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Allergy Se Nuksan: एलर्जी में शरीर आखिर किससे लड़ रहा होता है? एंटी-एलर्जी खाने पर क्या होता है?
Allergy Se Hone Wale Nuksan: धूल, पराग, पालतू जानवर या किसी खाने से एलर्जी होने पर शरीर असल में किससे लड़ रहा होता है? जानिए IgE एंटीबॉडी, मास्ट सेल और हिस्टामीन की भूमिका और समझिए कि एंटी-एलर्जी यानी एंटीहिस्टामीन दवा शरीर में जाकर कैसे काम करती है।
Allergy Se Hone Wale Nuksan Allergy Immune System Explained in Hindi
Allergy Se Hone Wale Nuksan: धूल उड़ते ही लगातार छींकें आना, किसी खास खाने से होंठ सूज जाना, या बिल्ली के करीब जाते ही आंखों में खुजली शुरू हो जाना, ये सब एलर्जी के जाने-पहचाने अनुभव हैं। लेकिन दिलचस्प सवाल यह है कि आखिर शरीर के भीतर उस वक्त हो क्या रहा होता है, शरीर किससे लड़ रहा होता है, जबकि धूल या पराग जैसी चीजें असल में कोई खतरा हैं ही नहीं। और जब हम एंटी-एलर्जी दवा खाते हैं, तो वह असल में शरीर के भीतर क्या करती है? इसे इम्यूनोलॉजी यानी प्रतिरक्षा विज्ञान की नजर से समझते हैं।
एलर्जी असल में है क्या
एलर्जी को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह कोई बाहरी हमला नहीं, बल्कि यह शरीर के अपने ही इम्यून सिस्टम की एक गलती है। हमारा इम्यून सिस्टम असल में हमें बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी जैसे सच में खतरनाक जीवों से बचाने के लिए बना है। एलर्जी में होता यह है कि इम्यून सिस्टम किसी बिल्कुल हानिरहित चीज, जैसे पराग कण, धूल के कण, पालतू जानवर की रूसी, या किसी खास खाने की चीज, को गलती से एक खतरनाक घुसपैठिया समझ बैठता है।
एक बार यह गलत पहचान हो जाए, तो शरीर उसी तरह की रक्षात्मक प्रक्रिया शुरू कर देता है, जैसी वह किसी सच्चे संक्रमण के खिलाफ करता। यानी एलर्जी में शरीर किसी बाहरी दुश्मन से नहीं, बल्कि अपनी ही एक गलतफहमी से लड़ रहा होता है, और इसी गलतफहमी की कीमत हमें छींक, खुजली और सूजन के तौर पर चुकानी पड़ती है।
यही पदार्थ, जो एक व्यक्ति में गंभीर एलर्जी पैदा करते हैं, दूसरे व्यक्ति के शरीर में बिना किसी दिक्कत के गुजर जाते हैं। यह दिखाता है कि एलर्जी असल में उस पदार्थ की खुद की कोई खासियत नहीं, बल्कि यह हर व्यक्ति के इम्यून सिस्टम की अपनी, व्यक्तिगत प्रोग्रामिंग का नतीजा है।
असली किरदार, IgE एंटीबॉडी और मास्ट सेल
जब कोई व्यक्ति पहली बार किसी एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थ (एलर्जन) के संपर्क में आता है, तो उसका इम्यून सिस्टम, खासकर "B सेल" नाम की कोशिकाएं, उस पदार्थ के खिलाफ "IgE" नाम का एक खास एंटीबॉडी बनाना शुरू कर देती हैं। यह एंटीबॉडी शरीर में मौजूद "मास्ट सेल" और "बेसोफिल" नाम की कोशिकाओं की सतह पर जाकर चिपक जाता है, मास्ट सेल शरीर के जोड़ने वाले ऊतकों में, खासकर त्वचा, फेफड़े, आंत और नाक के आसपास बड़ी संख्या में मौजूद होती हैं, जबकि बेसोफिल खून में घूमते रहते हैं।
अब यह कोशिकाएं एक तरह से अलर्ट मोड पर आ जाती हैं, जैसे किसी खास दुश्मन की तस्वीर लेकर बैठे पहरेदार। जब अगली बार वही एलर्जन दोबारा शरीर में प्रवेश करता है, तो वह इन्हीं मास्ट सेल और बेसोफिल की सतह पर मौजूद IgE एंटीबॉडी से जुड़ जाता है, और यही जुड़ाव इन कोशिकाओं को तुरंत सक्रिय कर देता है, जिससे वे अपने अंदर जमा किए हुए शक्तिशाली रासायनिक हथियार बाहर छोड़ना शुरू कर देती हैं।
