UP News: शामली से कुशीनगर तक 745 किमी का नया हाईवे, 19 जिलों से गुजरेगा यूपी का हाईस्पीड कॉरिडोर
UP News: शामली से कुशीनगर तक करीब 745 किमी लंबा प्रवेश-नियंत्रित हाईस्पीड कॉरिडोर प्रस्तावित है। 19 जिलों से गुजरने वाले इस प्रोजेक्ट की DPR NHAI मुख्यालय भेजी गई है।
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सड़क मानचित्र पर एक और बहुत बड़ा बदलाव आकार लेने लगा है। पश्चिम में हरियाणा की सीमा से लगे शामली से शुरू होकर पूर्व में कुशीनगर तक करीब 745 किलोमीटर लंबा प्रवेश-नियंत्रित हाईस्पीड राष्ट्रीय राजमार्ग गलियारा बनाने की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो गई है। इसे आम तौर पर शामली-गोरखपुर हाईस्पीड कॉरिडोर कहा जा रहा है। लेकिन ताजा प्रस्तावित मार्ग गोरखपुर पर समाप्त नहीं होगा। बल्कि आगे कुशीनगर तक जाएगा। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश को रुहेलखंड, तराई और पूर्वांचल से जोड़ते हुए नेपाल सीमा के आसपास के क्षेत्र तक सीधा तेज सड़क संपर्क तैयार करेगा। नवीनतम उपलब्ध परियोजना विवरण में इसकी कुल लंबाई 348.039 किलोमीटर और 397.137 किलोमीटर के दो हिस्सों को मिलाकर 745.176 किलोमीटर बैठती है। परियोजना को चार लेन में विकसित करने की योजना है। लेकिन जमीन और संरचनाओं की योजना इस तरह बनाई जाएगी कि भविष्य में इसे छह लेन किया जा सके।
ताजा प्रस्ताव में यह गलियारा 19 जिलों से होकर गुजरता है—इनमें उत्तर प्रदेश के 18 जिले और उत्तराखंड का हरिद्वार शामिल है। पश्चिमी चरण में शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, हरिद्वार, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, पीलीभीत और शाहजहांपुर तथा पूर्वी चरण में लखीमपुर खीरी, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, संत कबीरनगर, गोरखपुर और कुशीनगर शामिल हैं।
इस परियोजना को लेकर पिछले दो वर्षों में मार्ग और जिलों की संख्या लगातार बदलती दिखाई दी है। इसी वजह से कहीं इसे 17 जिलों, कहीं 18, कहीं 20 और कहीं 22 जिलों से गुजरने वाला एक्सप्रेसवे बताया गया। उदाहरण के लिए मई 2026 की एक रिपोर्ट में 742 किलोमीटर के मार्ग के लिए 18 जिले गिनाए गए थे और उस सूची में सिद्धार्थनगर शामिल नहीं था। उत्तर प्रदेश सरकार के Invest UP के पुराने दस्तावेज में 20 जिलों का उल्लेख था, जबकि उससे भी पुराने प्रस्तावित मार्गों में 22 जिलों की बात कही गई थी।
अब उपलब्ध नवीनतम DPR-आधारित विवरण में 745.176 किलोमीटर और 19 जिलों वाला मार्ग सामने आया है। इसका अर्थ है कि परियोजना की अंतिम संरेखण प्रक्रिया के दौरान मार्ग में संशोधन हुए हैं। इसलिए फिलहाल नवीनतम DPR वाले आंकड़े को प्राथमिकता देना ज्यादा उचित होगा। लेकिन जब तक NHAI मुख्यालय अंतिम स्वीकृति नहीं देता, छोटे बदलाव की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं मानी जानी चाहिए।
नाम शामली-गोरखपुर, लेकिन अंतिम सिरा कुशीनगर
