Shahjahanpur News: नए एक्सप्रेसवे, नई दरारें: गंगा एक्सप्रेसवे की दीवार टूटी, लखनऊ-कानपुर मार्ग 15 जगह खराब

Shahjahanpur News: शाहजहांपुर में पांच स्थानों से क्षतिग्रस्त सुरक्षा दीवार के रास्ते हाईस्पीड मार्ग पर पहुंच रहे बेसहारा पशु; लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सात जगह सड़क दोबारा बनाने की नौबत।

Update:2026-08-12 22:42 IST

Ganga Expressway Shahjahanpur  (Image Credit-Social Media)

लखनऊ/शाहजहांपुर। उत्तर प्रदेश के दो नए और महत्वाकांक्षी एक्सप्रेसवे पर लगभग एक साथ सामने आई खामियों ने हाईस्पीड सड़क परियोजनाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शाहजहांपुर में गंगा एक्सप्रेसवे की सुरक्षा दीवार पांच स्थानों पर क्षतिग्रस्त मिली है और इन्हीं रास्तों से बेसहारा पशुओं के एक्सप्रेसवे पर पहुंचने की बात सामने आई है। दूसरी ओर करीब ₹4,200 करोड़ की लागत से बने 63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के कानपुर से लखनऊ आने वाले हिस्से में 15 स्थानों पर सड़क खराब मिली है। सात स्थानों पर स्थिति इतनी खराब बताई गई कि सड़क की परत उखाड़कर नए सिरे से बनाई जा रही है, जबकि आठ जगह पैचिंग का काम चल रहा है।

दोनों मामलों की प्रकृति अलग है। गंगा एक्सप्रेसवे में फिलहाल बड़ी चिंता एक्सेस कंट्रोल और पशुओं के प्रवेश की है, जबकि लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में सवाल सड़क की संरचना, जलनिकासी, लेवलिंग, शोल्डर और पानी के भीतर पहुंचने पर केंद्रित हैं। लेकिन दोनों घटनाएं एक साझा सवाल जरूर खड़ा करती हैं—हजारों करोड़ रुपये खर्च कर हाईस्पीड सड़क बना देना पर्याप्त है या उसके हर सुरक्षा और इंजीनियरिंग घटक की निरंतर निगरानी भी उतनी ही जरूरी है?

गंगा एक्सप्रेसवे की दीवार पांच जगह टूटी, पशुओं के लिए खुल गया रास्ता

शाहजहांपुर में प्रशासन की चिंता तब बढ़ी जब अलग-अलग स्थानों, यहां तक कि हवाई पट्टी के आसपास भी बेसहारा पशुओं के झुंड एक्सप्रेसवे पर दिखाई देने लगे। तेज रफ्तार मार्ग पर अचानक पशु सामने आ जाना साधारण सड़क की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है। इसी समस्या की वजह तलाशने के लिए एडीएम प्रशासन रजनीश मिश्र ने उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण यानी यूपीडा के अधिकारियों के साथ मार्ग का निरीक्षण किया।

निरीक्षण में हवाई पट्टी समेत पांच स्थानों पर किनारे की सुरक्षा दीवार क्षतिग्रस्त मिली। मूल रिपोर्ट के मुताबिक इन्हीं टूटे हिस्सों से बेसहारा पशुओं के एक्सप्रेसवे तक पहुंचने की संभावना सामने आई। इसके बाद एडीएम ने यूपीडा अधिकारियों से नाराजगी जताते हुए तत्काल मरम्मत और पूरे मार्ग की नियमित पेट्रोलिंग के निर्देश दिए।

गंगा एक्सप्रेसवे करीब 594 किलोमीटर लंबा, छह लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड मार्ग है और इसे 120 किलोमीटर प्रतिघंटा की डिजाइन गति के अनुरूप तैयार किया गया है। यूपीडा की मूल परियोजना रिपोर्ट में भी इसे नियंत्रित प्रवेश वाला एक्सप्रेसवे बताया गया है।

पशुओं को रोकने के लिए ही बनाई गई थी स्थायी सुरक्षा व्यवस्था

गंगा एक्सप्रेसवे पर पशुओं और अनधिकृत वाहनों का प्रवेश रोकना परियोजना की डिजाइन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। निर्माण के अंतिम चरण में राज्य सरकार ने विशेष रूप से स्थायी बाउंड्री वाल और मेटल बीम क्रैश बैरियर लगाने पर जोर दिया था ताकि गांवों से लोग या बेसहारा पशु सीधे मुख्य कैरिजवे तक न पहुंच सकें।

