Israel Election 2026: इज़रायल चुनाव में 61 सीटों का पेच: क्या अरब दल तय करेंगे अगला प्रधानमंत्री?

Israel Election 2026: इज़रायल चुनाव 2026 में नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से पीछे है। जानिए 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सीटों का गणित, अरब दलों की भूमिका और नई सरकार बनने की प्रक्रिया।

Update:2026-10-28 22:10 IST

Israel Election 2026: इज़रायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है, लेकिन उनकी अगुवाई वाले गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत मिलता नहीं दिखाई दे रहा है। मंगलवार को हुए मतदान के बाद बुधवार को शुरू हुई मतगणना में लगभग 85.6 प्रतिशत मतों की गणना पूरी होने तक नेतन्याहू समर्थक राजनीतिक दलों को 53 सीटें, पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइज़नकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें और अरब राजनीतिक दलों को 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है। इज़रायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन आवश्यक है। ऐसे में चुनाव के बाद किसी एक राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलने और त्रिशंकु संसद बनने की स्थिति दिखाई दे रही है। अंतिम मतगणना अभी शेष है।

इस चुनाव के नतीजों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी आइज़नकोट की यशार पार्टी से अधिक मत प्राप्त किए हैं, लेकिन दोनों नेताओं के गठबंधनों में से किसी के पास फिलहाल अकेले सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सांसद नहीं हैं। बुधवार को मतगणना के दौरान तस्वीर लगातार बदलती रही। लगभग 52 प्रतिशत मतों की गणना के समय नेतन्याहू समर्थक दलों को 56 और विपक्षी दलों को 49 सीटें मिलती दिखाई दे रही थीं। बाद में अरब बहुल क्षेत्रों से मतों की गणना बढ़ने के साथ अरब पार्टियों की सीटों का अनुमान बढ़ा और नेतन्याहू गठबंधन की अनुमानित सीटें घट गईं। दोपहर बाद केंद्रीय चुनाव आयोग के आँकड़ों में नेतन्याहू का गठबंधन 53 सीटों पर और आइज़नकोट का गठबंधन 48 सीटों पर पहुँच गया, जबकि अरब पार्टियों की संयुक्त संख्या 19 हो गई। इसका अर्थ है कि अभी तक जनता का फैसला किसी एक राजनीतिक खेमे को स्पष्ट संसदीय बहुमत नहीं देता।

यह चुनाव सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान से जुड़े सैन्य संघर्षों के पश्चात पहला आम चुनाव है। इसलिए इसके नतीजों को नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक नेतृत्व के मूल्यांकन के रूप में भी देखा जा रहा है। नेतन्याहू ने चुनाव में अपनी सरकार के सुरक्षा संबंधी फैसलों, ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाइयों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंधों को प्रमुखता दी। दूसरी ओर विपक्ष ने सात अक्टूबर की सुरक्षा विफलता, सरकारी जवाबदेही, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सेना में धार्मिक विद्यार्थियों की भर्ती से संबंधित विवादों को उठाया। चुनाव में 77.7 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ, जो पिछले दो दशकों से अधिक समय का सर्वोच्च मतदान प्रतिशत है।

लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन सहयोगी दलों की घटती संख्या से चुनौती

प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को मतगणना के विभिन्न चरणों में लगभग 27 से 28 सीटें मिलती दिखाई दी हैं। इसके बाद गादी आइज़नकोट की यशार पार्टी लगभग 20 से 22 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही है। नफ्ताली बेनेट और याइर लापिद के संयुक्त गठबंधन बेयाखाद को लगभग 11 से 12 सीटें, याइर गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी और अविगडोर लिबरमैन की यिस्राएल बेतेनू को लगभग सात से आठ सीटें मिलने के अनुमान सामने आए हैं। नेतन्याहू के सहयोगी धार्मिक दलों शास और यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म तथा इतामार बेन-गवीर की ओत्ज़मा येहुदित को लगभग सात-सात सीटें और बेज़लेल स्मोट्रिच के धार्मिक ज़ायनिज़्म गठबंधन को लगभग छह सीटें मिलती दिखाई दी हैं। ये आँकड़े मतगणना के विभिन्न चरणों के अंतरिम अनुमान हैं, अंतिम घोषित सीटें नहीं।

