Trump Tariff India: क्या है US की 'धारा 301' कानून जिसने बढ़ाई भारत की टेंशन? जानिए भारतीय निर्यात-उद्योगों पर क्या होगा इसका असर

Trump Tariff India: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत के बीच ट्रंप प्रशासन ने 'धारा 301' के तहत भारत पर 12.5% अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। बंधुआ मजदूरी से जुड़ी जांच के बाद आए इस प्रस्ताव से एल्युमिनियम, कपास और चावल जैसे निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। जानिए भारत के पास बचाव के क्या रास्ते हैं।

Update:2026-06-03 17:48 IST

Trump Tariff India: भारत और अमेरिका के बीच चल रहे ऐतिहासिक व्यापार समझौते की बातचीत अब एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा यह बयान दिए जाने के ठीक दो दिन बाद कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जा रहा है और अब केवल भाषा को ठीक करना बाकी है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठा दिया है। ट्रंप सरकार ने अपने देश के 'धारा 301' कानून के तहत एक जांच रिपोर्ट जारी करते हुए भारत समेत दुनिया के करीब 60 देशों पर अतिरिक्त आयात शुल्क (टैक्स) लगाने का नया प्रस्ताव रख दिया है। अमेरिका द्वारा उठाया गया यह कदम इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस समय अमेरिकी अधिकारियों का एक बड़ा दल भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की शर्तों को अंतिम रूप देने के लिए भारत के दौरे पर आया हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि भारत धारा 301 की इस कार्रवाई के मामले में अमेरिका के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। इसके साथ ही, भारत और अमेरिका के बीच 2 फरवरी 2026 को घोषित हुए और 7 फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान के अनुसार व्यापार समझौते के ढांचे को अंतिम रूप देने के लिए समानांतर तौर पर बातचीत जारी है। गौरतलब है कि इस साल फरवरी में दोनों देशों ने एक व्यापार समझौते की घोषणा की थी, जिसके तहत भारतीय सामानों पर लगने वाले टैक्स को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था। लेकिन, इस व्यवस्था के पूरी तरह लागू होने से पहले ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप सरकार द्वारा लगाए गए कुछ टैक्सों को अवैध घोषित कर दिया, जिसके बाद ट्रंप प्रशासन ने 10 प्रतिशत का एक अंतरिम टैक्स लगाया था जो अगले महीने खत्म होने जा रहा है। इसी संदर्भ में अमेरिका के इस नए कदम को देखा जा रहा है।

क्या है धारा 301 और अमेरिका का नया प्रस्ताव?

अमेरिका के साल 1974 के व्यापार कानून की धारा 301 वहां की सरकार के मुख्य व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) को यह अधिकार देती है कि वह दूसरे देशों की व्यापारिक नीतियों और तौर-तरीकों की बारीकी से जांच करे। इसका मुख्य उद्देश्य यह देखना होता है कि क्या कोई देश ऐसे गलत तरीके अपना रहा है जिससे अमेरिका के व्यापारिक हितों को नुकसान पहुंच रहा हो। यदि जांच में यह साबित हो जाता है कि नीतियां गलत हैं, तो अमेरिका उस देश के सामान पर भारी टैक्स या प्रतिबंध लगा सकता है। इसी कानून के तहत अमेरिकी एजेंसी ने मार्च 2026 में दो अलग-अलग जांच शुरू की थीं, जो बंधुआ मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) और कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता से जुड़ी थीं।

बीती 2 जून को अमेरिकी एजेंसी ने बंधुआ मजदूरी से जुड़ी जांच के नतीजे जारी कर दिए, जिसमें भारत सहित 60 देशों पर नए सिरे से टैक्स लगाने का प्रस्ताव किया गया है। हालांकि, यह टैक्स अभी केवल एक प्रस्ताव के स्तर पर है। जो देश इस रिपोर्ट और जांच के नतीजों को चुनौती देना चाहते हैं, वे 22 जून 2026 तक अपनी बात रखने के लिए समय मांग सकते हैं और 6 जुलाई तक लिखित में अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। इसके बाद 7 जुलाई को इस मामले पर अंतिम सुनवाई होगी। जानकारों का मानना है कि जुलाई के अंत तक इस पर अंतिम फैसला आ जाएगा और यह टैक्स सुनवाई के तुरंत बाद लागू भी हो सकता है।

भारतीय निर्यात और उद्योगों पर क्या होगा इसका असर?

