क्या AI ऐसी दवा या प्रोटीन बना सकता है जो प्रकृति में कभी बना ही नहीं?

AI Protein Design: क्या AI ऐसे नए प्रोटीन डिजाइन कर सकता है जिनका प्राकृतिक दुनिया में कोई ज्ञात उदाहरण नहीं है?

Neel Mani Lal
Published on: 25 Sept 2026 3:56 PM IST
AI Protein Design Explained in Hindi
X

AI Protein Design Explained in Hindi 

AI Protein Design Explained: कल्पना कीजिए कि किसी वैज्ञानिक ने कंप्यूटर से कहा - मुझे ऐसा प्रोटीन चाहिए जो शरीर में मौजूद किसी खास बीमारी पैदा करने वाले अणु (molecule) से चिपक सके, उसे रोक सके और ऐसा आकार रखे जैसा प्रकृति में अब तक किसी प्रोटीन का नहीं रहा। कंप्यूटर कुछ ही समय में हजारों संभावित डिजाइन सामने रख दे। फिर प्रयोगशाला में उनमें से कुछ बनाए जाएं और जांच में पता चले कि उनमें से एक वास्तव में वही काम कर रहा है जिसके लिए उसे डिजाइन किया गया था।

कुछ साल पहले यह किसी विज्ञान-कथा जैसा लगता। अब ऐसा होना शुरू हो चुका है। वैज्ञानिक एआई की मदद से ऐसे प्रोटीन डिजाइन कर रहे हैं जिनके प्राकृतिक दुनिया में पहले से मौजूद होने का कोई ज्ञात उदाहरण नहीं है। 2023 में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में रिडीफ्यूजन (RFdiffusion) नाम के एआई आधारित तरीके से बिल्कुल नए प्रोटीन ढांचे और किसी खास टारगेट से जुड़ने वाले प्रोटीन डिजाइन किए गए थे। इसके बाद 2025 और 2026 में इस क्षेत्र में और तेजी आई। एक अध्ययन में एआई की मदद से ऐसे नए एंटीबॉडी डिजाइन किए गए जो चुने हुए जैविक लक्ष्य से जुड़ सकें। 2026 में एक अन्य अध्ययन ने छोटे दवा-अणुओं से जुड़ने वाले नए प्रोटीन बनाने की दिशा में भी कदम आगे बढ़ाया। लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। एआई अभी सीधे-सीधे गोली की शीशी बनाकर नहीं देता। वह सबसे पहले उस जैविक मशीन का डिजाइन सुझाता है जो आगे चलकर दवा का हिस्सा बन सकती है।

प्रोटीन आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

हमारे शरीर को समझने के लिए प्रोटीन को एक तरह की छोटी बायोलॉजिकल मशीन मान सकते हैं। शरीर में मौजूद हजारों तरह के प्रोटीन अलग-अलग काम करते हैं। कोई सेल्स के बीच संदेश पहुंचाता है, कोई रासायनिक प्रतिक्रिया कराता है, कोई शरीर की रक्षा करता है और कोई सेल्स के बाहर से आने वाले संकेतों को पहचानता है। प्रोटीन अमीनो एसिड की लंबी सीरीज से बनते हैं। इन अमीनो एसिड्स का क्रम तय करता है कि श्रृंखला किस तरह मुड़ेगी और उसका थ्री डी आकार कैसा बनेगा। यही आकार काफी हद तक तय करता है कि प्रोटीन क्या काम करेगा।

इसे ऐसे समझिए जैसे आपके पास एक लंबी रस्सी हो। रस्सी में गांठें और मोड़ किस जगह होंगे, इससे उसका पूरा आकार बदल सकता है। प्रोटीन में भी अमीनो अम्लों का क्रम बदलने पर उसका मुड़ना बदल सकता है और उसके साथ उसका काम भी बदल सकता है। यही वह जगह है जहां विज्ञान की पुरानी समस्या बहुत कठिन हो जाती थी। वैज्ञानिक जानते थे कि अमीनो अम्लों का क्रम दिया जाए तो प्रोटीन का आकार बनना चाहिए, लेकिन उस आकार का सही अनुमान लगाना बेहद मुश्किल था। फिर आया एआई जिसने काम आसान कर दिया।

अल्फा फोल्ड ने सबसे पहले कौन सा दरवाजा खोला?

