रतन टाटा के निधन के बाद क्यों बढ़ा टाटा परिवार में मतभेद? 1 साल में समूह को हुआ जबरदस्त नुकसान

रतन टाटा के निधन के बाद टाटा परिवार में बढ़ता विवाद सीधे ग्रुप के शेयर और निवेशकों के भरोसे पर असर डाल रहा है। जानिए कैसे लीडरशिप अस्थिरता ने भारत के सबसे भरोसेमंद बिजनेस हाउस को हिला दिया।

Sonal Girhepunje
Published on: 10 Oct 2025 9:35 AM IST (Updated on: 10 Oct 2025 9:41 AM IST)
रतन टाटा के निधन के बाद क्यों बढ़ा टाटा परिवार में मतभेद? 1 साल में समूह को हुआ जबरदस्त नुकसान
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Tata Group Crisis: रतन टाटा के निधन के बाद टाटा परिवार और टाटा ग्रुप दोनों एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। भारत का यह मशहूर कारोबारी समूह, जो अपनी ईमानदारी, भरोसे और देश की तरक्की में योगदान के लिए जाना जाता था, अब आंतरिक विवादों और मतभेदों की वजह से चर्चा में है। रतन टाटा के जाने के बाद नेतृत्व को लेकर परिवार में अलग-अलग मत बन गए हैं। इस मतभेद ने न सिर्फ टाटा ट्रस्ट के अंदर तनाव बढ़ाया है, बल्कि इसका सीधा असर टाटा ग्रुप के कारोबार, निवेशकों के भरोसे और कंपनी के मार्केट कैपिटलाइजेशन पर भी दिखाई दे रहा है। पिछले एक साल में ग्रुप की कई कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है, जिससे निवेशकों में चिंता बढ़ गई है।

रतन टाटा के जाने के बाद क्या हुआ?

रतन टाटा के निधन के कुछ महीने बाद, अक्टूबर 2024 में उनके सौतेले भाई नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का नया चेयरमैन चुना गया। लेकिन उनकी नियुक्ति के बाद ट्रस्ट के अंदर दो गुट बन गए।

एक गुट नोएल टाटा के साथ है, जबकि दूसरा मेहली मिस्त्री के साथ खड़ा है। मेहली मिस्त्री, शापूरजी पल्लोनजी परिवार से हैं और टाटा संस में करीब 18.37% हिस्सेदारी रखते हैं। इसी हिस्सेदारी और बोर्ड सीट को लेकर विवाद गहराता चला गया।

विवाद के मुख्य कारण

रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट में नेतृत्व को लेकर मतभेद शुरू हो गए। नोएल टाटा की नियुक्ति के बाद सवाल उठने लगे कि क्या परिवार के बाहर के लोगों को भी बड़ी भूमिका दी जानी चाहिए। इसके साथ ही, नोएल टाटा ने नई नीति बनाई कि 75 साल से अधिक उम्र वाले ट्रस्टी की हर साल पुनर्नियुक्ति होगी। इस फैसले से कुछ ट्रस्टी नाराज़ हो गए और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जब ये विवाद मीडिया में आया, तो टाटा ग्रुप की साख और स्थिरता दोनों पर असर पड़ा, जिससे निवेशकों का भरोसा भी कमजोर हुआ।

ग्रुप को हुआ बड़ा आर्थिक नुकसान

रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ग्रुप को आर्थिक मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। उनकी अनुपस्थिति और परिवार के अंदर चल रहे विवादों का असर सीधे शेयर बाजार पर पड़ा है। ग्रुप की 23 लिस्टेड कंपनियों का बाज़ार पूंजीकरण 33.57 लाख करोड़ रुपये से घटकर 26.39 लाख करोड़ रुपये रह गया है। यानी, एक साल में लगभग 7.18 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति बाजार से मिट गई। यह भारत के सबसे स्थिर और भरोसेमंद कारोबारी समूहों में से एक के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है।

सबसे अधिक गिरावट तेजस नेटवर्क्स (50%), ट्रेंट (42.35%), टाटा टेक्नोलॉजीज (32.55%), TCS (28.16%), टाटा एलेक्सी (26.42%), और टाटा मोटर्स (26.15%) जैसी कंपनियों में देखने को मिली है। ये सभी कंपनियां टाटा ग्रुप की पहचान मानी जाती हैं।

सरकार की चिंता और दखल

टाटा ग्रुप के अंदर बढ़ते विवाद को देखते हुए, केंद्र सरकार ने भी चिंता जताई है। खबरों के अनुसार, गृह मंत्री अमित शाह के घर पर एक 45 मिनट की अहम मीटिंग हुई, जिसमें ग्रुप में स्थिरता लाने और भरोसा बहाल करने पर ज़ोर दिया गया।

सरकार का मानना है कि टाटा ग्रुप भारत की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, इसलिए इसकी स्थिरता पूरे उद्योग जगत के लिए ज़रूरी है।

क्या बोले जानकार?

रतन टाटा की जीवनी लिखने वाले थॉमस मैथ्यू ने मौजूदा विवाद पर अपनी राय रखते हुए कहा कि टाटा ट्रस्ट का नेतृत्व टाटा परिवार के पास ही रहना चाहिए, ताकि संस्थापकों के मूल्य, सिद्धांत और उद्देश्य हमेशा बनाए रहें। उनका मानना है कि रतन टाटा ने हमेशा ट्रस्ट और ग्रुप को समाज की सेवा और ईमानदारी के रास्ते पर चलाया, इसलिए उसी दिशा में आगे बढ़ना ज़रूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि परिवार या संस्थान में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इन्हें सार्वजनिक मंचों पर नहीं लाना चाहिए। इन विवादों के खुलकर सामने आने से टाटा ग्रुप की साख और निवेशकों के भरोसे दोनों को नुकसान पहुंचा है। मैथ्यू का यह भी कहना है कि अगर ग्रुप के सदस्य आपसी संवाद और समझदारी से मुद्दे सुलझा लें, तो टाटा ग्रुप अपनी पुरानी स्थिरता, सम्मान और विश्वास को फिर से हासिल कर सकता है।

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