परियोजना के नाम को लेकर भी भ्रम हो सकता है। इसे लंबे समय से शामली-गोरखपुर एक्सप्रेसवे या हाईस्पीड कॉरिडोर कहा जाता रहा है। मगर ताजा DPR के अनुसार सड़क गोरखपुर के बाद कुशीनगर तक जाएगी। इसलिए भौगोलिक रूप से इसे शामली-कुशीनगर प्रवेश-नियंत्रित हाईस्पीड कॉरिडोर कहना अधिक स्पष्ट होगा, हालांकि सरकारी और परियोजना संबंधी दस्तावेजों में पुराना ‘शामली-गोरखपुर’ नाम अभी चलता रह सकता है। ताजा परियोजना विवरण भी इस अंतर को स्पष्ट करता है।
इस विस्तार का महत्व इसलिए है क्योंकि कुशीनगर केवल पूर्वांचल का धार्मिक और पर्यटन केंद्र नहीं। बल्कि नेपाल सीमा के करीब स्थित पूर्वी सड़क नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। NHAI की योजना मार्ग को जहां संभव हो भारत-नेपाल सीमा के समानांतर या उसके निकट रखने की रही है, जिससे नेपाल जाने वाले मालवाहक और यात्री यातायात को भी इस कॉरिडोर की ओर आकर्षित किया जा सके।
पहला चरण: शामली से शाहजहांपुर, 348.039 किमी
परियोजना का पश्चिमी हिस्सा करीब 348.039 किलोमीटर लंबा होगा। यह शामली से शुरू होकर मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, हरिद्वार, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली और पीलीभीत होते हुए शाहजहांपुर तक पहुंचेगा। इसके निर्माण की प्रारंभिक अनुमानित लागत करीब ₹20 हजार करोड़ बताई गई है। इस हिस्से की निगरानी NHAI के लखनऊ क्षेत्रीय कार्यालय के जिम्मे रखने की योजना है।
इस हिस्से के लिए लगभग 70 मीटर चौड़ा अधिकार-मार्ग प्रस्तावित है। चार लेन के मुख्य कैरिजवे के साथ भविष्य में छह लेन विस्तार की गुंजाइश रखी जाएगी। मौजूदा DPR विवरण में इस चरण में नौ रेलवे ओवरब्रिज, 12 फ्लाईओवर, 15 इंटरचेंज, 25 बड़े पुल और 125 छोटे पुल प्रस्तावित बताए गए हैं।
यानी यह परियोजना केवल 348 किलोमीटर डामर बिछाने का काम नहीं है। लगभग हर प्रमुख रेलवे लाइन, नदी, जिला मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग के साथ अलग स्तर पर आवागमन की व्यवस्था करनी होगी। यही कारण है कि ऐसी प्रवेश-नियंत्रित सड़क की प्रति किलोमीटर लागत सामान्य राष्ट्रीय राजमार्ग से कहीं अधिक होती है।
दूसरा चरण: लखीमपुर खीरी से कुशीनगर, 397.137 किमी
पूर्वी चरण लगभग 397.137 किलोमीटर लंबा होगा और लखीमपुर खीरी, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, संत कबीरनगर और गोरखपुर होते हुए कुशीनगर पहुंचेगा। इस हिस्से के निर्माण की शुरुआती अनुमानित लागत करीब ₹15 हजार करोड़ है और इसकी निगरानी NHAI के वाराणसी क्षेत्रीय कार्यालय से किए जाने की योजना है।
इस चरण में आठ रेलवे ओवरब्रिज, 22 फ्लाईओवर, 20 इंटरचेंज, 38 बड़े और 145 छोटे पुल प्रस्तावित बताए गए हैं। अकेले दोनों चरणों को मिला दें तो प्रस्तावित संरचनाओं की संख्या बताती है कि परियोजना इंजीनियरिंग की दृष्टि से कितनी बड़ी होगी।