2024 का केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार इस कहानी को समझने का अच्छा रास्ता देता है। डेमिस हसाबिस और जॉन जम्पर ने अल्फा फोल्ड 2 (AlphaFold2) विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसने अमीनो अम्लों के क्रम से प्रोटीन की थ्रीडी संरचना का अनुमान लगाने की समस्या में बड़ी छलांग लगाई। नोबेल समिति के अनुसार, अल्फा फोल्ड 2 ने ज्ञात प्रोटीनों की विशाल संख्या की संरचना का अनुमान लगाने की क्षमता को काफी आगे बढ़ाया। यह बदलाव इसलिए बड़ा था क्योंकि अब वैज्ञानिकों के पास सिर्फ यह जानकारी नहीं थी कि किसी प्रोटीन में कौन-कौन से अमीनो अम्ल हैं, बल्कि कंप्यूटर यह अनुमान लगाने में भी मदद कर सकता था कि वे एक-दूसरे के साथ किस तरह मुड़कर संरचना बनाएंगे। अब सवाल ये था कि अगर एआई किसी प्रोटीन की संरचना समझ सकता है, तो क्या वह ऐसी नई संरचना बना भी सकता है जो प्रकृति में पहले मौजूद नहीं थी? यहीं से कहानी केवल प्रोटीन को समझने से आगे बढ़कर प्रोटीन बनाने की हो जाती है।

प्रकृति ने अरबों साल में जो किया, वैज्ञानिक अब डिजाइन से करना चाहते हैं

प्रकृति नए प्रोटीन किसी इंजीनियरिंग ड्राइंग की तरह बैठकर नहीं बनाती। अरबों वर्षों के विकास के दौरान जीन में बदलाव होते रहे, प्रोटीन बदलते रहे और जो बदलाव किसी जीव के लिए उपयोगी रहे, वे आगे बढ़ते गए। इस प्रक्रिया ने आज हमारे आसपास प्रोटीनों की अविश्वसनीय विविधता पैदा कर दी है। वैज्ञानिक अब इस प्राकृतिक प्रक्रिया की नकल करने के बजाय कई बार उसका रास्ता ही बदलना चाहते हैं। अगर हमें पता है कि किसी बीमारी से जुड़े अणु को रोकने के लिए किस आकार की सतह चाहिए, तो हम उस आकार का प्रोटीन सीधे डिजाइन करने की कोशिश कर सकते हैं।

इसे घर बनाने के उदाहरण से समझिए। प्रकृति ने करोड़ों घर अलग-अलग परिस्थितियों में धीरे-धीरे बनाए और बदले। वैज्ञानिक अब कह रहे हैं कि अगर हमें पता है कि हमें किस आकार का कमरा चाहिए, तो क्यों न कंप्यूटर से उसका नक्शा तैयार कराया जाए और फिर देखा जाए कि उसे वास्तव में बनाया जा सकता है या नहीं।

इसी को डी नोवो प्रोटीन डिजाइन कहा जाता है। इसका मतलब है, किसी पहले से मौजूद प्रोटीन को थोड़ा बदलना भर नहीं, बल्कि नए प्रोटीन का डिजाइन तैयार करना। डेविड बेकर के समूह ने इस दिशा में वर्षों पहले महत्वपूर्ण काम किया था। उनके कंप्यूटेशनल तरीकों ने ऐसे प्रोटीन बनाने का रास्ता दिखाया जिनका प्राकृतिक प्रोटीनों में सीधा उदाहरण नहीं था। नोबेल समिति ने इसे ऐसे प्रोटीन बनाने की क्षमता के रूप में वर्णित किया है जो पहले मौजूद नहीं थे और जिनके नए काम भी हो सकते थे।

एआई यहां असल में करता क्या है?

