Autoimmune Diseases: महिलाओं में ज्यादा, लेकिन कुछ बीमारियों में पुरुष आगे क्यों?

Autoimmune Diseases in Women: महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियाँ अधिक क्यों होती हैं? जानें XIST जीन, हार्मोन, इम्यून सिस्टम और उन बीमारियों के बारे में जिनमें पुरुष अधिक प्रभावित होते हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 19 Oct 2026 7:30 PM IST
Autoimmune Diseases in Women Health Update in Hindi | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News
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Autoimmune Diseases in Women Health Update in Hindi | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News

Autoimmune Diseases in Women: हमारे शरीर में एक ऐसी सुरक्षा व्यवस्था है, जो हर समय बैक्टीरिया, वायरस और दूसरे हानिकारक जीवों से हमारी रक्षा करती है। इसे प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) कहते हैं। लेकिन कभी-कभी यही व्यवस्था शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों को दुश्मन समझकर उन पर हमला करने लगती है। इससे त्वचा, जोड़ों, थायरॉयड, आँतों, गुर्दों और तंत्रिकाओं जैसे अंग प्रभावित हो सकते हैं। कुछ बीमारियों में एक साथ कई अंगों को नुकसान पहुँचता है। ऐसी बीमारियों को ऑटोइम्यून बीमारियाँ कहा जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि अनेक ऑटोइम्यून बीमारियाँ पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाई जाती हैं। अलग-अलग अध्ययनों में इन बीमारियों से प्रभावित लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 70 से 80 प्रतिशत तक बताई गई है। हालाँकि, यह अनुपात इस बात पर निर्भर करता है कि किन बीमारियों को अध्ययन में शामिल किया गया है और किस आबादी का अध्ययन किया गया है। इसके पीछे केवल महिला हार्मोन जिम्मेदार नहीं हैं। महिलाओं के दो एक्स गुणसूत्र, प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े जीन, हार्मोन, संक्रमण और पर्यावरण जैसे कई कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं।

वर्ष 2024 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने एक्स गुणसूत्र को निष्क्रिय रखने वाली प्रक्रिया और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संभावित संबंध को समझने में नई मदद दी।

लेकिन एक और सवाल है: क्या कोई ऐसा देश है जहाँ महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में ऑटोइम्यून बीमारियाँ अधिक होती हैं?

इसका जवाब जानने के लिए सभी ऑटोइम्यून बीमारियों को एक साथ देखने के बजाय अलग-अलग बीमारियों के आँकड़ों को समझना जरूरी है। किसी देश में एक बीमारी पुरुषों में अधिक होने का अर्थ यह नहीं है कि वहाँ सभी ऑटोइम्यून बीमारियाँ भी पुरुषों में अधिक हैं।

ऑटोइम्यून बीमारी में शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला क्यों करने लगता है?

इस सवाल को समझने के लिए हमें प्रतिरक्षा प्रणाली की एक खास क्षमता को जानना होगा। इसे इम्यून टॉलरेंस यानी अपनी कोशिकाओं के प्रति सहनशीलता कहते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी रोगाणुओं और शरीर के अपने ऊतकों के बीच अंतर कर पाती है। इस काम में टी-कोशिकाएँ, बी-कोशिकाएँ, एंटीबॉडी और कई दूसरी जैविक व्यवस्थाएँ मदद करती हैं।

जब टी-कोशिकाएँ विकसित होती हैं, तो थाइमस नामक अंग में उनकी जाँच होती है। इस दौरान शरीर के अपने पदार्थों पर बहुत तेज प्रतिक्रिया करने वाली कई कोशिकाओं को हटा दिया जाता है या नियंत्रित किया जाता है। बी-कोशिकाओं की भी अस्थि मज्जा में इसी तरह जाँच होती है।

इसे सेंट्रल टॉलरेंस कहा जाता है।

हालाँकि, यह प्रक्रिया पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं होती। कुछ ऐसी कोशिकाएँ बच सकती हैं जो शरीर के अपने ऊतकों को पहचानने की क्षमता रखती हैं। इसलिए शरीर में नियंत्रण की एक दूसरी व्यवस्था भी होती है, जिसे पेरिफेरल टॉलरेंस कहते हैं। इसमें कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं को निष्क्रिय रखा जाता है, कुछ को नष्ट कर दिया जाता है और रेगुलेटरी टी-कोशिकाएँ अनावश्यक प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को रोकने में मदद करती हैं।

जब आनुवंशिक संवेदनशीलता, प्रतिरक्षा प्रणाली के नियंत्रण में गड़बड़ी और दूसरे कारक एक साथ असर डालते हैं, तो ये व्यवस्थाएँ पर्याप्त रूप से काम नहीं कर पातीं। नतीजतन, ऑटोइम्यून बीमारी विकसित हो सकती है।

क्या वायरस और बैक्टीरिया प्रतिरक्षा प्रणाली को भ्रमित कर सकते हैं?