नेतन्याहू के लिए चुनौती का एक पहलू यह है कि लिकुड सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसके सहयोगियों की कुल संसदीय ताकत बहुमत से पीछे रह रही है। वर्ष 2022 के चुनाव में नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन ने कुल 64 सीटें प्राप्त की थीं। वर्तमान मतगणना के आधार पर उसी राजनीतिक खेमे की सीटें 53 के आसपास दिखाई दे रही हैं। यदि अंतिम परिणाम भी इस अनुमान के अनुरूप रहे, तो पहले की तुलना में उसके संसदीय समर्थन में उल्लेखनीय कमी दर्ज होगी। हालाँकि अंतिम परिणाम आने से पहले यह तय करना उचित नहीं होगा कि किन दलों को कितनी सीटों का वास्तविक लाभ या नुकसान हुआ है।

अरब पार्टियों को ऐतिहासिक बढ़त, 19 सीटों ने बदला संसदीय समीकरण

इज़रायल के चुनाव परिणामों में सबसे उल्लेखनीय घटनाक्रम अरब राजनीतिक दलों का प्रदर्शन रहा है। जॉइंट लिस्ट और मंसूर अब्बास की रा'अम पार्टी को मिलाकर 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है। यह इज़रायल की अरब पार्टियों के लिए ऐतिहासिक स्तर का प्रतिनिधित्व होगा। पिछले चुनाव में इन दलों के पास संयुक्त रूप से दस सीटें थीं। अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी, स्थानीय विकास, नागरिक अधिकारों, अपराध नियंत्रण और फ़िलिस्तीनी प्रश्न से जुड़े मुद्दे इस चुनाव में विशेष रूप से उठे थे। अरब राजनीतिक दलों की सीटों में बढ़ोतरी ने अब सरकार गठन के गणित को भी प्रभावित किया है।

यदि आइज़नकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे की अनुमानित 48 सीटों में अरब पार्टियों की 19 सीटें जोड़ दी जाएँ तो यह संख्या 67 हो जाती है। गणित की दृष्टि से यह बहुमत से अधिक है, लेकिन राजनीतिक रूप से इसे तैयार गठबंधन नहीं माना जा सकता। इसका कारण यह है कि आइज़नकोट के सहयोगियों में कई दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दल शामिल हैं, जो अरब पार्टियों के साथ औपचारिक सरकार बनाने पर आपत्ति जता चुके हैं। नफ्ताली बेनेट और अविगडोर लिबरमैन जैसे नेताओं की राजनीतिक शर्तें भी इस संभावना को जटिल बनाती हैं। वहीं डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता याइर गोलान ने अरब दलों को साथ लेकर वैकल्पिक सरकार बनाने का समर्थन किया है। अरब दलों की संसदीय ताकत और मुख्य विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक समझौते की संभावना को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

राष्ट्रपति हर्ज़ोग की अपील, दोबारा चुनाव से बचने के लिए खुले मन से बातचीत करें

इज़रायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने चुनाव परिणामों की प्रारंभिक तस्वीर सामने आने के बाद राजनीतिक दलों से गठबंधन वार्ता के दौरान खुले मन से बातचीत करने और नए चुनाव की स्थिति से बचने का आग्रह किया है। राष्ट्रपति की यह अपील ऐसे समय सामने आई है जब दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के बीच वैचारिक तथा व्यक्तिगत मतभेद बने हुए हैं। एक ओर नेतन्याहू राष्ट्रीय सुरक्षा और दक्षिणपंथी राजनीतिक आधार के साथ सरकार बनाने की बात कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर आइज़नकोट तथा उनके सहयोगी नए राजनीतिक नेतृत्व का दावा कर रहे हैं।