मान लीजिए वैज्ञानिक चाहते हैं कि एक प्रोटीन शरीर में मौजूद किसी खास अणु से चिपके। प्रोटीन की सतह पर कुछ जगहें ऐसी होनी चाहिए जिनका आकार और रासायनिक गुण उस लक्ष्य से मेल खाएं। एआई ऐसे बहुत सारे संभावित ढांचे खोज सकता है और उन डिजाइन को छांट सकता है जो दिए गए लक्ष्य के हिसाब से ज्यादा उपयोगी दिखाई देते हैं। RFdiffusion जैसे तरीके इसी दिशा में काम करते हैं। यह ऐसे प्रोटीन ढांचे बनाने में मदद कर सकता है जो किसी चुने हुए बायोलॉजिकल टारगेट के आसपास वांछित आकार ले सकें। 2023 के अध्ययन में इसके जरिए नए प्रोटीन डिजाइन और लक्ष्य से जुड़ने वाले प्रोटीन बनाने की क्षमता दिखाई गई थी। एक अध्ययन में इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल करके नए एंटीबॉडी डिजाइन करने की दिशा में महत्वपूर्ण परिणाम दिखाए गए। शोधकर्ताओं ने ऐसे एंटीबॉडी डिजाइन किए जो चुने हुए जैविक लक्ष्य के खास हिस्सों से जुड़ने के लिए बनाए गए थे। यहां कंप्यूटर डिजाइन के बाद वास्तविक प्रयोगशाला जांच भी हुई, यानी यह सिर्फ स्क्रीन पर बने सुंदर मॉडल की कहानी नहीं थी।

एआई ऐसी चीज बना सकता है जो प्रकृति में कभी थी ही नहीं?

वैज्ञानिक आम तौर पर यह साबित नहीं कर सकते कि पूरे ब्रह्मांड में किसी समय या किसी जीव में वैसा प्रोटीन कभी नहीं रहा। वे इतना कह सकते हैं कि वह डिजाइन ज्ञात प्राकृतिक प्रोटीनों में नहीं पाया गया या उसका कोई ज्ञात प्राकृतिक उदाहरण नहीं है। 2026 में प्रकाशित रेगन (Raygun) नाम के एक एआई ढांचे ने प्राकृतिक प्रोटीनों में बड़े बदलाव करने की क्षमता दिखाई। शोधकर्ताओं ने प्रोटीनों को छोटा करने, बड़ा करने और उनके क्रम में बड़े बदलाव करने की कोशिश की, जबकि उनके अनुमानित ढांचे और महत्वपूर्ण हिस्सों को बनाए रखने का लक्ष्य रखा गया। अध्ययन में कुछ प्रोटीनों को 10 से 25 प्रतिशत तक छोटा करने और कुछ मामलों में उससे भी ज्यादा बदलाव करने की क्षमता दिखाई गई। दूसरी तरफ RFdiffusion2 जैसे तरीकों का इस्तेमाल ऐसे एंजाइम बनाने के लिए किया जा रहा है जिनकी संरचना किसी खास रासायनिक प्रतिक्रिया के लिए बनाई जाए। 2026 के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अलग-अलग रासायनिक काम करने वाले नए एंजाइम ढांचे डिजाइन किए और फिर प्रयोगशाला में उनकी जांच की। यानी अब कंप्यूटर सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि “प्रकृति ने क्या बनाया है?” बल्कि धीरे-धीरे यह सवाल भी पूछ रहा है कि “हम क्या बनाना चाहते हैं?”