विशेष रूप से तराई क्षेत्र में नदियों, बरसाती जलधाराओं और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की संख्या अधिक होने के कारण पुल और जलनिकासी ढांचे परियोजना की दीर्घकालीन सफलता में निर्णायक होंगे। हाल के वर्षों में नई सड़कों पर जलनिकासी संबंधी समस्याओं के अनुभव को देखते हुए यहां मिट्टी, तटबंध, पुल और ड्रेनेज डिजाइन की गुणवत्ता पर निगरानी बहुत महत्वपूर्ण होगी।
₹35 हजार करोड़ केवल निर्माण का शुरुआती अनुमान
दोनों हिस्सों की बताई गई लागत जोड़ने पर करीब ₹35 हजार करोड़ होती है। लेकिन इसे अभी अंतिम परियोजना लागत नहीं माना जाना चाहिए। अन्य हालिया रिपोर्टों में पूरी परियोजना की लागत करीब ₹40 हजार करोड़ तक भी आंकी गई है। भूमि अधिग्रहण, उपयोगिता स्थानांतरण, वन अनुमति, संरचनाओं और अंतिम निविदा मूल्य के आधार पर वास्तविक लागत बदल सकती है। यही वजह है कि DPR को NHAI मुख्यालय की मंजूरी मिलने के बाद ही अंतिम बजट और निर्माण अनुबंधों की अधिक विश्वसनीय तस्वीर सामने आएगी।
यह सामान्य राष्ट्रीय राजमार्ग नहीं होगा
शामली-कुशीनगर कॉरिडोर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका प्रवेश-नियंत्रित होना है। सामान्य राष्ट्रीय राजमार्ग में गांव, बाजार, पेट्रोल पंप, खेत और स्थानीय सड़कें सीधे मुख्य सड़क से जुड़ सकती हैं। इससे बीच-बीच में ट्रैक्टर, बाइक, पैदल यात्री और स्थानीय वाहन तेज यातायात के बीच आ जाते हैं।नए कॉरिडोर में ऐसा नहीं होगा।
वाहन केवल निर्धारित इंटरचेंज और प्रवेश-निकास बिंदुओं से मुख्य मार्ग पर आ सकेंगे। स्थानीय सड़कें आवश्यकता के अनुसार नीचे या ऊपर से पार कराई जाएंगी। इससे मुख्य सड़क पर अचानक आने वाला यातायात कम होगा और लंबी दूरी के वाहन अपेक्षाकृत स्थिर गति से चल सकेंगे। ताजा DPR विवरण में लगभग 100 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत परिचालन गति का लक्ष्य बताया गया है।
यहां ‘औसत गति 100 किमी’ और ‘अधिकतम गति सीमा 100 किमी’ को एक नहीं समझना चाहिए। अंतिम कानूनी गति सीमा निर्माण पूरा होने और नियामकीय अधिसूचना के बाद ही तय होगी।
745 किमी की यात्रा सात-साढ़े सात घंटे में? गणित ऐसा कहता है, व्यवहार अलग होगा
यदि वास्तव में कोई वाहन पूरे 745 किलोमीटर मार्ग पर 100 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत गति बनाए रख सके तो केवल गणित के अनुसार यात्रा लगभग साढ़े सात घंटे में पूरी हो सकती है। लेकिन वास्तविक सफर में टोल, विश्राम, प्रवेश-निकास, यातायात, मौसम और गति प्रतिबंध जुड़ेंगे। इसलिए अभी कोई निश्चित यात्रा समय घोषित करना जल्दबाजी होगा।फिर भी वर्तमान सड़क नेटवर्क की तुलना में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वांचल और नेपाल सीमा तक माल ढुलाई में कई घंटे की कमी संभव है। यही इस परियोजना की असली आर्थिक उपयोगिता होगी।
दस राष्ट्रीय राजमार्गों से इंटरचेंज, इसलिए सिर्फ रास्ते के जिले ही लाभार्थी नहीं