इज़रायल में प्रधानमंत्री जनता द्वारा सीधे निर्वाचित नहीं होता। राष्ट्रपति चुनाव परिणाम आने के बाद संसद में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने वाले दलों से परामर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का दायित्व सौंपते हैं जिसके पास बहुमत जुटाने की क्षमता दिखाई देती है। इसका अर्थ यह है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी नेतन्याहू का फिर प्रधानमंत्री बनना अपने आप सुनिश्चित नहीं है। इसी तरह विपक्षी दलों और अरब दलों की कुल सीटें 61 से अधिक होने का अर्थ यह नहीं कि वे बिना आपसी समझौते के नई सरकार बना सकते हैं। राष्ट्रपति के समक्ष वास्तविक प्रश्न यह होगा कि कौन-सा नेता विभिन्न दलों से ऐसा समर्थन जुटा सकता है जिससे नई सरकार संसद का विश्वास प्राप्त कर सके।

त्रिशंकु संसद की स्थिति में क्या होगा? संविधान में सरकार बनाने के कई अवसर

इज़रायल की संवैधानिक व्यवस्था में त्रिशंकु संसद बनने पर नई सरकार के गठन के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है। भारत की तरह वहाँ भी राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन इज़रायल में राष्ट्रपति के अधिकार और सरकार गठन की समय-सीमाएँ विशेष रूप से निर्धारित हैं। यदि अंतिम चुनाव परिणामों में किसी दल या पूर्व घोषित गठबंधन को 61 सीटें नहीं मिलतीं, तो राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से परामर्श कर ऐसे सांसद को सरकार बनाने का पहला अवसर देंगे जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वह आवश्यक संसदीय समर्थन जुटा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि वह व्यक्ति सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही हो।

पहला अवसर : 28 दिन, जरूरत पड़ने पर 14 दिन और

इज़रायल के मूल कानून 'बेसिक लॉ : द गवर्नमेंट' के अनुसार राष्ट्रपति जिस सांसद को सरकार बनाने का पहला दायित्व सौंपते हैं, उसके पास सामान्यतः 28 दिन का समय होता है। यदि इस अवधि में वह आवश्यक राजनीतिक समझौते नहीं कर पाता, लेकिन सरकार बनने की संभावना बनी रहती है, तो राष्ट्रपति उसे अधिकतम 14 दिन का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। इस प्रकार पहला उम्मीदवार कुल 42 दिन तक गठबंधन बनाने का प्रयास कर सकता है। इस अवधि में राजनीतिक दल मंत्रालयों के बँटवारे, सरकार की नीतियों, बजट, धार्मिक और नागरिक कानूनों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर समझौते कर सकते हैं।

यहाँ समझना आवश्यक है कि सरकार बनाने के लिए केवल राजनीतिक दलों का एक साझा बयान पर्याप्त नहीं है। गठबंधन को संसदीय विश्वासमत हासिल करना होता है। राष्ट्रपति द्वारा नामित नेता को ऐसे सहयोगियों की आवश्यकता होती है जो सरकार गठन के समय उसके पक्ष में खड़े हों और बाद में सरकार के संचालन में आवश्यक समर्थन प्रदान कर सकें। गठबंधन समझौते में महत्वपूर्ण मंत्रालयों के साथ संसदीय समितियों और विधायी प्राथमिकताओं पर भी सहमति बनाई जाती है। इज़रायल में छोटे दलों के लिए यह प्रक्रिया विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उनकी अपेक्षाकृत कम सीटें भी बहुमत जुटाने में निर्णायक हो सकती हैं।

दूसरा अवसर : पहले नेता के विफल होने पर दूसरे सांसद को 28 दिन

यदि पहले उम्मीदवार को मिला समय समाप्त हो जाए और वह सरकार न बना पाए, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे सांसद को यह जिम्मेदारी सौंप सकते हैं। राष्ट्रपति इसके बजाय यह भी घोषित कर सकते हैं कि उनके आकलन में सरकार बनने की संभावना नहीं है। यदि दूसरे उम्मीदवार को सरकार बनाने का अवसर दिया जाता है, तो उसे 28 दिन मिलते हैं। इस दूसरे प्रयास के लिए समय बढ़ाने की व्यवस्था नहीं है। इस अवधि में दूसरा नेता पहले गठबंधन की विफल वार्ताओं से अलग राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर सकता है। उदाहरण के लिए पहले से विपक्ष में रहे दो दल किसी साझा कार्यक्रम पर सहमत हो सकते हैं या किसी गठबंधन के भीतर समर्थन का पुनर्गठन हो सकता है। लेकिन ऐसी संभावनाएँ राजनीतिक समझौतों पर निर्भर करेंगी, केवल संवैधानिक अवसर मिलने से सरकार नहीं बनेगी।

