15,000 अस्पताल कैशलेस सेवा रोकेंगे 1 सितंबर से

Hospitals vs Insurers: बीमा कंपनियों से विवाद के चलते 15,000 अस्पताल 1 सितंबर से कैशलेस इलाज रोकने की तैयारी में।

Sonal Girhepunje
Published on: 25 Aug 2025 11:58 AM IST
15,000 Hospitals Strike
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15,000 Hospitals Strike (Photo - Social Media)

Hospitals vs Insurers: 1 सितंबर 2025 से देश भर में 15,000 से अधिक अस्पतालों ने कैशलेस इलाज बंद करने का निर्णय लिया है। बजाज आलियांज और केयर हेल्थ दो बड़ी बीमा कंपनियों हैं, जो इस मामले में शामिल हैं। एचपीआई (अस्पतालों का संगठन) का कहना है कि इलाज की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बीमा कंपनियां पुरानी दरें ही मान रही हैं।

अस्पतालों ने कंपनियों पर आरोप लगाया कि वे भुगतान में देर करते हैं और मरीजों से गैर-जरूरी कागजात मांगते हैं। इससे मरीजों को परेशानी होती है क्योंकि बिल समय पर नहीं आता।

अस्पतालों की शिकायतें

Bajaj Allianz ने पुराने अनुबंध की दरें बढ़ाने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है। शर्तों के अनुसार, इलाज की लागत हर दो साल में बदलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

अस्पतालों का कहना है कि जब मरीज भर्ती होते हैं, तो दवाइयों, जांच और कमरे के शुल्क में बिना कारण कटौती कर दी जाती है। इससे अस्पतालों को नुकसान होता है और मरीजों को भी परेशानी झेलनी पड़ती है।

इसके अलावा, बिल की मंजूरी में छह से सात घंटे की देरी होती है जब मरीज डिस्चार्ज होता है। इसलिए मरीज छुट्टी के बाद भी अस्पताल में रहना पड़ता है।

एएचपीआई (Association of Healthcare Providers of India) ने इस बारे में Health Care को नोटिस भेजा है और बातचीत की मांग की है। संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कैशलेस चिकित्सा पूरी तरह से बंद कर दी जाएगी अगर जल्द समाधान नहीं मिलता।

मरीजों पर प्रभाव

अब जिन मरीजों ने इन दोनों कंपनियों की बीमा पॉलिसी ली है, उन्हें अपने इलाज का पूरा खर्च स्वयं भरना होगा। इसके बाद वे बीमा कंपनी से पुनर्गठन की मांग कर सकेंगे। इससे अस्पताल में अचानक भर्ती होने वाले लोगों को बहुत पैसा खर्च करना पड़ा सकता है।

एएचपीआई के महानिदेशक डॉ. गिरधर ज्ञानी ने कहा कि दोनों संस्थाएं बिना किसी कारण के चिकित्सा खर्च में कमी कर रही हैं। मरीजों का बिल मंजूर करने में घंटों लगते हैं। व्यवसायों ने इस मुद्दे पर एक बैठक बुलाई है।

बीमा कंपनियों की पॉलिसी पर प्रश्न

बीमा कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए पहले सस्ते प्रीमियम वाली पॉलिसी देती हैं। इनमें बीमारियों का कवरेज सीमित होता है। अगले साल ग्राहकों को ऑफर दिया जाता है कि अब गंभीर बीमारियां भी शामिल होंगी, लेकिन इसके लिए प्रीमियम 2-3 हजार रुपये ज्यादा देना होगा। ग्राहक मान जाते हैं, लेकिन इसके बाद हर साल औसतन 10% प्रीमियम बढ़ा दिया जाता है। अगर किसी ने पहले साल 20,000 रुपये की पॉलिसी ली, तो दो साल में उसका प्रीमियम बढ़कर 25-27 हजार रुपये तक पहुंच जाता है।

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Sonal Girhepunje is a Former Senior Writer at Newstrack.com.

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