TRENDING TAGS :
सोन नदी को लेकर बिहार-झारखंड में समझौता! दिल्ली में शाह के सामने CM सम्राट-सोरेन करेंगे साइन, जानें किसे कितना मिलेगा जल
बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर करीब ढाई दशक से चला आ रहा विवाद अब समाधान की ओर बढ़ चुका है।
Bihar Jharkhand Son River Agreement: सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर बिहार और झारखंड के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब खत्म होने की कगार पर है। आज दिल्ली में दोनों राज्यों के CM सम्राट चौधरी और CM हेमंत सोरेन समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। 1973 में बाणसागर परियोजना को लेकर हुए समझौते के बाद से यह मामला लगातार उलझा हुआ था। अब केंद्र की पहल के बाद दोनों राज्यों के बीच पानी बांटने के फॉर्मूले पर सहमति बन चुकी है और औपचारिक समझौते की दिशा में कदम बढ़ाया जा रहा है।
इसी मुद्दे के बीच बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का दिल्ली दौरा भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय में गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में होने वाली उच्चस्तरीय बैठक प्रमुख है। कर्तव्य भवन में होने वाली इस बैठक में केंद्र के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बिहार के मुख्यमंत्री शामिल होंगे। बैठक में सुरक्षा, प्रशासनिक समन्वय और राज्य के विकास से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके बाद मुख्यमंत्री शाम 4 बजे केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल से भी मुलाकात करेंगे।
1973 में शुरू हुई थी सोन नदी के पानी की कहानी
सोन नदी के जल बंटवारे का विवाद करीब 53 साल पुराना है। साल 1973 में बाणसागर परियोजना के तहत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और तत्कालीन अविभाजित बिहार के बीच समझौता हुआ था। इस समझौते में संयुक्त बिहार के लिए सोन नदी के कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट यानी MAF पानी का प्रावधान किया गया था। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं था, इसलिए बिहार को मिलने वाले पानी में झारखंड का हिस्सा भी शामिल माना गया। लेकिन साल 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड के नया राज्य बनने के बाद पानी के बंटवारे का सवाल खड़ा हो गया।
झारखंड ने मांगा सोन नदी में अपना हिस्सा
राज्य बनने के बाद झारखंड ने सोन नदी के पानी में अपनी हिस्सेदारी की मांग उठाई। झारखंड का तर्क था कि सोन नदी का उद्गम क्षेत्र और उसका बड़ा कैचमेंट एरिया उसके आसपास के इलाके में आता है, इसलिए पानी पर उसका भी अधिकार होना चाहिए। दूसरी तरफ बिहार 1973 के समझौते का हवाला देते हुए 7.75 MAF पानी पर अपना दावा करता रहा। दोनों राज्यों के बीच इस मुद्दे पर लंबे समय तक सहमति नहीं बन सकी। इस विवाद का सीधा असर बिहार की इंद्रपुरी जलाशय परियोजना पर भी पड़ा। झारखंड की ओर से NOC नहीं मिलने के कारण यह महत्वपूर्ण परियोजना सालों से आगे नहीं बढ़ पा रही थी।
2025 में रांची बैठक में बनी थी सहमति
विवाद को सुलझाने की दिशा में बड़ी पहल 10 जुलाई 2025 को हुई। रांची में पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की 27वीं बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने की थी। बैठक में बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के 7.75 MAF पानी को बांटने पर सैद्धांतिक सहमति बनी। इसके बाद बातचीत आगे बढ़ी और बिहार कैबिनेट ने 13 जनवरी 2026 को जल बंटवारे के फॉर्मूले को मंजूरी दे दी। अब इसी सहमति को औपचारिक रूप देने की तैयारी है।
बिहार को 5.57 और झारखंड को 2 MAF पानी
ताजा फॉर्मूले के मुताबिक सोन नदी के कुल 7.75 MAF पानी में से बिहार को 5.57 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी देने की बात तय हुई है। इससे पहले 5.75 और 2 MAF के फॉर्मूले पर भी चर्चा हुई थी, लेकिन अब बिहार के हिस्से में 5.57 MAF पानी तय किए जाने की बात सामने आई है।
बाढ़ और जल प्रबंधन पर भी होगी चर्चा
बिहार में इस समय बाढ़ का खतरा बना हुआ है। ऐसे में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री के साथ सम्राट चौधरी होने वाली बैठक को काफी अहम माना जा रहा है। बैठक में बिहार की नदियों के जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और जल संसाधन से जुड़ी परियोजनाओं पर चर्चा हो सकती है। सोन नदी के जल बंटवारे का मुद्दा भी इसी व्यापक जल प्रबंधन से जुड़ा हुआ है।
इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को मिलेगा सबसे बड़ा फायदा
रोहतास जिले में प्रस्तावित इंद्रपुरी जलाशय परियोजना का सपना कई दशक पहले देखा गया था, लेकिन बिहार-झारखंड के बीच जल विवाद के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब जल बंटवारे पर सहमति बनने से इसके रास्ते में बड़ी बाधा दूर होने की उम्मीद है। परियोजना पूरी होने पर भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, पटना, गया और अरवल जैसे जिलों को सिंचाई का फायदा मिलने की संभावना है। इससे दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर सिंचाई सुविधा बेहतर हो सकती है।
दक्षिण बिहार के लिए क्यों अहम है सोन नदी?
सोन नदी को दक्षिण बिहार की लाइफलाइन कहा जाता है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र से होता है। इसके बाद नदी झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों से होकर बिहार पहुंचती है और मनेर के पास गंगा नदी में मिल जाती है। दक्षिण बिहार के कई जिलों की खेती सोन नदी के पानी पर निर्भर है। ऐसे में पानी के बंटवारे को लेकर स्पष्ट व्यवस्था होने से किसानों को लंबे समय में फायदा मिल सकता है। सिर्फ सिंचाई ही नहीं, सोन नदी के बेहतर प्रबंधन से बाढ़ नियंत्रण, गाद प्रबंधन और जल संरक्षण की योजनाओं को भी आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।