कॉरिडोर की उपयोगिता केवल उन जिलों तक सीमित नहीं होगी जिनकी भूमि से मुख्य सड़क गुजरती है। प्रस्ताव के अनुसार यह लगभग दस मौजूदा राष्ट्रीय राजमार्गों को काटेगा और वहां इंटरचेंज बनाए जाएंगे। नवीनतम विवरण में NH-709B, NH-344, NH-58, NH-74, NH-9, NH-24, NH-730, NH-731 तथा अन्य संपर्क मार्गों का उल्लेख है। इसका अर्थ है कि दिल्ली, देहरादून, हरिद्वार, बरेली, लखनऊ क्षेत्र, गोरखपुर और नेपाल की ओर जाने वाले दूसरे मार्ग इस हाईस्पीड गलियारे से जुड़ सकते हैं।यहीं यह परियोजना केवल शामली और कुशीनगर को जोड़ने वाली सड़क से आगे बढ़कर उत्तर भारत का पूर्व-पश्चिम सड़क गलियारा बन सकती है।
दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर से पश्चिमी संपर्क और मजबूत होगा
शामली पहले ही दिल्ली-सहारनपुर-देहरादून आर्थिक गलियारे से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। NH-709B आधारित दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर दिल्ली, बागपत, शामली और सहारनपुर से होकर उत्तराखंड की ओर जाता है। यदि नया शामली-कुशीनगर मार्ग उससे प्रभावी इंटरचेंज के जरिए जुड़ता है तो दिल्ली और हरियाणा की ओर से आने वाला माल बिना उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों के भीतर प्रवेश किए पूर्वांचल तक जा सकता है।इसी तरह हरिद्वार वाले हिस्से के कारण उत्तराखंड के औद्योगिक और धार्मिक यातायात को भी पूर्वी उत्तर प्रदेश से नया संपर्क मिलेगा।
नेपाल व्यापार के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है यह मार्ग
उत्तर प्रदेश की नेपाल से लंबी खुली सीमा है। सोनौली, रुपईडीहा और अन्य सीमा बिंदुओं से बड़ी मात्रा में यात्री और मालवाहक यातायात गुजरता है। नया कॉरिडोर बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और कुशीनगर जैसे नेपाल सीमा से जुड़े या निकट जिलों के बीच लंबा पूर्व-पश्चिम संपर्क बनाएगा।NHAI की प्रारंभिक योजना में मार्ग को भारत-नेपाल सीमा के करीब रखने का उद्देश्य भी नेपाल आने-जाने वाले वाहनों को आकर्षित करना बताया गया था। इससे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से नेपाल जाने वाले माल को दिल्ली और मध्य उत्तर प्रदेश के भीड़भाड़ वाले मार्गों के विकल्प मिल सकते हैं।
तराई की अर्थव्यवस्था पहली बार तेज पूर्व-पश्चिम मार्ग से जुड़ेगी
इस परियोजना का शायद सबसे बड़ा कम चर्चित प्रभाव तराई के जिलों पर पड़ेगा। लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और सिद्धार्थनगर राष्ट्रीय स्तर के उच्च गति सड़क नेटवर्क में अभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तुलना में पीछे हैं।नई सड़क इन जिलों में कृषि उत्पाद, चीनी, खाद्यान्न, वन आधारित उत्पाद, डेयरी और दूसरे सामान के परिवहन का समय घटा सकती है।लेकिन इसका लाभ तभी अधिक होगा जब इंटरचेंज ऐसे स्थानों पर बनें जहां से स्थानीय कृषि मंडियों और औद्योगिक क्षेत्रों तक अच्छी संपर्क सड़कें हों। केवल किसी जिले से हाईवे गुजर जाना अपने आप आर्थिक परिवर्तन की गारंटी नहीं होता।
जमीन की कीमतों में उछाल की चर्चा होगी, लेकिन इंटरचेंज असली कुंजी
