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Health News: एंटीबायोटिक प्रतिरोध का गहराता संकट: दवा बेअसर तो मौत का खतरा 43% ज्यादा, इलाज का खर्च दोगुना
Health News: लैंसेट की स्टडी में AMR को लेकर गंभीर चेतावनी सामने आई है। दवा-प्रतिरोधी संक्रमण में मौत का खतरा 43% तक ज्यादा पाया गया, जबकि इलाज का खर्च करीब दोगुना हो सकता है।
Antibiotic Resistance (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ (AMR) यानी दवाओं के बेअसर होने का संकट एक जानलेवा चुनौती बन चुका है। हाल ही में मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ-साउथ ईस्ट एशिया’ में प्रकाशित देश के 20 प्रमुख अस्पतालों के एक व्यापक अध्ययन ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। शोध के अनुसार, जिन मरीजों में बैक्टीरिया पर जीवनरक्षक दवाएं काम नहीं करतीं, उनमें सामान्य संक्रमण के मुकाबले मृत्यु का जोखिम 43% तक अधिक पाया गया है। इसके साथ ही, ऐसे मरीजों का अस्पताल में इलाज का खर्च भी सामान्य से दोगुना तक पहुंच रहा है।
1.6 लाख मरीजों पर अध्ययन, 61% में मिला कार्बापेनेम-रेजिस्टेंस
यह अध्ययन अप्रैल 2022 से 2025 के बीच अस्पतालों में भर्ती कुल 1,59,336 मरीजों के स्वास्थ्य आंकड़ों पर आधारित है।
संक्रमण का पैमाना: जांच किए गए मरीजों में से 26,213 मरीज ‘ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया’ (अस्पतालों में होने वाले गंभीर संक्रमणों के मुख्य कारक) से पीड़ित पाए गए।
अंतिम विकल्प की दवा भी बेअसर: इनमें से 16,025 मरीज यानी 61.1% ऐसे थे, जिन पर ‘कार्बापेनेम’ (Carbapenem) श्रेणी की एंटीबायोटिक बेअसर साबित हुई। चिकित्सा जगत में कार्बापेनेम को गंभीर संक्रमणों के इलाज में ‘अंतिम हथियार’ (लास्ट-रिसॉर्ट ड्रग) माना जाता है। जब यह दवा भी काम करना बंद कर देती है, तो डॉक्टरों के पास विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं।
बैक्टीरिया वार: मौत के जोखिम का तुलनात्मक आंकड़ा
शोधकर्ताओं ने पाया कि दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर सामान्य (दवा के प्रति संवेदनशील) संक्रमण वाले मरीजों की तुलना में काफी ज्यादा है:
स्यूडोमोनास (Pseudomonas aeruginosa): इस बैक्टीरिया के कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट होने पर मरीजों में मौत का खतरा सामान्य से 43% अधिक दर्ज किया गया।
ई. कोलाई (E. coli): जब ई. कोलाई बैक्टीरिया दवा-प्रतिरोधी हो जाता है, तो मौत का खतरा 41% अधिक बढ़ जाता है।
क्लेबसिएला (Klebsiella pneumoniae): इस बैक्टीरिया के सुपरबग में बदलने पर भी आईसीयू और वार्डों में भर्ती मरीजों की स्थिति बेहद नाजुक हो जाती है।
मृत्यु दर का गणित: हर 100 रेजिस्टेंट मरीजों में से 32 की मौत
अस्पताल में भर्ती मरीजों के उपचार परिणामों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि बैक्टीरिया का दवा-प्रतिरोधी होना सीधे तौर पर जीवन की संभावनाओं को घटा देता है:
मरीज का प्रकार/अस्पताल में मृत्यु दर (%)
कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट संक्रमण (दवा बेअसर)/31.6% (लगभग हर 100 में से 32 मरीज)
कार्बापेनेम-सेंसिटिव संक्रमण (दवा असरदार)/21.6%
कुल ग्राम-नेगेटिव संक्रमित मरीज/27.7%
आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यदि संक्रमण पर पहली या दूसरी पंक्ति की एंटीबायोटिक्स काम नहीं करतीं, तो मृत्यु दर सीधे 10% तक बढ़ जाती है।
इलाज का खर्च दोगुना: परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ
दवा-प्रतिरोधी संक्रमण न केवल शारीरिक रूप से खतरनाक हैं, बल्कि यह मरीजों को आर्थिक रूप से भी तोड़ देते हैं।
लंबा अस्पताल प्रवास: दवा काम न करने के कारण मरीज को सामान्य से अधिक दिनों तक आईसीयू या आइसोलेशन वार्ड में भर्ती रहना पड़ता है।
महंगी वैकल्पिक दवाएं: जब प्राथमिक एंटीबायोटिक काम नहीं करती, तो कोलिस्टिन (Colistin) जैसी महंगी, अत्यधिक विषैली और दुर्लभ एंटीबायोटिक दवाओं का सहारा लेना पड़ता है, जिनके साथ किडनी और लिवर की निगरानी के लिए अतिरिक्त जांचें करानी पड़ती हैं।
इन सब कारणों से रेजिस्टेंट संक्रमण वाले मरीज के उपचार का कुल बिल सामान्य संक्रमण की तुलना में लगभग दोगुना तक हो जाता है।
विशेषज्ञों की राय और चिंता की वजह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बिना डॉक्टर की सलाह के मनमाने ढंग से एंटीबायोटिक दवाएं खाना, मेडिकल स्टोरों से सीधे शेड्यूल्ड दवाएं मिलना और बीच में ही एंटीबायोटिक का कोर्स छोड़ देना इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ है। इसके अलावा, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल (Infection Control Protocol) और स्वच्छता की कमी भी सुपरबग्स के एक मरीज से दूसरे मरीज में फैलने का बड़ा कारण बनती है।
चिकित्सकों का कहना है कि यदि एंटीबायोटिक्स के अंधाधुंध इस्तेमाल पर तुरंत सख्त नीति और निगरानी लागू नहीं की गई, तो आने वाले समय में एक मामूली सा संक्रमण भी जानलेवा साबित होने लगेगा।