नई प्रोटीन और नई दवा एक ही बात नहीं है

मान लीजिए एआई ने एक ऐसा प्रोटीन डिजाइन कर दिया जो प्रयोगशाला में किसी बीमारी से जुड़े अणु से मजबूती से चिपकता है। इसका मतलब यह नहीं कि वह इंसान के लिए दवा बन गया। दवा बनने के लिए बहुत कुछ देखना पड़ता है। क्या वह शरीर में सही जगह पहुंच पाएगा? क्या वह बहुत जल्दी टूट जाएगा? क्या शरीर उसे तुरंत बाहर निकाल देगा? क्या वह गलत प्रोटीन से भी चिपकेगा? क्या उससे विषाक्त असर होगा? क्या प्रतिरक्षा तंत्र उसे खतरनाक समझेगा? क्या उसका असर पर्याप्त होगा? क्या उसे बड़े पैमाने पर सुरक्षित तरीके से बनाया जा सकेगा? इन सवालों के जवाब कंप्यूटर के अनुमान से अकेले नहीं मिलते। यही वजह है कि एआई से निकला कोई डिजाइन पहले प्रयोगशाला में बनाया जाता है, फिर उसकी संरचना और काम की जांच होती है। उसके बाद कोशिकाओं और अन्य जैविक प्रणालियों में परीक्षण होते हैं और संभावित दवा के मामले में आगे चलकर पशु अध्ययन और मानव परीक्षण जैसी कई सीढ़ियां आती हैं।

छोटी दवा बनाने के बजाय प्रोटीन क्यों?

इसलिए क्योंकि प्रोटीन को एक तरह का बेहद सटीक जैविक औजार बनाया जा सकता है। मान लीजिए शरीर में किसी बीमारी के दौरान कोई खास अणु बहुत ज्यादा सक्रिय हो रहा है। एक नई डिजाइन की गई प्रोटीन दवा उस अणु को पहचानकर उससे जुड़ सकती है। इसी तरह किसी खास कोशिका को पहचानने वाला प्रोटीन बनाया जा सकता है। एंटीबॉडी इसका अच्छा उदाहरण हैं। हमारे शरीर में प्राकृतिक एंटीबॉडी ऐसे अणुओं को पहचानते हैं जिन्हें प्रतिरक्षा तंत्र बाहरी या खतरनाक मानता है। वैज्ञानिक इसी सिद्धांत का इस्तेमाल चिकित्सा में करते रहे हैं। अब एआई इस काम में एक नया रास्ता खोल रहा है, जहां किसी प्राकृतिक एंटीबॉडी को ढूंढने का इंतजार करने के बजाय कंप्यूटर से वांछित संरचना डिजाइन करने की कोशिश की जा सकती है। 2025 के RFdiffusion अध्ययन में नए एंटीबॉडी डिजाइन की इसी संभावना को प्रयोगात्मक रूप से दिखाया गया। 2026 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने छोटे दवा-अणुओं से जुड़ने वाले प्रोटीन डिजाइन करने की दिशा में भी काम दिखाया। यह खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी छोटे अणु के लिए ऐसा प्रोटीन बनाना जो उसे सही जगह पर पहचान सके, बेहद कठिन डिजाइन समस्या है।

क्या एआई ऐसी दवा बना सकता है जो प्रकृति ने कभी नहीं बनाई?

सैद्धांतिक रूप से संभावना बहुत बड़ी है। लेकिन यहां भी “दवा” और “प्रोटीन” को अलग रखना जरूरी है। अगर दवा से हमारा मतलब किसी नए प्रोटीन आधारित उपचार से है, तो एआई ऐसे प्रोटीनों की डिजाइन में तेजी से आगे बढ़ रहा है जिनका प्राकृतिक उदाहरण ज्ञात नहीं है। लेकिन अगर सवाल यह है कि क्या एआई अकेले बैठकर एक पूरी तरह नई, सुरक्षित और इंसानों में इस्तेमाल होने वाली दवा बना सकता है, तो जवाब अभी नहीं है। आज की तकनीक में एआई मुख्य रूप से खोज का सबसे मुश्किल शुरुआती हिस्सा तेज कर रहा है। वह संभावित डिजाइन की विशाल संख्या में से कुछ ऐसे विकल्प निकाल सकता है जिन्हें वैज्ञानिक प्रयोगशाला में परखें। यह अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव है। पहले वैज्ञानिकों को प्रकृति में मौजूद प्रोटीनों और उनकी विविधता से शुरुआत करनी पड़ती थी। अब वे कुछ मामलों में लक्ष्य और काम को पहले तय करके उसके लिए नया प्रोटीन डिजाइन करने की दिशा में जा सकते हैं।