इसीलिए पांच स्थानों पर दीवार क्षतिग्रस्त मिलना केवल छोटी रखरखाव समस्या नहीं माना जा सकता। हाईस्पीड एक्सप्रेसवे में सुरक्षा दीवार उसी ‘एक्सेस कंट्रोल’ व्यवस्था का हिस्सा है जिसके कारण वाहन चालक अपेक्षा करता है कि सामने अचानक कोई पशु, पैदल यात्री या दोपहिया वाहन नहीं आएगा।यदि यह सुरक्षा परत टूटती है तो हाईस्पीड मार्ग का एक बुनियादी सुरक्षा सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है।

120 की रफ्तार पर पशु सामने आया तो बचने का समय बेहद कम

सामान्य सड़क पर चालक के पास कई बार अचानक सामने आए पशु को देखकर गति कम करने का समय होता है। लेकिन 100 से 120 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति वाले एक्सप्रेसवे पर स्थिति अलग होती है। 120 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति पर वाहन एक सेकंड में लगभग 33 मीटर आगे बढ़ जाता है।इसलिए चालक को खतरा दिखाई देने, प्रतिक्रिया करने और ब्रेक लगाने के बीच वाहन काफी दूरी तय कर चुका होता है। रात, बारिश या कम दृश्यता में जोखिम और बढ़ जाता है।यही वजह है कि एक्सप्रेसवे पर पशुओं का प्रवेश रोकना केवल यातायात अनुशासन नहीं बल्कि जीवन रक्षा का इंजीनियरिंग उपाय है।

सवाल यह भी—दीवार टूटी कैसे और कब से टूटी थी?

अब प्रशासन को केवल पांच स्थानों पर ईंट-पत्थर लगाकर मरम्मत कराने से आगे जाकर यह पता करना होगा कि दीवारें क्षतिग्रस्त कैसे हुईं। क्या बारिश और मिट्टी के दबाव से नुकसान हुआ, किसी वाहन की टक्कर लगी, स्थानीय स्तर पर रास्ता बनाने के लिए दीवार तोड़ी गई या निर्माण संबंधी कमजोरी थी?यह भी महत्वपूर्ण है कि पेट्रोलिंग व्यवस्था इतनी जल्दी टूटे हिस्सों को क्यों नहीं पहचान पाई और अधिकारियों को पशुओं के बार-बार एक्सप्रेसवे पर आने के बाद कारण खोजने निकलना पड़ा। हाईस्पीड मार्ग पर सुरक्षा दीवार के लिए बेहतर व्यवस्था यह होगी कि प्रत्येक पेट्रोलिंग टीम क्षतिग्रस्त हिस्सों की जीपीएस लोकेशन सहित तुरंत रिपोर्ट करे और निश्चित समय सीमा में उनकी मरम्मत हो।

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर दूसरी तस्वीर—डामर अलग, गिट्टी अलग

इसी बीच लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की स्थिति लगातार चिंता बढ़ा रही है। ताजा जमीनी पड़ताल में कानपुर से लखनऊ आने वाली दिशा में 15 स्थानों पर खराबी सामने आई है। सात जगह सड़क की खराब परत हटाकर नए सिरे से निर्माण कराया जा रहा है और आठ जगह पैचिंग की जा रही है। किलोमीटर 29 के आसपास सड़क धंसी और सतह पर डामर तथा गिट्टी अलग-अलग दिखाई देने की बात सामने आई। किलोमीटर 32.4 और 63.9 सहित कई दूसरे बिंदुओं पर भी सतह खराब मिली। दूसरी तरफ लखनऊ से कानपुर जाने वाली दिशा में पहले खराब हुए कुछ हिस्सों को पैचिंग से ठीक किए जाने की जानकारी दी गई है।

यह वही एक्सप्रेसवे है जिसके शुरू होने के महज दिनों बाद सतह फिसलने और टूटने की शिकायत सामने आ गई थी। इसके बाद NHAI ने ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई शुरू की, टोल वसूली रोकी और तकनीकी जांच के लिए विशेषज्ञों को लगाया।

