डिजिटल क्रांति से जान बचाने तक, दवाओं की खोज में गेम-चेंजर बनता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

AI अब दवाओं की खोज में बड़ा बदलाव ला रहा है। जानिए कैसे Artificial Intelligence, AlphaFold और Generative AI फार्मा इंडस्ट्री और Drug Discovery का भविष्य बदल रहे हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 31 July 2026 6:46 PM IST
AI Drug Discovery Explainer
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AI Drug Discovery Explainer

AI Drug Discovery Explainer: एक नई दवा का डेवलपमेंट हमेशा से विज्ञान की सबसे जटिल और महंगी प्रक्रियाओं में गिना जाता रहा है। किसी भी नई दवा को प्रयोगशाला से मरीज तक पहुंचाने में औसतन 10 से 15 वर्ष का समय लगता है और इस पूरी प्रक्रिया पर 2 से 2.5 अरब डॉलर से अधिक का खर्च आता है। शुरुआती अनुसंधान से लेकर क्लिनिकल ट्रायल और नियामकीय मंजूरी तक हजारों रासायनिक कंपाउंड्स की जांच की जाती है, लेकिन इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक अंतिम चरण तक पहुंचने से पहले ही असफल हो जाते हैं।

अब यही तस्वीर तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और खास तौर पर जेनेरेटिव एआई ने फार्मा रिसर्च के पारंपरिक मॉडल को चुनौती दी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि एआई सिर्फ अनुसंधान की रफ़्तार ही नहीं बढ़ा रहा बल्कि यह ऐसी नई दवाओं के विकास का रास्ता भी खोल रहा है जिन्हें पहले खोज पाना लगभग असंभव माना जाता था। कैंसर, अल्जाइमर, दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों और संक्रमण जैसी जटिल बीमारियों के इलाज में एआई भविष्य का सबसे बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

कैसे काम करता है दवा अनुसंधान में एआई?

किसी भी दवा की खोज का पहला चरण होता है बीमारी के वास्तविक जैविक कारण की पहचान करना। इसे 'टार्गेट आइडेंटिफिकेशन' कहा जाता है। इसके बाद वैज्ञानिक ऐसे रासायनिक अणुओं की तलाश करते हैं जो उस लक्ष्य पर प्रभावी ढंग से काम कर सकें। यहीं पर एआई सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है। आधुनिक एआई मॉडल अरबों आर्गेनिक डेटा, डीएनए सीक्वेंसिंग, प्रोटीन संरचनाओं और चिकित्सा शोध पत्रों का विश्लेषण कुछ घंटों में कर सकते हैं। जिस विश्लेषण में पहले वैज्ञानिकों की टीमों को कई वर्ष लग जाते थे, वही काम अब अत्याधुनिक एल्गोरिद्म बेहद कम समय में कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एआई बीमारी पैदा करने वाले जीन, प्रोटीन और कोशिकीय प्रक्रियाओं के बीच ऐसे संबंध भी खोज लेता है जिन्हें पारंपरिक अनुसंधान पद्धतियां अक्सर नहीं पहचान पाती थीं।

अल्फा फोल्ड ने बदल दिया प्रोटीन रिसर्च का मंजर

दवा अनुसंधान में सबसे बड़ी क्रांति प्रोटीन संरचनाओं की सटीक भविष्यवाणी के क्षेत्र में आई है। गूगल डीपमाइंड द्वारा डेवलप ‘अल्फा फोल्ड’ (AlphaFold) ने लाखों प्रोटीनों की थ्री-डी संरचना का अत्यंत सटीक अनुमान लगाकर जैव विज्ञान के सबसे कठिन प्रश्नों में से एक का समाधान प्रस्तुत किया है। पहले किसी प्रोटीन की संरचना समझने में वैज्ञानिकों को महीनों या वर्षों तक लैब में काम करना पड़ता था। अब एआई कुछ ही मिनटों में उसकी संभावित संरचना तैयार कर देता है। इससे वैज्ञानिकों के लिए यह समझना आसान हो गया है कि किसी बीमारी में कौन-सा प्रोटीन जिम्मेदार है और उस पर प्रभाव डालने वाली दवा कैसी होनी चाहिए।