745 किलोमीटर जैसी परियोजना की घोषणा होते ही रास्ते की जमीन के दाम बढ़ने की अटकलें शुरू होना स्वाभाविक है। लेकिन निवेश के लिहाज से केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि हाईवे किस जिले से गुजरता है।प्रवेश-नियंत्रित सड़क पर जमीन मुख्य सड़क से सीधे नहीं जुड़ सकती। इसलिए इंटरचेंज से दूरी सबसे महत्वपूर्ण होगी।
गोदाम, लॉजिस्टिक पार्क, होटल, पेट्रोल पंप या औद्योगिक इकाई की संभावनाएं उन क्षेत्रों में ज्यादा होंगी जहां वैध प्रवेश-निकास और सर्विस रोड की योजना है। हाईवे से लगी लेकिन इंटरचेंज से बहुत दूर जमीन व्यावसायिक रूप से उतनी उपयोगी नहीं भी हो सकती है।इसलिए केवल प्रस्तावित संरेखण की अफवाह पर जमीन खरीदना जोखिमपूर्ण होगा। अंतिम अधिसूचित नक्शा और भूमि अधिग्रहण रिकॉर्ड देखना जरूरी होगा।
पश्चिम में भूमि अधिग्रहण शुरू, लेकिन अभी निर्माण शुरू नहीं
मई 2026 तक NHAI ने प्रस्तावित 742 किलोमीटर वाले उस समय के मार्ग के लिए कई जिलों में भूमि एकत्रीकरण और अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ानी शुरू कर दी थी। ताजा विवरण के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है और पूर्वी हिस्सों में भी शुरुआती कार्य हो रहा है। लेकिन इसे ‘हाईवे का निर्माण शुरू हो गया’ नहीं समझना चाहिए।
DPR अभी NHAI मुख्यालय की स्वीकृति प्रक्रिया में बताई जा रही है। अंतिम स्वीकृति, पैकेज निर्धारण, वित्तीय मंजूरी, भूमि उपलब्धता और निविदाओं के बाद वास्तविक बड़े पैमाने का निर्माण शुरू होगा।
दो क्षेत्रीय कार्यालय क्यों संभालेंगे परियोजना
745 किलोमीटर की एक ही परियोजना को केवल एक क्षेत्रीय कार्यालय के नियंत्रण में रखना प्रशासनिक रूप से कठिन होगा। इसीलिए पश्चिमी 348 किलोमीटर हिस्से की निगरानी लखनऊ और पूर्वी 397 किलोमीटर हिस्से की वाराणसी इकाई से करने की योजना है। इसी तरह पूरी सड़क एक ही कंपनी को दिए जाने की संभावना कम है। इतनी बड़ी परियोजना को अलग-अलग निर्माण पैकेजों में बांटना सामान्य व्यवस्था है।
इसके दो फायदे होते हैं—एक कंपनी की समस्या से पूरा 745 किलोमीटर काम नहीं रुकता और कई हिस्सों में समानांतर निर्माण शुरू किया जा सकता है।लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी आती है—अलग कंपनियों के बीच निर्माण गुणवत्ता में अंतर न रहे। पूरे कॉरिडोर के लिए समान इंजीनियरिंग और स्वतंत्र गुणवत्ता निगरानी जरूरी होगी।
नई सड़कों की हालिया खामियों से सीखना होगा
उत्तर प्रदेश में हाल के कुछ बड़े सड़क प्रकल्पों के उद्घाटन के बाद जलनिकासी, मिट्टी के कम्पैक्शन और सड़क धंसने जैसी समस्याओं पर सवाल उठ चुके हैं। इसलिए शामली-कुशीनगर जैसे 745 किलोमीटर के नए गलियारे में केवल तेज निर्माण ही सफलता का पैमाना नहीं हो सकता।तराई क्षेत्र में विशेष रूप से बाढ़ स्तर, मिट्टी की वहन क्षमता, तटबंध का कम्पैक्शन, पुलों के एप्रोच और वर्षाजल निकासी का परीक्षण बेहद महत्वपूर्ण होगा।
अगर इसे कई पैकेजों में बनाया जाता है तो NHAI के लिए एक स्वतंत्र केंद्रीय गुणवत्ता निगरानी प्रणाली और भी जरूरी होगी।
क्या यह उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे होगा?