कुछ परिस्थितियों में संक्रमण ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया शुरू करने या उसे बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। इसकी एक संभावित वजह को मॉलिक्यूलर मिमिक्री कहा जाता है। कुछ रोगाणुओं के प्रोटीन शरीर के अपने प्रोटीन से मिलते-जुलते हो सकते हैं। संक्रमण से लड़ते समय प्रतिरक्षा प्रणाली ऐसी प्रतिक्रिया विकसित कर सकती है, जिसका असर बाद में शरीर के अपने ऊतकों पर भी पड़ने लगे।

उदाहरण के लिए, एपस्टीन-बार वायरस और मल्टीपल स्क्लेरोसिस के बीच संबंध को लेकर महत्वपूर्ण शोध हुए हैं। हालाँकि, हर ऑटोइम्यून बीमारी का कारण संक्रमण नहीं होता। किसी संक्रमण के बाद बीमारी विकसित होने का मतलब यह भी नहीं कि संक्रमण ही उसका एकमात्र कारण था।

कभी-कभी शरीर की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होने पर उनके भीतर मौजूद पदार्थ प्रतिरक्षा प्रणाली के सामने ऐसे रूप में आ सकते हैं, जिससे प्रतिक्रिया बढ़ जाए। यदि व्यक्ति पहले से आनुवंशिक रूप से संवेदनशील है, तो यह प्रक्रिया बीमारी के विकास में योगदान दे सकती है। इसलिए ऑटोइम्यून बीमारी अक्सर किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई घटनाओं के एक साथ होने से विकसित होती है।

महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियाँ अधिक क्यों होती हैं?

इसे समझने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली की दो क्षमताओं में अंतर करना जरूरी है। पहली क्षमता है बैक्टीरिया और वायरस जैसे रोगाणुओं से लड़ना। दूसरी है शरीर की अपनी स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने से बचना।

महिलाओं में कई परिस्थितियों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पुरुषों की तुलना में अधिक सक्रिय होती है। इससे कुछ संक्रमणों के खिलाफ बेहतर प्रतिक्रिया मिल सकती है और कुछ टीकों के प्रति भी शरीर की प्रतिक्रिया अधिक हो सकती है। लेकिन अधिक सक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली हमेशा बेहतर ही हो, यह जरूरी नहीं। यदि अपनी कोशिकाओं को पहचानने और अनावश्यक हमलों को रोकने वाली व्यवस्था में गड़बड़ी हो जाए, तो ऑटोइम्यून बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है।

एक्स गुणसूत्र में छिपा महत्वपूर्ण सुराग

आमतौर पर महिलाओं की कोशिकाओं में दो एक्स गुणसूत्र होते हैं, जबकि पुरुषों में एक एक्स और एक वाई गुणसूत्र होता है। एक्स गुणसूत्र पर प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े कई महत्वपूर्ण जीन मौजूद हैं। महिलाओं की कोशिकाओं में दो एक्स गुणसूत्र होने के कारण कुछ जीनों की गतिविधि बढ़ने की संभावना रहती है।

इससे बचने के लिए शरीर सामान्यतः दोनों एक्स गुणसूत्रों में से एक को काफी हद तक निष्क्रिय कर देता है। इस प्रक्रिया को एक्स-क्रोमोसोम इनएक्टिवेशन कहते हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया में सभी जीन पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होते। कुछ जीन सक्रिय बने रह सकते हैं। उनकी अतिरिक्त गतिविधि प्रतिरक्षा प्रणाली के कामकाज को प्रभावित कर सकती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह महिलाओं में कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों का जोखिम बढ़ने की एक संभावित वजह हो सकती है।

वर्ष 2024 की खोज: XIST नामक अणु की क्या भूमिका है?

फरवरी 2024 में वैज्ञानिक पत्रिका Cell में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित हुआ। इसने एक्स गुणसूत्र के निष्क्रिय होने की प्रक्रिया और ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाओं के बीच संबंध को समझने के लिए नए प्रमाण दिए। एक्स गुणसूत्र को निष्क्रिय रखने में XIST नामक आरएनए अणु महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कई प्रोटीनों के साथ मिलकर ऐसी आणविक संरचनाएँ बनाता है, जो एक्स गुणसूत्र की गतिविधि को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इन संरचनाओं से जुड़े कुछ प्रोटीन ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाओं का निशाना बन सकते हैं।