सात स्थानों पर पैच नहीं, सड़क ही दोबारा बन रही

किसी बिल्कुल नए एक्सप्रेसवे में स्थानीय पैचिंग और पूरे कैरिजवे सेक्शन को उखाड़कर दोबारा बनाना दो अलग स्तर की मरम्मत हैं। सतह पर छोटा गड्ढा या स्थानीय बिटुमिन खराबी हो तो मिलिंग और पैचिंग पर्याप्त हो सकती है। लेकिन जहां पूरी लेन बैठ गई हो या नीचे की परत तक खराबी हो, वहां ऊपर का हिस्सा हटाकर बेस की जांच और दोबारा निर्माण की जरूरत पड़ सकती है।

ताजा रिपोर्ट में किलोमीटर 64 और 60.2 सहित कई हिस्सों में एक तरफ की सड़क उखाड़कर दोबारा बनाए जाने की जानकारी है। दूसरी लेन से यातायात चलाया जा रहा है। किलोमीटर 48.7, 47, 46.7, 39.8, 33 से 34 के बीच और 30 के आसपास भी मरम्मत गतिविधियां दर्ज की गईं।यानी समस्या अब केवल सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक-दो गड्ढों तक सीमित नहीं रह गई है।

पहले विशेषज्ञों ने मिट्टी पर सवाल उठाया, अब पानी और लेवलिंग सामने

इस एक्सप्रेसवे पर पहले सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञों ने आशंका जताई थी कि कुछ हिस्सों में सबग्रेड यानी सड़क के नीचे की मिट्टी की भार-वहन क्षमता, कम्पैक्शन और निर्माण प्रक्रिया की व्यापक जांच जरूरी है। कुछ विशेषज्ञों ने तो गंभीर हिस्सों में ऊपरी सतह हटाकर बेस की नए सिरे से जांच करने तक का सुझाव दिया था। अब ताजा ग्राउंड रिपोर्ट में NHAI के एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि जांच में खराब लेवलिंग और सड़क के भीतर पानी जाने को महत्वपूर्ण कारणों में माना गया है और मरम्मत भी इन्हीं बिंदुओं पर केंद्रित है।

हालांकि IIT की पूरी तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने के कारण उसके निष्कर्षों को अभी उतना ही माना जाना चाहिए जितना संबंधित अधिकारियों ने बताया है। अंतिम कारण—कमजोर मिट्टी, अपर्याप्त कम्पैक्शन, ड्रेनेज, सामग्री, लेवलिंग या इनका संयुक्त प्रभाव—विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगा।

शोल्डर बह गए, अब बाहर से मिट्टी मंगाकर फिर तैयार हो रहे

एक्सप्रेसवे की मुख्य सड़क के साथ बने शोल्डर भी कई स्थानों पर बारिश से प्रभावित हुए हैं। ताजा निरीक्षण में कुछ हिस्सों में बाहर से मिट्टी लाकर शोल्डर दोबारा तैयार किए जाते दिखाई दिए। शोल्डर देखने में सड़क के किनारे की साधारण पट्टी लग सकता है, लेकिन सड़क संरचना में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वह कैरिजवे के किनारे को सहारा देता है, पानी निकालने में मदद करता है और आपात स्थिति में वाहन को रुकने की जगह देता है।यदि शोल्डर कट जाए या बहने लगे तो कैरिजवे के किनारे का समर्थन कमजोर हो सकता है और पानी सड़क की परतों के भीतर पहुंचने का रास्ता पा सकता है।

अंडरपास के पास सड़क में ड्रिल कर पानी निकालने की कोशिश

उन्नाव क्षेत्र में अंडरपास के पास कर्मचारियों को सड़क के नीचे ड्रिल करके छेद बनाते देखा गया। कर्मचारियों के अनुसार आशंका थी कि भीतर पहुंचे पानी को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा है। इसलिए ड्रिल कर निकासी का रास्ता बनाया जा रहा था। सड़क और नाली के बीच भी मशीनों से ड्रेनेज पॉइंट बनाए जा रहे हैं।

यह अपने आप में महत्वपूर्ण संकेत है।आधुनिक सड़क संरचना की सबसे बड़ी दुश्मनों में पानी प्रमुख है। यदि पानी बिटुमिन परतों से नीचे बेस या सबग्रेड तक पहुंच जाए तो सामग्री की आपसी पकड़ कमजोर हो सकती है, मिट्टी की भार-वहन क्षमता घट सकती है और लगातार वाहनों के दबाव से सड़क बैठने लग सकती है।