असली समस्या अब डिजाइन नहीं, भरोसे की है

कुछ साल पहले समस्या थी कि वैज्ञानिक नया प्रोटीन बना ही नहीं सकते थे। अब कई मामलों में कंप्यूटर इतने डिजाइन बना सकता है कि समस्या उलट जाती है: इनमें से कौन सा वास्तव में काम करेगा? कंप्यूटर पर सही दिखने वाला प्रोटीन प्रयोगशाला में असफल हो सकता है। उसका आकार अनुमान से अलग बन सकता है। वह पानी में स्थिर न रहे। शरीर में पहुंचते ही टूट जाए। किसी दूसरे अणु से चिपक जाए या कोशिकाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो।

नया शोध भी यही दिखाता है कि प्रोटीन डिजाइन की दुनिया तेजी से आगे बढ़ने के बावजूद कई मुश्किलें बाकी हैं। उदाहरण के लिए, कुछ कृत्रिम प्रोटीनों को जीवित कोशिकाओं में डालने पर अनचाहे असर और विषाक्तता हो सकती है। यानी सही अमीनो अम्ल क्रम ढूंढ लेना पूरी कहानी नहीं है। इसलिए भविष्य का बड़ा काम सिर्फ बेहतर एआई बनाना नहीं होगा। कंप्यूटर के बनाए डिजाइन को जल्दी, सस्ते और भरोसेमंद तरीके से प्रयोगशाला में परखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

और यहीं से चिकित्सा का एक नया दौर शुरू हो सकता है, कल्पना कीजिए कि किसी बीमारी के लिए वैज्ञानिकों को ऐसा प्रोटीन चाहिए जो शरीर के किसी खास अणु को पहचान सके, लेकिन प्रकृति में वैसा प्रोटीन मौजूद ही नहीं है। पुराने तरीके में वैज्ञानिक प्राकृतिक प्रोटीनों में खोज करते, उनमें बदलाव करते और लंबे परीक्षणों से गुजरते। एआई आधारित डिजाइन का रास्ता यह कहता है कि पहले कंप्यूटर से हजारों या लाखों संभावित डिजाइन बनवाइए, फिर सबसे बेहतर विकल्पों को प्रयोगशाला में परखिए। इसका मतलब यह नहीं कि वैज्ञानिक प्रकृति को हरा चुके हैं। बल्कि वे प्रकृति की भाषा को समझकर उसमें नए वाक्य लिखने की कोशिश कर रहे हैं।

2024 के नोबेल पुरस्कार से लेकर बाद नए अध्ययनों तक एक बात साफ दिखाई देती है: प्रोटीन विज्ञान अब केवल यह समझने की कोशिश नहीं कर रहा कि जीवन ने क्या बनाया है, बल्कि यह भी सीख रहा है कि जीवन की इन्हीं जैविक ईंटों से कुछ नया कैसे बनाया जाए। शायद आने वाले समय में किसी बीमारी के इलाज की खोज का सवाल यह नहीं होगा कि प्रकृति ने उसके लिए कौन सा प्रोटीन बनाया है। सवाल यह हो सकता है कि उस बीमारी को रोकने के लिए हमें किस तरह का प्रोटीन चाहिए, और क्या एआई हमें उसका डिजाइन दे सकता है? यही इस तकनीक की सबसे बड़ी दिलचस्पी है। एआई शायद अभी डॉक्टर नहीं बना है, न ही वह अकेले दवा की मंजूरी दिला सकता है। लेकिन वह वैज्ञानिकों को जीवन की उन छोटी मशीनों को नए सिरे से डिजाइन करने का औजार जरूर दे रहा है, जिन्हें प्रकृति ने अरबों वर्षों में विकसित किया है।

Neel Mani Lal
ABOUT THE AUTHOR

Neel Mani Lal

neelmanilal@gmail.com
Next Story