तीसरा अवसर : 61 सांसद मिलकर किसी नेता के नाम की सिफारिश कर सकते हैं

इज़रायल की व्यवस्था में गतिरोध तोड़ने का एक और प्रावधान है। यदि राष्ट्रपति दूसरे उम्मीदवार को सरकार गठन की जिम्मेदारी नहीं देते या दूसरा उम्मीदवार भी विफल हो जाता है, तो आगे 21 दिन की अवधि में संसद के कम से कम 61 सदस्य लिखित रूप से किसी एक सांसद को सरकार बनाने का अवसर देने की माँग कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में उस नामित सांसद को सरकार बनाने के लिए 14 दिन का समय मिलता है। इसका महत्व यह है कि राजनीतिक दल अपने स्तर पर साझा नेता के नाम पर सहमति बनाकर राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्ताव रख सकते हैं। यह रास्ता तब भी उपलब्ध हो सकता है जब पहले दो प्रमुख राजनीतिक नेता सरकार बनाने में असफल हो चुके हों।

इस व्यवस्था में 61 सांसदों की लिखित माँग का विशेष महत्व है। राष्ट्रपति द्वारा किसी नेता को सरकार बनाने के लिए नामित करना और संसद के 61 सदस्यों द्वारा किसी नेता का समर्थन करना अलग प्रक्रियाएँ हैं। पहले मामले में राष्ट्रपति दलों से परामर्श करके निर्णय लेते हैं, जबकि अंतिम चरण में सांसदों की लिखित माँग आवश्यक होती है। यदि सांसद किसी तीसरे नेता के नाम पर सहमत हो जाते हैं, तो राजनीतिक गतिरोध का समाधान हो सकता है।

सभी प्रयास विफल हुए तो फिर चुनाव, तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री

यदि सरकार बनाने के ये सभी अवसर समाप्त हो जाएँ और कोई उम्मीदवार आवश्यक समर्थन प्राप्त न कर सके, तो संसद को भंग मान लिया जाता है और नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है। निर्धारित संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ऐसी स्थिति में 90 दिनों के भीतर नया चुनाव कराया जाना होता है। यह 90 दिन गठबंधन वार्ता की शुरुआत से नहीं, बल्कि संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के अंतिम रूप से विफल होने से जुड़ी समय-सीमा है। इसलिए त्रिशंकु संसद बनने पर भी तुरंत दोबारा मतदान नहीं कराया जाता। सरकार गठन की बातचीत कई सप्ताह या कुछ महीने तक चल सकती है।

इस पूरे समय के दौरान एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था लागू रहती है। जब तक नई सरकार गठित होकर कार्यभार नहीं संभालती, तब तक निवर्तमान सरकार कार्यवाहक सरकार के रूप में काम करती रहती है। वर्तमान परिस्थिति में इसका अर्थ यह होगा कि नेतन्याहू तत्काल प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ेंगे। वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे, भले ही चुनाव परिणामों में उनका गठबंधन आवश्यक बहुमत प्राप्त न कर सके। नई सरकार बनने पर ही सत्ता हस्तांतरण होगा।

क्या नेतन्याहू और आइज़नकोट मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार बना सकते हैं?

इज़रायल में एक और संवैधानिक रूप से संभव विकल्प राष्ट्रीय एकता सरकार का है। इसमें अभी एक-दूसरे के विरोध में चुनाव लड़ने वाले दल किसी साझा कार्यक्रम पर सरकार बनाने के लिए सहमत हो सकते हैं। नेतन्याहू की लिकुड और आइज़नकोट की यशार जैसी बड़ी पार्टियों का संयुक्त समर्थन गणित की दृष्टि से एक बड़ा संसदीय आधार तैयार कर सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार के साझा नेतृत्व, प्रधानमंत्री पद के क्रमिक हस्तांतरण या मंत्रालयों के बँटवारे जैसे राजनीतिक समझौतों पर बातचीत हो सकती है। हालाँकि वर्तमान राजनीतिक मतभेदों और चुनाव अभियान में किए गए वादों के कारण किसी ऐसे समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।

