहला, क्या दो बालिग महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध पिता की अभिरक्षा में रखा जा सकता है? दूसरा, कथित अवैध हिरासत और संबंधित परिस्थितियों के लिए राज्य पर मुआवजे का दायित्व किस प्रक्रिया के अंतर्गत निर्धारित किया जा सकता है? खंडपीठ ने पहले प्रश्न पर एकलपीठ के हस्तक्षेप को बरकरार रखा है, जबकि दूसरे प्रश्न पर अंतिम निर्णय से पहले सरकार को सुनवाई का अवसर देने की आवश्यकता मानी है। इस प्रकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता संबंधी राहत और आर्थिक क्षतिपूर्ति को अलग-अलग न्यायिक आधारों पर परखा गया है।

मामला यह भी रेखांकित करता है कि बालिग संतान और माता-पिता के बीच धार्मिक अथवा वैचारिक मतभेद उत्पन्न होने पर राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए। पुलिस के लिए आवश्यक है कि वह किसी व्यक्ति की उम्र, उसकी स्वतंत्र इच्छा और उस पर लगाए गए आरोपों की जाँच विधिसम्मत ढंग से करे। विशेष रूप से जब कोई बालिग महिला स्वयं स्वतंत्र रूप से रहने की इच्छा व्यक्त करती है, तब उसकी सुरक्षा और स्वायत्तता दोनों महत्वपूर्ण हो जाते हैं। फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश से दोनों बहनों की स्वतंत्रता संबंधी राहत बरकरार है, जबकि 25 लाख रुपये के मुआवजे का प्रश्न अगली सुनवाई और आगे के न्यायिक निर्णय पर निर्भर करेगा।

संदर्भ: इलाहाबाद हाई कोर्ट, Kunwar Sultan Ali and 2 Others बनाम State of U.P. and 3 Others, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 1079/2026, निर्णय 6 अगस्त 2026; लाइव लॉ, 9 अक्टूबर 2026। मूल निर्णय के अनुसार कुल 25 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति में राज्य सरकार और पिता की संयुक्त जिम्मेदारी निर्धारित की गई थी। ताजा अपील में विशेष रूप से सरकार पर आने वाले 12.5 लाख रुपये के हिस्से पर रोक की पुष्टि हुई है। 

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