अमेरिका ने इस नई नीति के तहत दो तरह के टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा है, जो कि 10 प्रतिशत और 12.5 प्रतिशत हैं। 10 प्रतिशत का टैक्स उन देशों पर लगेगा जिन्होंने बंधुआ मजदूरी से बनने वाले सामान के आयात पर आंशिक या पूर्ण रोक लगा रखी है या ऐसा करने का वादा किया है, जैसे कि पाकिस्तान। वहीं, 12.5 प्रतिशत का बड़ा टैक्स भारत, चीन, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर और यूएई जैसे उन बड़े देशों पर लगाने का प्रस्ताव है जिनके यहां ऐसा कोई कड़ा नियम फिलहाल प्रभावी नहीं है। भारत को उन 54 देशों की सूची में रखा गया है जो इस नियम का कड़ाई से पालन कराने में पीछे रहे हैं। ऐसे में भारत को 12.5 प्रतिशत के अतिरिक्त टैक्स का सामना करना पड़ सकता है, जब तक कि भारत यह साबित न कर दे कि उसके यहां भी इस संबंध में आंशिक नियम लागू हैं।

व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह 12.5 प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स लागू हो जाता है, तो अमेरिका को होने वाले भारत के निर्यात पर इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा। इससे एल्युमिनियम, कपास, सी-फूड (समुद्री भोजन), कॉफी और चावल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के सामान अमेरिका में महंगे हो जाएंगे और वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर होगी। भारतीय निर्यातकों को अब अमेरिकी नियामकों की ओर से अपने सामान की पूरी कड़ियों की जांच और पारदर्शिता को लेकर बहुत कड़े नियमों और पूछताछ का सामना करना पड़ सकता है।

बचाव में भारत के पास क्या हैं रास्ते और रणनीतियां?

इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए भारत के पास दो मुख्य रास्ते नजर आते हैं। पहला रास्ता कानूनी लड़ाई का है। आर्थिक मामलों के थिंक टैंक 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (जीटीआरआई) का मानना है कि भारत को अमेरिका के इस कदम को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के तहत कानूनी रूप से चुनौती देनी चाहिए। जीटीआरआई के अनुसार, यह 12.5 प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स डब्ल्यूटीओ के नियमों के खिलाफ है क्योंकि यह अमेरिका द्वारा तय की गई तय सीमा से कहीं अधिक है। भारत को यह दलील भी देनी चाहिए कि यह जांच इस बात पर आधारित नहीं है कि भारत खुद बंधुआ मजदूरी से सामान बना रहा है, बल्कि इस बात पर है कि भारत तीसरे देशों से आने वाले ऐसे सामानों को रोकता है या नहीं। इसलिए, पूरे देश के सभी उत्पादों पर एक जैसा भारी टैक्स लगाना पूरी तरह से गलत है।

दूसरा और सबसे प्रभावी रास्ता बातचीत की मेज पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत इस समय अमेरिका के साथ जो द्विपक्षीय व्यापार समझौता कर रहा है, वह इन प्रस्तावित टैक्सों से छूट पाने का सबसे अच्छा जरिया बन सकता है। भारत को बातचीत के दौरान इस मुद्दे को मजबूती से उठाना चाहिए और समझौते के भीतर ही एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहिए जिससे भारतीय उद्योगों को इस अतिरिक्त टैक्स के दायरे से बाहर रखा जा सके। कुल मिलाकर, भारत को आगामी वार्ताओं में बहुत संभलकर और मजबूती से अपनी रणनीतियों को आगे बढ़ाना होगा ताकि देश के निर्यात और आर्थिक हितों की पूरी रक्षा की जा सके।

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