एआई खुद डिजाइन कर रहा है नई दवाएं

जेनेरेटिव एआई की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल उपलब्ध डेटा का विश्लेषण ही नहीं करता, बल्कि पूरी तरह नए रासायनिक अणुओं की भी रचना कर सकता है। इसे De Novo Molecule Design कहा जाता है। एआई लाखों संभावित अणुओं के डिजिटल मॉडल तैयार करता है और यह भी अनुमान लगाता है कि कौन-सा अणु शरीर में सबसे प्रभावी होगा, कौन-सा कम विषैला होगा और किसके दुष्प्रभाव कम होने की संभावना है। इसके बाद वैज्ञानिक केवल सबसे संभावित अणुओं को प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए चुनते हैं। इस प्रक्रिया से शुरुआती अनुसंधान का समय वर्षों से घटकर कुछ सप्ताह या महीनों तक सिमट सकता है और अनुसंधान की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आने की संभावना है।

एआई केवल दवा खोजने तक सीमित नहीं है। अब इसका उपयोग क्लिनिकल ट्रायल को अधिक सटीक और प्रभावी बनाने में भी किया जा रहा है। मशीन लर्निंग मॉडल यह पहचानने में मदद करते हैं कि किसी विशेष दवा का सबसे अधिक लाभ किन मरीजों को मिलेगा। इससे परीक्षणों के लिए सही प्रतिभागियों का चयन आसान होता है और ट्रायल की सफलता की संभावना बढ़ती है। इसके अलावा एआई इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स, मेडिकल इमेजिंग और रियल-टाइम स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण करके दवा के संभावित दुष्प्रभावों की शुरुआती पहचान भी कर सकता है। इससे मरीजों की सुरक्षा बेहतर होती है और नियामकीय प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय बनती है।

तेजी से बढ़ रहा एआई-ड्रग डिस्कवरी बाजार

वैश्विक स्तर पर एआई आधारित दवा अनुसंधान अब फार्मास्युटिकल उद्योग की सबसे तेजी से बढ़ती शाखाओं में शामिल हो चुका है। उद्योग विश्लेषकों के अनुसार यह बाजार पहले ही अरबों डॉलर का आकार प्राप्त कर चुका है और आने वाले वर्षों में इसमें दोहरे अंकों की वार्षिक वृद्धि की संभावना है।

दुनिया की अग्रणी दवा कंपनियां, नोवार्टिस, एस्ट्राजेनेका, एली लिली, फाइजर और रोश, एआई आधारित बायोटेक स्टार्टअप्स के साथ अरबों डॉलर के रणनीतिक समझौते कर चुकी हैं। इन साझेदारियों का उद्देश्य नई दवाओं की खोज को तेज करना और अनुसंधान की लागत कम करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब एआई द्वारा डिजाइन किए गए कई संभावित औषधीय अणु प्रयोगशाला परीक्षणों को पार कर मानव क्लिनिकल ट्रायल के विभिन्न चरणों तक पहुंच चुके हैं। यह इस तकनीक की व्यावहारिक सफलता का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक देश है और वैश्विक वैक्सीन आपूर्ति में भी उसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। लेकिन नई दवाओं की खोज के क्षेत्र में भारत अभी भी अमेरिका, यूरोप और चीन से पीछे है। एआई इस अंतर को कम करने का अवसर प्रदान कर सकता है। देश में तेजी से विकसित हो रहा डिजिटल स्वास्थ्य ढांचा, बायोटेक स्टार्टअप्स, विशाल जीनोमिक डेटा और मजबूत आईटी क्षमता भारत को एआई आधारित दवा अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बना सकती है। यदि भारतीय फार्मा कंपनियां एआई, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और बायोइन्फॉर्मेटिक्स में बड़े निवेश करती हैं, तो देश केवल जेनेरिक दवाओं का निर्माता नहीं, बल्कि नई दवाओं के अनुसंधान और नवाचार का वैश्विक केंद्र भी बन सकता है।

हालांकि एआई की संभावनाएं बेहद व्यापक हैं, लेकिन इसके साथ कई गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। दवा अनुसंधान में इस्तेमाल होने वाले एआई मॉडल पूरी तरह डेटा की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं। यदि प्रशिक्षण डेटा पक्षपातपूर्ण या अधूरा होगा तो परिणाम भी गलत हो सकते हैं। इसके अलावा मरीजों के स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशील डेटा की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता है।

एक अन्य चुनौती पारदर्शिता की है। कई एआई मॉडल यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि उन्होंने किसी विशेष अणु या उपचार का सुझाव क्यों दिया। चिकित्सा विज्ञान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नियामक संस्थाएं ऐसे "ब्लैक बॉक्स" निर्णयों को आसानी से स्वीकार नहीं कर सकतीं। इसी कारण अमेरिका का एफडीए, यूरोपीय संघ और अन्य नियामक एजेंसियां एआई आधारित दवा अनुसंधान के लिए नए दिशानिर्देश तैयार कर रही हैं ताकि नवाचार और मरीजों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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