इसीलिए सड़क इंजीनियरिंग में एक पुराना सिद्धांत है—पानी को सड़क से जितनी जल्दी दूर रखेंगे, सड़क उतनी लंबी चलेगी।

‘एक बूंद पानी न रुके’—अब डिजाइन में वही सुधार

NHAI अधिकारी के अनुसार मरम्मत का उद्देश्य सड़क का लेवल और ड्रेनेज इस तरह सुधारना है कि पानी सतह या भीतर न रुके। यह बात सुनने में सरल है, लेकिन वास्तव में यही एक्सप्रेसवे निर्माण की मूल डिजाइन आवश्यकताओं में शामिल होती है। कैरिजवे का क्रॉस-स्लोप पानी को किनारे भेजता है, शोल्डर उसे आगे निकालता है और नालियां पानी को सुरक्षित आउटलेट तक ले जाती हैं।यदि इन तीनों में किसी बिंदु पर ढलान गलत हो, पानी का रास्ता बंद हो या आउटलेट पर्याप्त न हो तो बरसात में पानी वहां जमा हो सकता है जहां उसे नहीं होना चाहिए।इसलिए अब यह सवाल भी उठेगा कि जो लेवल और ड्रेनेज मरम्मत के दौरान सुधारा जा रहा है, वह निर्माण के समय ही पर्याप्त क्यों नहीं था।

NHAI की कई टीमें मौके पर, वरिष्ठ अधिकारी कर रहे निगरानी

खराबी सामने आने के बाद NHAI ने मरम्मत की निगरानी बढ़ा दी है। अलग-अलग टीमों को काम पर लगाया गया है और जिन स्थानों पर सड़क दोबारा बनाई जा रही है वहां वरिष्ठ अधिकारी भी निरीक्षण कर रहे हैं। इससे पहले NHAI ठेकेदार PNC Infratech के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर चुका है और परियोजना से जुड़े अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई। मरम्मत पूरी होने तक टोल संग्रह स्थगित किया गया है। टोल रोके जाने के बाद एक्सप्रेसवे पर यातायात बढ़ने से मरम्मत में अतिरिक्त कठिनाई भी सामने आई है।

कांग्रेस ने राज्यपाल से हस्तक्षेप मांगा

नवनिर्मित लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की खराब स्थिति अब राजनीतिक मुद्दा भी बन रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने राज्यपाल को पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग की है और मामले को प्रधानमंत्री के समक्ष उठाने का अनुरोध किया है।

सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर विपक्ष का सवाल उठाना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन वास्तविक जवाब तकनीकी जांच और जिम्मेदारी तय होने से ही मिलेगा—कौन-सी परत खराब थी, किस स्तर पर गुणवत्ता जांच हुई, किसने काम को प्रमाणित किया और दोष सामने आने पर आर्थिक जिम्मेदारी किसकी होगी।

दो एक्सप्रेसवे, दो तरह की खामियां, लेकिन निगरानी का सवाल एक

गंगा और लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की समस्या को एक जैसा मानना तकनीकी रूप से गलत होगा। गंगा एक्सप्रेसवे के शाहजहांपुर मामले में अभी मुख्य समस्या सुरक्षा दीवार क्षतिग्रस्त होने और पशुओं के प्रवेश की है। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर स्थिति सड़क की संरचनात्मक गुणवत्ता और ड्रेनेज तक पहुंच चुकी है।फिर भी दोनों घटनाएं यह दिखाती हैं कि एक्सप्रेसवे बनने के बाद ‘निर्माण पूरा’ मानकर निगरानी कम नहीं की जा सकती।

सड़क की सतह, शोल्डर, ड्रेनेज, अंडरपास, क्रैश बैरियर, सुरक्षा दीवार, फेंसिंग और पेट्रोलिंग—ये सभी हाईस्पीड सड़क की एक ही सुरक्षा श्रृंखला के हिस्से हैं। इनमें से कोई एक कड़ी विफल हो तो करोड़ों-करोड़ रुपये की मुख्य सड़क भी असुरक्षित हो सकती है।

निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी मरम्मत तक सीमित नहीं होनी चाहिए