नेतन्याहू के मौजूदा सहयोगी इस विकल्प पर एकमत नहीं हैं। इतामार बेन-गवीर ने आइज़नकोट के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने के विचार पर आपत्ति जताई है। दूसरी ओर कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों ने लगातार चुनावों और संसदीय गतिरोध से बचने के लिए व्यापक सहयोग की आवश्यकता का उल्लेख किया है। इन विचारों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। किसी सरकार का संवैधानिक रूप से संभव होना और उस पर संबंधित दलों का राजनीतिक रूप से सहमत होना अलग बातें हैं।

क्या अरब दल नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए विपक्ष का समर्थन करेंगे?

अरब दलों की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज है। जॉइंट लिस्ट के नेताओं ने नेतन्याहू सरकार के विकल्प का रास्ता बनाने के लिए सहयोग करने की इच्छा व्यक्त की है। याइर गोलान भी अरब नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नई सरकार में शामिल करने की बात कर चुके हैं। लेकिन आइज़नकोट के नेतृत्व वाले पूरे विपक्षी खेमे में इस प्रश्न पर एक जैसी राय नहीं है। विशेष रूप से दक्षिणपंथी नेताओं का अरब दलों के साथ सरकार में शामिल होने को लेकर आरक्षण रहा है। इसलिए केवल 48 और 19 सीटें जोड़कर 67 सांसदों की सरकार बन जाने की घोषणा करना गलत होगा।

इसके अलावा संसद में समर्थन के कई रूप हो सकते हैं। कोई दल सरकार में मंत्री पद स्वीकार करके औपचारिक गठबंधन का हिस्सा बन सकता है, कोई दल बाहर से समर्थन दे सकता है और कोई दल कुछ विशेष संसदीय मतदान में सरकार को समर्थन देकर भी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होता। इन व्यवस्थाओं का राजनीतिक स्थायित्व अलग-अलग होता है। इज़रायल की मौजूदा परिस्थिति में यह प्रश्न विशेष महत्व रखेगा कि प्रमुख दल किस तरह के समर्थन को स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं और किन राजनीतिक शर्तों पर समझौता संभव होता है।

इज़रायल पहले भी झेल चुका है बार-बार चुनाव और गठबंधन संकट

इज़रायल में राजनीतिक गतिरोध कोई नई घटना नहीं है। अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच देश को पाँच संसदीय चुनावों से गुजरना पड़ा था। इस दौरान कभी किसी दल को आवश्यक समर्थन नहीं मिला, तो कभी गठबंधन बनने के बाद आंतरिक मतभेदों के कारण सरकार टिक नहीं सकी। अप्रैल और सितंबर 2019 के चुनावों के बाद राजनीतिक गतिरोध बना रहा। मार्च 2020 के चुनाव के बाद नेतन्याहू और बेनी गांत्ज़ के बीच राष्ट्रीय एकता सरकार बनी, लेकिन वह भी स्थायी नहीं रह सकी। मार्च 2021 के चुनाव के बाद नफ्ताली बेनेट और याइर लापिद ने अनेक वैचारिक रूप से भिन्न दलों को साथ लेकर सरकार बनाई, जिसमें मंसूर अब्बास की अरब पार्टी रा'अम भी सम्मिलित थी। बाद में यह गठबंधन टूट गया और नवंबर 2022 में फिर चुनाव हुआ। उस चुनाव में नेतन्याहू समर्थक गठबंधन ने 64 सीटें हासिल करके सरकार बनाई।

यह इतिहास वर्तमान चुनाव परिणामों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इज़रायल में सबसे बड़ी पार्टी होना और स्थायी सरकार चलाना दो अलग चुनौतियाँ हैं। पिछली सरकारों के अनुभव बताते हैं कि गठबंधन में अपेक्षाकृत कम सीटों वाले दल भी प्रमुख नीतिगत प्रश्नों पर असहमति होने की स्थिति में सरकार के अस्तित्व को प्रभावित कर सकते हैं। धार्मिक समुदायों की सेना में भर्ती, फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों से जुड़ी नीतियाँ, न्यायिक सुधार और बजट ऐसे विषय रहे हैं जिन पर गठबंधन सहयोगियों के मतभेद सामने आते रहे हैं। इसलिए मौजूदा चुनाव के बाद बनने वाली किसी भी सरकार के स्वरूप के साथ उसके सहयोगियों के बीच नीतिगत सहमति भी महत्वपूर्ण होगी।

