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नई पहल! स्टूडेंट सुसाइट रोकने के लिए वेबसाइट लॉन्च, नेशनल टास्क फोर्स की रहेगी पैनी नज़र
Students Suicide Prevention Website: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नेशनल टास्क फोर्स ने उठाया अहम कदम।
Student Suicide Prevention Website
Students Suicide Prevention Website: देश के शैक्षणिक संस्थानों में स्टूडेंट सुसाइट के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जतायी और इसके लिए नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया। इस मामले पर गंभीरता से ध्यान देते हुए नेशनल टास्क फोर्स ने स्टूडेंट सुसाइड रोकने के लिए एक वेबसाइट लॉन्च की है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता जस्टिस एस. रविन्द्र भट्ट (रिटायर) कर रहे हैं। अब टास्क फोर्स ने एक और बड़ा कदम उठाया है और देश में ज्यादा से ज्यादा संस्थानों, छात्रों, अभिभावकों, टीचर्स तक पहुंचने के लिए एक वेबसाइट लॉन्च की है। लॉन्च की गई वेबसाइट ntf.education.gov.in पर अलग-अलग सेक्शन होंगे और ऑनलाइन सर्वे के आधार पर संबंधित पक्षों की राय जानी जाएगी। बीते दिनों टास्क फोर्स की वेबसाइट के लॉन्चिंग के मौके पर जस्टिस रविन्द्र भट्ट, शिक्षा मंत्रालय में उच्च शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. विनीत जोशी, स्कूल शिक्षा सचिव संजय कुमार समेत कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
ऐसे बनी स्टुडेंट सोसाइड रोकथाम वेबसाइट
स्टुडेंट सोसाइड रोकथाम वेबसाइट लॉन्चिंग से पहले टास्क फोर्स के सदस्यों की तरफ से देशभर के शिक्षा संस्थानों का दौरा किया गया था। इसके साथ ही एक्सपर्ट्स और छात्रों की राय जानी गई। तो वहीं कई रिपोर्टों का भी विश्लेषण किया गया। इन सब के आधार पर ये वेबसाइट बनायी गई है।
ऐसे काम करेगी वेबसाइट
बात करें इस वेबसाइट के मकसद की तो स्टूडेंट सुसाइड रोकने के लिए तैयार की गई वेबसाइट का उद्देश्य देश के अधिक से अधिक शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रहे छात्रों, उनके अभिभावकों और शिक्षकों तक अपनी पहुंच सुनिश्चित कराना है। इसको लेकर वेबसाइट में अलग-अलग सेक्शन बनाए गए हैं। इन सेक्शन में स्टूडेंट सुसाइड से जुड़े हुए सवाल तैयार किए गए हैं, जिन्हें ऑनलाइन सर्वे की तरह भरा जाएगा। इस पूरी कवायद का मकसद, स्टूडेंट सुसाइड को लेकर एक विशाल समूह की राय जानना है, जिससे उस पर रोकथाम लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।
क्या है नेशनल टास्क फोर्स?
छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और उच्च शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या को रोकने के मकसद के साथ बनाई गई नेशनल टास्क फोर्स की 29 मार्च को पहली मीटिंग हुई थी, जिसके बाद से टास्क फोर्स ने कई शिक्षा संस्थानों, विशेषज्ञों, छात्रों की राय जानने के साथ साथ कई रिपोर्ट का विश्लेषण भी किया है। इसके साथ ही टास्क फोर्स स्टूडेंट सुसाइड रोकने के लिए कुछ प्रमुख काम कर रही है, जिसमें स्टूडेंट सुसाइड के पीछे शैक्षणिक दबाव, भेदभाव, मानसिक स्वास्थ्य जैसे कारणों की पहचान करना, स्टूडेंट वेलफेयर और मेंटल हेल्थ नियमों का विश्लेषण करना शामिल है।
स्टूडेंट सुसाइड रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जारी की थी 15 गाइडलाइंस
जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने 15 गाइडलाइंस जारी की थी और हर संस्थान को इन गाइडलाइंस को फॉलो करने को कहा था।
मेंटल हेल्थ नीति- सभी शिक्षण संस्थानों को एक एकरूप मानसिक स्वास्थ्य नीति अपनानी और लागू करनी होगी, जो UMMEED ड्राफ्ट गाइडलाइंस, MANODARPAN पहल, और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति से प्रेरित हो। इस नीति की हर वर्ष समीक्षा होनी चाहिए और इसे संस्थान की वेबसाइट और सूचना पटों पर सार्वजनिक किया जाए।
योग्य मेंटल हेल्थ पेशेवरों की नियुक्ति- 100 या अधिक छात्रों वाले हर संस्थान को कम से कम एक प्रशिक्षित काउंसलर / मनोवैज्ञानिक / सामाजिक कार्यकर्ता नियुक्त करना होगा। छोटे संस्थानों को बाहरी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से औपचारिक रेफरल व्यवस्था बनानी होगी।