यही वजह है कि किसी नई चीज से एलर्जी होने में अक्सर थोड़ा समय लगता है, यानी पहली बार किसी चीज के संपर्क में आने पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, क्योंकि उस वक्त शरीर सिर्फ IgE एंटीबॉडी बनाने और कोशिकाओं को तैयार करने का काम कर रहा होता है। असली, दिखने वाली एलर्जी प्रतिक्रिया अक्सर दूसरी या उसके बाद की मुलाकात में सामने आती है, जब शरीर पहले से ही उस पदार्थ को पहचानने के लिए तैयार बैठा होता है।
हिस्टामीन, असली अलार्म बजाने वाला केमिकल
जब मास्ट सेल और बेसोफिल सक्रिय होते हैं, तो वे जो सबसे मशहूर केमिकल छोड़ते हैं, वह है 'हिस्टामीन'। इसे समझने का एक आसान तरीका है, हिस्टामीन को शरीर के अंदर एक तरह के बाउंसर की तरह सोचें, जिसका काम है किसी परेशान करने वाली चीज को जितनी जल्दी हो सके शरीर से बाहर निकालना, चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े, छींक लाना, आंसू बहाना, या खुजली पैदा करना।
हिस्टामीन शरीर में जिस जगह भी छूटता है, वहां रक्त वाहिकाओं में खून का बहाव बढ़ा देता है, जिससे सूजन आती है, ताकि इम्यून सिस्टम के बाकी हिस्से वहां पहुंचकर मरम्मत का काम कर सकें। इसके बाद हिस्टामीन शरीर में मौजूद खास रिसेप्टर (ग्रहण करने वाले स्थान) से जुड़ता है, और यहीं से अलग-अलग लक्षण सामने आते हैं। अगर यह नाक के आसपास हो, तो झिल्लियां ज्यादा बलगम बनाने लगती हैं, जिससे नाक बहने लगती है और छींक आने लगती है। अगर यह आंखों और नाक के आसपास हो, तो खुजली महसूस होती है। और अगर यह पाचन तंत्र में हो, जैसे किसी खाने से एलर्जी में, तो यह पेट दर्द और दस्त जैसी दिक्कतें पैदा कर सकता है।
हिस्टामीन सिर्फ एलर्जी में ही शामिल नहीं होता, यह सांस की नली को सिकोड़ने (ब्रॉन्कोकॉन्स्ट्रिक्शन) में भी भूमिका निभाता है, जो अस्थमा जैसी स्थितियों से भी जुड़ा है। इसके अलावा हिस्टामीन इम्यून सिस्टम के कई दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित करता है, जैसे यह T-सेल की सक्रियता को बदल सकता है, यानी यह सिर्फ एक लक्षण पैदा करने वाला केमिकल नहीं, बल्कि यह पूरे इम्यून सिस्टम के तालमेल में एक गहरी, जटिल भूमिका निभाता है।
तो एंटी-एलर्जी दवा खाने पर असल में क्या होता है?
अब आते हैं सबसे व्यावहारिक सवाल पर, जब हम एक "एंटीहिस्टामीन" यानी एंटी-एलर्जी दवा खाते हैं, तो वह शरीर में क्या करती है। यहां एक जरूरी बात समझनी जरूरी है, एंटीहिस्टामीन दवाएं शरीर में बन चुके हिस्टामीन को नष्ट नहीं करतीं, और न ही वे इम्यून सिस्टम की उस गलत पहचान को ठीक करती हैं जिसकी वजह से एलर्जी हुई थी।
इसकी बजाय, ये दवाएं शरीर में मौजूद हिस्टामीन रिसेप्टर (खासकर H1 रिसेप्टर) को ब्लॉक कर देती हैं। इसे ऐसे समझें, हिस्टामीन को एक चाबी की तरह सोचें, और रिसेप्टर को एक ताले की तरह, जब चाबी ताले में लगती है, तो एलर्जी के लक्षण शुरू हो जाते हैं। एंटीहिस्टामीन दवा असल में उस ताले में एक नकली, बेकार चाबी फंसा देती है, जो ताले को खोलती तो नहीं, लेकिन उसकी जगह घेरकर बैठ जाती है, जिससे असली हिस्टामीन वाली चाबी अब उस ताले में फिट ही नहीं हो पाती। यही वजह है कि एंटीहिस्टामीन को वैज्ञानिक भाषा में अक्सर "इनवर्स एगोनिस्ट" कहा जाता है, यानी यह रिसेप्टर को सक्रिय होने से रोककर, उल्टा असर डालती है।
हाल ही में वैज्ञानिकों ने क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी नाम की एक अत्याधुनिक तकनीक की मदद से यह भी देखा है कि आखिर एंटीहिस्टामीन के अणु, रिसेप्टर के अंदर बिल्कुल किस जगह और किस तरीके से फिट होते हैं। इस खोज से वैज्ञानिकों को नई, और भी असरदार एंटीहिस्टामीन दवाएं डिजाइन करने में मदद मिल रही है, जो शरीर में मौजूद इस ताले-चाबी वाले तालमेल को और बेहतर तरीके से ब्लॉक कर सकें।
पुरानी बनाम नई पीढ़ी की दवाएं, नींद क्यों आती है?