यहां शब्दावली सावधानी से इस्तेमाल करनी चाहिए। करीब 594 किलोमीटर लंबा गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश सरकार के UPEIDA का राज्य एक्सप्रेसवे है। शामली-कुशीनगर परियोजना करीब 745 किलोमीटर की होने के कारण लंबाई में उससे बड़ी होगी, लेकिन यह NHAI का राष्ट्रीय प्रवेश-नियंत्रित हाईस्पीड कॉरिडोर है।
इसलिए इसे सीधे ‘उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे” कहने के बजाय’ उत्तर प्रदेश से गुजरने वाला सबसे लंबा प्रस्तावित प्रवेश-नियंत्रित राष्ट्रीय हाईस्पीड कॉरिडोर” कहना अधिक तकनीकी रूप से सुरक्षित है।यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्ग गलियारे की कानूनी श्रेणी, निर्माण एजेंसी और प्रबंधन अलग हो सकते हैं।
शामली से कुशीनगर—एक सड़क, उत्तर प्रदेश के तीन अलग आर्थिक भूभाग
इस परियोजना को मानचित्र पर देखें तो यह उत्तर प्रदेश के तीन बड़े भूगोलों को एक सीध में जोड़ती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कृषि-औद्योगिक क्षेत्र, मध्य और उत्तरी तराई की कृषि पट्टी और पूर्वांचल का घनी आबादी वाला क्षेत्र।अभी इन क्षेत्रों के बीच यात्रा कई राष्ट्रीय और राज्य मार्गों से होकर होती है, जिन पर कस्बे, स्थानीय यातायात और बार-बार गति परिवर्तन आते हैं। प्रवेश-नियंत्रित गलियारा पहली बार लंबी दूरी के यातायात को उनसे अलग कर सकता है।
इससे केवल यात्री समय नहीं घटेगा; ट्रक के प्रतिदिन तय किए जाने वाले किलोमीटर बढ़ सकते हैं, ईंधन और वाहन संचालन लागत कम हो सकती है और माल आपूर्ति अधिक अनुमानित हो सकती है।
फिलहाल चार बातें पक्की, बाकी मंजूरी के बाद
अभी उपलब्ध नवीनतम विवरण से चार बातें काफी स्पष्ट हैं—DPR तैयार है और NHAI मुख्यालय भेजी गई है; प्रस्तावित कुल लंबाई करीब 745.176 किलोमीटर है; इसे दो बड़े चरणों में विकसित करने की योजना है; और नया संरेखण कुल 19 जिलों—18 उत्तर प्रदेश और एक उत्तराखंड—से होकर कुशीनगर तक जाता है।
लेकिन निर्माण शुरू होने की अंतिम तारीख, पूरी स्वीकृत परियोजना लागत, प्रत्येक पैकेज का ठेका, अंतिम इंटरचेंज स्थान और पूर्ण होने की तारीख अभी निश्चित रूप से घोषित नहीं हुई है। इसलिए इन्हें भविष्य की पक्की तारीखों की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए।
यह परियोजना यदि मौजूदा DPR के अनुसार पूरी होती है तो उत्तर प्रदेश में सड़क संपर्क की दिशा बदल सकती है। अब तक प्रदेश के बड़े एक्सप्रेसवे मुख्यतः राजधानी क्षेत्र या मध्य उत्तर प्रदेश से जुड़ते रहे हैं। यह गलियारा अलग होगा—यह पश्चिम से सीधे तराई को काटते हुए पूर्वांचल और नेपाल सीमा के निकट तक जाएगा।
और इसकी सबसे बड़ी विशेषता 745 किलोमीटर की लंबाई भी नहीं होगी। असली बदलाव यह होगा कि शामली, बिजनौर, बरेली, पीलीभीत, लखीमपुर, बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर और कुशीनगर जैसे दूर-दूर के आर्थिक क्षेत्र पहली बार एक ही प्रवेश-नियंत्रित तेज सड़क पर आ जाएंगे। यदि भूमि अधिग्रहण, इंजीनियरिंग गुणवत्ता और निर्माण समय तीनों संभल गए, तो यह केवल नया हाईवे नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश का नया पूर्व-पश्चिम आर्थिक गलियारा बन सकता है।