नई सड़क में शुरुआती वर्षों में यदि निर्माण संबंधी खराबी सामने आती है तो यह भी देखना जरूरी है कि उसकी लागत कौन वहन करेगा। ऐसी परियोजनाओं में ठेकेदार की दोष-दायित्व और रखरखाव संबंधी जिम्मेदारियां अनुबंध में निर्धारित होती हैं।इसलिए जनता के लिए केवल यह जानकारी पर्याप्त नहीं कि सड़क की मरम्मत हो रही है। यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि मरम्मत का खर्च सरकारी खजाने से आएगा या निर्माण एजेंसी वहन करेगी।इसी तरह गंगा एक्सप्रेसवे में बार-बार सुरक्षा दीवार टूटती है तो केवल सरकारी मरम्मत के बजाय नुकसान के कारण और जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा।

पहला मानसून नई सड़कों का असली ‘स्ट्रेस टेस्ट’ बन रहा

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की खराबी का बड़ा हिस्सा बारिश के बाद उजागर हुआ। NHAI से जुड़ी रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि सड़क लंबे समय तक तैयार रहने के बाद यातायात के लिए खुली और फिर मानसून में उसे पहली वास्तविक कठिन परीक्षा मिली। बारिश नई सड़क की कमजोरी पैदा करती ही हो, यह जरूरी नहीं; कई बार वह पहले से मौजूद कमी को उजागर करती है।जहां कम्पैक्शन सही होगा, बेस मजबूत होगा, क्रॉस-स्लोप सही होगा और ड्रेनेज काम करेगा, वहां सामान्य डिजाइन बारिश से सड़क नहीं बैठनी चाहिए। यदि पानी भीतर पहुंच रहा है तो यह पता करना जरूरी है कि उसका प्रवेश कहां से हुआ।

अब जरूरत ‘एक्सप्रेसवे हेल्थ ऑडिट’ की

लगातार सामने आती घटनाओं के बाद एक विकल्प यह हो सकता है कि नई एक्सप्रेसवे परियोजनाओं का केवल निर्माण-पूर्णता प्रमाणपत्र न हो बल्कि संचालन शुरू होने के बाद निश्चित अंतराल पर सड़क स्वास्थ्य और सुरक्षा ऑडिट भी किया जाए।इसमें रोड सरफेस की समतलता, रटिंग, क्रैकिंग, शोल्डर की स्थिति, ड्रेनेज, पुल-जोड़, अंडरपास, सुरक्षा दीवार, क्रैश बैरियर, संकेतक और अनधिकृत प्रवेश की जांच की जा सकती है।मानसून से पहले और बाद में अलग निरीक्षण हो तो पानी से पैदा होने वाली कमजोरियां जल्दी पकड़ी जा सकती हैं।

गंगा एक्सप्रेसवे जैसे लगभग 594 किलोमीटर लंबे मार्ग में पांच जगह दीवार टूटने की सूचना को तत्काल ठीक करना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है यह सुनिश्चित करना कि दूसरे हिस्सों में ऐसी खामी छिपी न हो। आधिकारिक डीपीआर में परियोजना को छह लेन और पूरी तरह एक्सेस-कंट्रोल्ड मार्ग के रूप में डिजाइन किया गया है।

एक तरफ सड़क पर पशु, दूसरी तरफ सड़क के भीतर पानी

दोनों घटनाओं को एक वाक्य में समझें तो प्रदेश के नए एक्सप्रेसवे को इस समय ऊपर और नीचे दोनों तरफ से सुरक्षा चुनौती मिल रही है।गंगा एक्सप्रेसवे पर टूटी सुरक्षा दीवार के रास्ते पशुओं का मुख्य मार्ग तक पहुंचना रोका जाना है। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर पानी को सड़क की संरचनात्मक परतों के भीतर पहुंचने से रोकना है।

दोनों का समाधान भी निर्माण के बाद निरंतर निगरानी में है।

हाईस्पीड एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता केवल उसकी चमकती छह लेन से तय नहीं होती। असली गुणवत्ता उस दीवार में भी होती है जो पशु को सड़क पर आने से रोकती है, उस शोल्डर में भी जो कैरिजवे को थामता है और उस अदृश्य ड्रेनेज में भी जो बारिश का पानी सड़क के भीतर जाने नहीं देता। इन छोटी दिखने वाली संरचनाओं में कमी रह गई तो हजारों करोड़ रुपये की मुख्य सड़क भी सुरक्षित नहीं रह सकती।

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