सिंधु जल संधि पर 'चौधरी' बन रहा था वर्ल्ड बैंक, भारत ने आर्बिट्रेशन कोर्ट को अवैध बताकर फैसला किया रिजेक्ट- कोई दखलअंदाजी नहीं

भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के अपने फैसले को बरकरार रखते हुए कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के कथित आदेश को खारिज कर दिया है।

Update:2026-08-31 17:48 IST

Indus Waters Treaty: भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर एक बार फिर अपना रुख साफ कर दिया है। भारत ने सोमवार को विश्व बैंक की ओर से गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन द्वारा जारी किए गए एक आदेश को खारिज कर दिया। भारत ने इस संस्था को 'अवैध तरीके से गठित' बताते हुए कहा कि उसे भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।

भारत सरकार ने कहा कि उसने तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के कानूनी अस्तित्व को कभी मान्यता नहीं दी है। भारत लगातार इस संस्था की कार्यवाही और इसके पहले दिए गए बयानों व फैसलों को खारिज करता रहा है।

भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को नहीं माना वैध

'अवैध तरीके से गठित तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' से जुड़े मामलों पर जारी बयान में भारत ने कहा कि इस संस्था का गठन विश्व बैंक ने सिंधु जल संधि की शर्तों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करते हुए किया था। सरकार ने कहा, 'आज अवैध तरीके से गठित तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने वह आदेश जारी किया, जिसे उसने सिंधु जल संधि के अंतरिम उपायों और उसकी स्थिति से संबंधित फैसला बताया है।'

भारत ने तथाकथित फैसले को किया खारिज

भारत सरकार ने कहा कि इस तथाकथित कोर्ट का गठन ही संधि की शर्तों के खिलाफ हुआ है। इसलिए भारत उसके द्वारा जारी किए गए आदेश को पूरी तरह खारिज करता है।

सरकार ने कहा, 'इस तथाकथित कोर्ट का गठन विश्व बैंक ने संधि की शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए किया था। भारत इसके तथाकथित आदेश को पूरी तरह खारिज करता है, ठीक उसी तरह जैसे उसने इस अवैध तरीके से गठित संस्था के पिछले सभी बयानों और फैसलों को मजबूती से खारिज किया है।'

भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कभी इस संस्था के सामने पेश नहीं हुआ है। इसके साथ ही भारत ने कहा कि उसने इस निकाय के पहले के किसी भी बयान या फैसले को संज्ञान में लेने से भी इनकार किया है।

भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार नहीं

भारत सरकार ने अपने बयान में सबसे ज्यादा जोर देश के संप्रभु अधिकारों पर दिया। सरकार ने कहा कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को भारत के संप्रभु फैसलों पर फैसला सुनाने का कोई अधिकार नहीं है। भारत ने कहा, 'इस तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को भारत के संप्रभु फैसलों पर किसी भी तरह का अधिकार क्षेत्र नहीं है।'

सरकार ने आगे कहा कि इस संस्था की ओर से अभी या भविष्य में दिए जाने वाले किसी भी आदेश का भारत की ओर से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट्स से जुड़े फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भारत ने कहा, 'इसके अभी या भविष्य में दिए गए किसी भी आदेश का भारत की ओर से किए जा रहे प्रोजेक्ट्स से जुड़ी कार्रवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।'

आर्बिट्रेशन बॉडी के गठन को बताया संधि का उल्लंघन

भारत ने एक बार फिर अपना पुराना रुख दोहराते हुए कहा कि इस आर्बिट्रेशन बॉडी की स्थापना ही सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है। भारत के मुताबिक, इस संस्था का गठन संधि के प्रावधानों के अनुरूप नहीं हुआ है। इसलिए इसके आधार पर जारी की गई किसी भी कार्यवाही या आदेश को भारत मान्यता नहीं देता। सरकार ने कहा कि वह पहले भी लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि इस तथाकथित पंचाट संस्था का गठन सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है।

सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला जारी

भारत ने अपने बयान में यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला अभी भी लागू है। सरकार ने साफ शब्दों में कहा, 'भारत का सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला लागू है।' यानी भारत की ओर से संधि को स्थगित रखने के फैसले में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है।

सिंधु जल संधि क्या है?

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे से जुड़ी एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधि है। यह समझौता 1960 में हुआ था और विश्व बैंक ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं। भारत को पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज के पानी के इस्तेमाल का प्रमुख अधिकार मिला, जबकि पश्चिमी नदियां सिंधु, झेलम और चिनाब मुख्य रूप से पाकिस्तान के हिस्से में गईं।

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