यहां एक आम, रोजमर्रा का सवाल भी जुड़ा है, कुछ एंटी-एलर्जी दवाएं खाने के बाद नींद क्यों आने लगती है, जबकि कुछ से नहीं। इसका जवाब इस बात में छिपा है कि हिस्टामीन सिर्फ एलर्जी में ही शामिल नहीं, बल्कि यह दिमाग में भी एक जरूरी न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका निभाता है, जो चौकन्नापन और जागृति बनाए रखने में मदद करता है।
पुरानी, पहली पीढ़ी की एंटीहिस्टामीन दवाएं (जैसे कुछ पुराने, सस्ते ब्रांड) दिमाग की सुरक्षा दीवार (ब्लड-ब्रेन बैरियर) को आसानी से पार कर सकती हैं, इसलिए वे दिमाग में मौजूद हिस्टामीन रिसेप्टर को भी ब्लॉक कर देती हैं, जिससे नींद और सुस्ती महसूस होती है। वहीं नई, दूसरी पीढ़ी की दवाएं इस तरह डिजाइन की गई हैं कि वे दिमाग की उस सुरक्षा दीवार को आसानी से पार नहीं कर पातीं, इसलिए वे मुख्य रूप से शरीर के बाकी हिस्सों में मौजूद हिस्टामीन को ही ब्लॉक करती हैं, जिससे नींद आने की समस्या काफी कम हो जाती है।
यही वजह है कि अगर किसी को दिन में काम करते हुए एलर्जी की दवा लेनी हो, तो डॉक्टर अक्सर नई पीढ़ी की, "नॉन-ड्राउज़ी" (नींद न लाने वाली) दवा लेने की सलाह देते हैं, जबकि पुरानी पीढ़ी की दवाएं कई बार रात में सोने से पहले जानबूझकर भी दी जाती हैं, क्योंकि उनका हल्का नींद लाने वाला असर उस वक्त फायदेमंद हो सकता है।
क्या एंटी-एलर्जी दवा एलर्जी को ठीक कर देती है?
यहां एक जरूरी, ईमानदार बात समझनी जरूरी है, एंटीहिस्टामीन दवा सिर्फ लक्षणों को दबाती है, यह एलर्जी की असली, अंदरूनी वजह को ठीक नहीं करती। यह इम्यून सिस्टम को यह सिखाने का काम नहीं करती कि वह उस पदार्थ को दोबारा खतरनाक न समझे, बल्कि यह सिर्फ हिस्टामीन के असर को अस्थायी तौर पर रोक देती है, जब तक दवा शरीर में सक्रिय रहे।
अगर कोई व्यक्ति चाहता है कि उसका इम्यून सिस्टम असल में उस पदार्थ के प्रति अपनी गलत पहचान को सुधारे, तो इसके लिए एक अलग तरीका है, जिसे इम्यूनोथेरेपी कहा जाता है, जिसमें बेहद छोटी, नियंत्रित मात्रा में उसी एलर्जन को महीनों या सालों तक धीरे-धीरे शरीर में डाला जाता है (जैसे एलर्जी शॉट्स या ड्रॉप्स के जरिए), ताकि इम्यून सिस्टम धीरे-धीरे उस पदार्थ को सहनशील तरीके से स्वीकार करना सीख जाए।
यह भी दिलचस्प है कि हाल के शोध में IgE और मास्ट सेल के बीच के इसी तालमेल को रोकने के लिए बिल्कुल नई तरह की दवाएं भी विकसित की जा रही हैं, जैसे "एंटी-IgE" थेरेपी, जो हिस्टामीन रिसेप्टर को ब्लॉक करने की बजाय, सीधे IgE एंटीबॉडी को ही निष्क्रिय कर देती है, इससे पहले कि वह मास्ट सेल को सक्रिय कर सके। यह गंभीर एलर्जी और अस्थमा के मामलों में एक बेहद उम्मीद भरी नई दिशा मानी जा रही है।
एलर्जी असल में किसी बाहरी दुश्मन के खिलाफ लड़ाई नहीं, बल्कि यह शरीर के अपने ही इम्यून सिस्टम की एक गलत पहचान और उससे उपजी, अत्यधिक रक्षात्मक प्रतिक्रिया है। IgE एंटीबॉडी, मास्ट सेल और हिस्टामीन, ये सब मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं, जो असल में हमें बचाने के लिए बना है, लेकिन एलर्जी में यह अनजाने में हमें ही परेशान करने लगता है। एंटी-एलर्जी दवाएं इस पूरी लड़ाई को खत्म नहीं करतीं, बल्कि वे सिर्फ हिस्टामीन के असर को अस्थायी तौर पर रोककर, हमें राहत का एक टापू दे देती हैं, जब तक असली इलाज, यानी इम्यूनोथेरेपी जैसी दीर्घकालिक प्रक्रिया, इम्यून सिस्टम की उस गलतफहमी को सुधारने का मौका न पा ले।


