UP चुनाव में योगी के 'मठ' के सामने ठीक पाएगा हरिशंकर तिवारी का 'हाता'? जानिए गोरखपुर में किसका पलड़ा रहेगा भारी
Yogi Adityanath vs Hari Shankar Tiwari: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की सबसे चर्चित राजनैतिक जंग 'मठ बनाम हाता' एक बार फिर सुर्खियों में है। जानिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखनाथ मठ और पूर्व कद्दावर मंत्री हरिशंकर तिवारी की विरासत (हाता) के बीच 2027 के चुनाव का पूरा जमीनी समीकरण।
Yogi Adityanath vs Hari Shankar Tiwari: उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी काफी दूर दिखाई दे रहे हों, लेकिन राज्य के पूर्वांचल क्षेत्र में नए राजनैतिक समीकरणों ने अभी से आकार लेना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर और उसके आसपास के तमाम जिलों के राजनैतिक गलियारों में इस समय एक ही यक्ष प्रश्न गूंज रहा है। सवाल यह है कि आगामी चुनाव में पूर्वांचल की धरती पर किसका राजनैतिक जादू सिर चढ़कर बोलेगा? सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाला शक्तिशाली 'गोरखनाथ मठ' या फिर पूर्व कद्दावर मंत्री हरिशंकर तिवारी की राजनैतिक विरासत का सबसे चर्चित केंद्र रहा उनका ऐतिहासिक 'हाता'?
जब 'हाते' के इशारे पर नाचती थी UP की सियासत
एक जमाना था जब गोरखपुर और पूरे पूर्वांचल की राजनीति केवल दो धुरियों के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिन्हें लोग 'मठ' और 'हाता' के नाम से जानते थे। हरिशंकर तिवारी पूर्वांचल के एक ऐसे बाहुबली और रसूखदार नेता थे, जिन्होंने अपने दम पर एक विशाल राजनैतिक साम्राज्य खड़ा किया था। चिल्लूपार विधानसभा सीट से लगातार कई बार विधायक रहे हरिशंकर तिवारी ने सूबे की कई सरकारों में कैबिनेट मंत्री रहते हुए एक बेहद मजबूत और अटूट राजनैतिक नेटवर्क तैयार किया था। गोरखपुर में स्थित उनका 'हाता' सिर्फ उनका घर नहीं था, बल्कि पूरे पूर्वांचल की सियासत का सबसे बड़ा कंट्रोल रूम माना जाता था, जहां से कई बड़े नेताओं और ठेकेदारों की तकदीर का फैसला होता था।
क्या आज भी कायम है तिवारी परिवार का जमीनी रसूख?
हरिशंकर तिवारी की राजनीति का मुख्य आधार उनका मजबूत सामाजिक ताना-बाना और ब्राह्मण समाज में उनकी बेहद गहरी पैठ थी। उनके निधन के बाद उनके बेटे विनय शंकर तिवारी इस भारी-भरकम विरासत को आगे ले जाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। हालांकि, बदलते हुए राजनैतिक माहौल के बीच साल 2022 के विधानसभा चुनाव में उनके हाथ से चिल्लूपार की पारंपरिक सीट निकलकर बीजेपी के खाते में चली गई। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत को जानने वाले विश्लेषकों का मानना है कि चिल्लूपार और बड़हलगंज के ग्रामीण इलाकों में आज भी तिवारी परिवार के पास एक ऐसा वफादार और पारंपरिक जनाधार मौजूद है, जिसे कोई भी राजनैतिक दल नजरअंदाज करने की भूल नहीं कर सकता।
मुख्यमंत्री योगी के राज में शक्ति का नया केंद्र बना 'मठ'
इसके विपरीत, पिछले एक दशक के भीतर गोरखनाथ मठ की राजनैतिक और सामाजिक ताकत में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ओजस्वी नेतृत्व में यह पौराणिक मठ केवल एक धार्मिक पीठ नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की सत्ता और शासन का सबसे बड़ा शक्ति केंद्र बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर से अपना नाता कभी नहीं तोड़ा। वे लगातार गोरखपुर का दौरा करते हैं, जनता दर्शन के माध्यम से सीधे आम लोगों की फरियाद सुनते हैं और कड़े प्रशासनिक फैसलों से उन्होंने कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर जनता के बीच एक बेहद मजबूत भरोसा पैदा किया है।
2027 के महा-मुकाबले में किसका पलड़ा रहेगा भारी?
राजनैतिक पंडितों का साफ तौर पर मानना है कि यदि आज की तारीख में पूरे गोरखपुर और पूर्वांचल की समीक्षा की जाए, तो सत्ता, संगठन और सरकारी योजनाओं के दम पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गोरखनाथ मठ का पलड़ा स्पष्ट रूप से बहुत भारी और मजबूत नजर आता है। हालांकि, अगर आगामी चुनाव में विपक्ष ने एकजुट होकर ब्राह्मण मतों को साधने की कोई विशेष सोशल इंजीनियरिंग तैयार की, तो स्थानीय सीटों पर तिवारी परिवार के पुराने समर्थकों का नेटवर्क बीजेपी के समीकरणों को बिगाड़ने का दम जरूर रखता है। अब देखना यह होगा कि 2027 के रण में विकास और संगठन की आधुनिक ताकत जीतती है या फिर परंपरा और विरासत का पुराना रसूख बाजी मार ले जाता है।