अंतिम मतगणना शेष, छह लाख विशेष मतपत्रों से बदल सकता है सीटों का गणित

इज़रायल के केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार लगभग 85.6 प्रतिशत मतों की गणना के बाद भी करीब छह लाख ऐसे मतपत्रों की गिनती बाकी है जिन्हें दोहरे लिफाफे वाले विशेष मतपत्र कहा जाता है। इनमें सैनिकों, विदेशों में तैनात राजनयिकों, कुछ चिकित्सा कर्मचारियों तथा विशेष परिस्थितियों में मतदान करने वाले नागरिकों के वोट शामिल हैं। इसके अलावा सामान्य मतदान के भी कुछ मतपत्रों की जाँच और गणना शेष है। इन वोटों को अगले कुछ दिनों में गणना में सम्मिलित किया जाना है। आयोग के अनुसार तत्काल अगला बड़ा अद्यतन उपलब्ध होने की संभावना सीमित है।

इन बचे हुए वोटों का महत्व इसलिए है कि इज़रायल में संसद की सीटें राष्ट्रीय वोट प्रतिशत के आधार पर बाँटी जाती हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल को संसद में प्रवेश के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध वोट प्राप्त करने होते हैं। मतगणना के वर्तमान चरण में रिज़र्विस्ट्स-इकोनॉमिक पार्टी लगभग 2.6 प्रतिशत तथा पीपल ऑफ इज़रायल लगभग 1.6 प्रतिशत मतों के साथ इस सीमा से नीचे हैं। यदि अंतिम मतगणना में कोई दल न्यूनतम सीमा पार करता है या उससे नीचे चला जाता है, तो अन्य दलों की सीटों का वितरण भी प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि अंतिम आधिकारिक परिणाम आने से पहले संसदीय सीटों के आँकड़ों को अंतरिम अनुमान मानना आवश्यक है।

सत्ता का फैसला केवल मतगणना नहीं, गठबंधन समझौते भी करेंगे

इज़रायल का चुनाव ऐसे समय हुआ है जब देश पिछले तीन वर्षों के युद्धों, राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों और गंभीर घरेलू राजनीतिक मतभेदों से गुजर रहा है। मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी ने चुनाव के प्रति व्यापक जनरुचि को सामने रखा है। प्रारंभिक परिणामों में नेतन्याहू की लिकुड सबसे बड़ी पार्टी है, उनका गठबंधन विपक्षी गठबंधन से आगे है और अरब पार्टियों का प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। लेकिन इन तीनों तथ्यों के साथ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अभी किसी एक गठबंधन को आवश्यक संसदीय बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा है।

अब अंतिम परिणाम आने के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग की परामर्श प्रक्रिया और राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन वार्ता पर ध्यान केंद्रित होगा। नेतन्याहू, आइज़नकोट और अन्य दलों के सामने प्रश्न केवल प्रधानमंत्री पद का नहीं, बल्कि ऐसा संसदीय समर्थन जुटाने का होगा जिसके आधार पर सरकार गठित की जा सके और उसे चलाया जा सके। राष्ट्रीय सुरक्षा, धार्मिक छूट, न्यायिक व्यवस्था और अरब राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर दलों के मतभेद इन वार्ताओं का हिस्सा होंगे।

इसलिए 27 अक्टूबर के मतदान से उपजी तस्वीर को अभी अंतिम राजनीतिक परिणाम नहीं कहा जा सकता। चुनाव ने नई संसद की संभावित संरचना सामने रख दी है, लेकिन इज़रायल का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इसका संवैधानिक निर्णय आधिकारिक परिणामों के बाद होने वाली सरकार गठन की प्रक्रिया में होगा। यदि दल आवश्यक समझौते करने में असफल रहते हैं, तो इज़रायल को एक बार फिर चुनाव कराना पड़ सकता है। तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे।

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