स्टूडेंट-काउंसलर अनुपात- छोटे बैचों को समर्पित मेंटर्स या काउंसलर नियुक्त किए जाएं, विशेष रूप से परीक्षा या शैक्षणिक संक्रमण के समय, ताकि छात्रों को लगातार, अनौपचारिक और गोपनीय सहयोग मिल सके।
बैच विभाजन और पब्लिक शर्मिंदगी से परहेज- कोचिंग संस्थानों सहित सभी शिक्षण संस्थानों को शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर बैच विभाजन, सार्वजनिक शर्मिंदा करने या छात्रों की क्षमताओं से अधिक लक्ष्य देने से बचना चाहिए।
आपात मानसिक स्वास्थ्य हेल्प- संस्थानों को स्थानीय अस्पतालों और आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइनों से तत्काल रेफरल के लिए लिखित प्रोटोकॉल बनाने होंगे। टेली-MANAS सहित हेल्पलाइन नंबर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में होस्टल, कक्षाओं, और सामान्य क्षेत्रों में प्रदर्शित किए जाएं।
स्टाफ ट्रेनिंग- शिक्षण और गैर-शिक्षण सभी कर्मचारियों को साल में कम से कम दो बार प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा मनोवैज्ञानिक प्राथमिक उपचार, आत्म-हानि की चेतावनी संकेतों की पहचान और रेफरल तंत्र पर प्रशिक्षित किया जाए।
संवेदनशीलता- स्टाफ को अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, LGBTQ+, दिव्यांग छात्रों, देखरेख से बाहर रहने वाले बच्चों, और आत्महत्या के प्रयास से गुज़रे छात्रों के साथ संवेदनशील और भेदभाव रहित व्यवहार के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
सेक्सुअल हरासमेंट, रैगिंग और भेदभाव पर कड़ा रुख- प्रत्येक संस्थान में यौन उत्पीड़न, रैगिंग, जाति, लिंग, यौन रूझान आदि के आधार पर उत्पीड़न की रिपोर्टिंग, निवारण और कार्रवाई के लिए मजबूत, गोपनीय और सुलभ मैकेनिज्म हो। शिकायत करने वालों के खिलाफ प्रतिशोध को शून्य सहिष्णुता के साथ रोका जाए। लापरवाही को संस्थागत दोष मानते हुए कानूनी कार्रवाई हो।
पैरेंट्स की जागरुकता- संस्थान माता-पिता के लिए जागरूकता सत्र आयोजित करें, जिसमें उन्हें अत्यधिक दबाव न डालने, मानसिक तनाव के लक्षण पहचानने और सहानुभूतिपूर्वक प्रतिक्रिया देने के लिए संवेदनशील बनाया जाए। छात्रों के लिए जीवन कौशल, भावनात्मक नियंत्रण और सहायता सेवाओं की जानकारी को पाठ्येतर गतिविधियों में शामिल किया जाए।
वार्षिक रिपोर्ट- संस्थान हर वर्ष गोपनीय रिकॉर्ड रखें और मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप, रेफरल, ट्रेनिंग सत्रों का विवरण वार्षिक रिपोर्ट के रूप में संबंधित नियामक निकाय को भेजें जैसे राज्य शिक्षा विभाग, UGC, AICTE, CBSE आदि।
अन्य गतिविधियों को बढ़ावा- खेल, कला और व्यक्तित्व विकास को प्राथमिकता दी जाए। परीक्षा प्रणाली की समीक्षा करके शैक्षणिक दबाव को कम किया जाए, ताकि छात्र केवल अंकों और रैंकों से परे भी अपनी पहचान विकसित कर सकें।
करियर काउंसलिंग- सभी संस्थानों को छात्रों और अभिभावकों के लिए नियमित, संरचित कैरियर काउंसलिंग प्रदान करनी होगी, जो योग्य सलाहकारों द्वारा संचालित हो। यह परामर्श अवास्तविक दबाव को कम करने, विविध शैक्षणिक/पेशेवर विकल्पों की जानकारी और रुचि आधारित निर्णय लेने में मदद करेगा।
सेफ हॉस्टल- छात्रावास प्रबंधक, वार्डन और देखरेखकर्ता यह सुनिश्चित करें कि परिसर नशे, उत्पीड़न और हिंसा से मुक्त हो। सभी छात्रों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ जीवन व अध्ययन का माहौल सुनिश्चित किया जाए।
आत्महत्या रोकने वाले प्रयास- छात्रावासों में पहुंच से दूर सीलिंग फैन या अन्य सुरक्षा उपकरण लगाए जाएं। छतों, बालकनियों और ऊंचे क्षेत्रों तक पहुंच को सीमित किया जाए ताकि आकस्मिक आत्महत्या प्रयासों को रोका जा सके।
कोचिंग हब में स्पेशल मॉनिटरिंग- कोटा, जयपुर, सिकर, चेन्नई, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई जैसे कोचिंग हब्स में विशेष मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय लागू किए जाएं। इन क्षेत्रों में अत्यधिक आत्महत्या दर को देखते हुए अकादमिक दबाव का नियमन, करियर काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और जवाबदेही ढांचा सुनिश्चित किया जाए।