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने नर चूहों में प्रयोग के जरिए Xist की गतिविधि शुरू कराई। कुछ परिस्थितियों में इससे शरीर के अपने पदार्थों के विरुद्ध एंटीबॉडी बनने और ऑटोइम्यून बीमारी के प्रयोगात्मक मॉडल में अधिक गंभीर लक्षण दिखाई देने के प्रमाण मिले। मानव मरीजों के नमूनों में भी XIST से जुड़ी संरचनाओं के कुछ हिस्सों के विरुद्ध ऑटोएंटीबॉडी पाई गईं।

यह खोज महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि एक्स गुणसूत्र को निष्क्रिय रखने की प्रक्रिया प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी असर डाल सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि महिलाओं में होने वाली सभी ऑटोइम्यून बीमारियों का कारण XIST ही है। अलग-अलग बीमारियों में इसकी भूमिका को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।

महिला हार्मोन एस्ट्रोजन की क्या भूमिका है?

एस्ट्रोजन महिलाओं का एक प्रमुख हार्मोन है, लेकिन इसकी भूमिका केवल प्रजनन तक सीमित नहीं है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली के कई हिस्सों को भी प्रभावित करता है। कुछ परिस्थितियों में एस्ट्रोजन ऐसी प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे सकता है, जिनसे एंटीबॉडी बनती हैं। दूसरी ओर, पुरुषों में अधिक मात्रा में पाए जाने वाले एंड्रोजन हार्मोन के कुछ प्रभाव प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं।

हालाँकि, महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियाँ अधिक होने की वजह केवल एस्ट्रोजन नहीं है। अगर केवल यही हार्मोन जिम्मेदार होता, तो यौवन, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति के दौरान सभी महिलाओं में बीमारी का एक जैसा पैटर्न दिखाई देता। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है।

गर्भावस्था के दौरान कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों की गतिविधि कम हो सकती है, जबकि कुछ में बढ़ सकती है। प्रसव के बाद भी बीमारी के लक्षण बदल सकते हैं।

उदाहरण के लिए, रूमेटॉइड आर्थराइटिस से पीड़ित कुछ महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान बीमारी की गतिविधि कम हो जाती है, लेकिन प्रसव के बाद फिर बढ़ सकती है।

इससे स्पष्ट है कि हार्मोन महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बीमारी के विकास में आनुवंशिक बनावट, प्रतिरक्षा नियंत्रण और दूसरे कारक भी भूमिका निभाते हैं।

क्या महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पुरुषों से अधिक शक्तिशाली होती है?

कुछ प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाएँ महिलाओं में अधिक सक्रिय पाई गई हैं। लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली हर मामले में पुरुषों से अधिक शक्तिशाली होती है। प्रतिरक्षा प्रणाली की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह कितनी तेज प्रतिक्रिया देती है। यह भी जरूरी है कि वह सही लक्ष्य को पहचाने और अनावश्यक हमलों को रोक सके। जो प्रतिरक्षा प्रणाली रोगाणुओं के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया देती है, वही अगर शरीर की अपनी कोशिकाओं के प्रति पर्याप्त सहनशीलता न रखे, तो नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिए महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों की अधिकता को केवल उनकी अधिक सक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली का नतीजा बताना अधूरा होगा।

किन ऑटोइम्यून बीमारियों में महिलाएँ अधिक प्रभावित होती हैं?

कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से काफी अधिक है।

1. ल्यूपस (Lupus)

इस बीमारी में प्रतिरक्षा प्रणाली त्वचा, जोड़ों, गुर्दों, रक्त और शरीर के दूसरे अंगों को प्रभावित कर सकती है। इसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से कई गुना अधिक होती है।

2. शोग्रेन रोग (Sjögren’s disease)

इस बीमारी में आँसू और लार बनाने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं। इससे आँखों और मुँह में सूखापन हो सकता है। यह बीमारी भी महिलाओं में अधिक पाई जाती है।

3. ऑटोइम्यून थायरॉयड बीमारियाँ

हाशिमोटो थायरॉयडाइटिस और ग्रेव्स रोग में प्रतिरक्षा प्रणाली थायरॉयड ग्रंथि को प्रभावित करती है। इन बीमारियों में भी महिलाओं की संख्या अधिक होती है।

4. रूमेटॉइड आर्थराइटिस

इस बीमारी में जोड़ों में सूजन, दर्द और अकड़न होती है। महिलाओं में इसके मामले अधिक पाए जाते हैं।

5. सिस्टमिक स्क्लेरोसिस

यह बीमारी त्वचा और शरीर के कुछ आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकती है। इसमें भी महिलाओं की प्रधानता देखी जाती है।

हालाँकि, हर बीमारी में महिला और पुरुष मरीजों का अनुपात एक जैसा नहीं है। स्टैनफोर्ड के 2024 के विवरण में ल्यूपस के लिए लगभग नौ महिलाओं पर एक पुरुष और शोग्रेन रोग के लिए लगभग उन्नीस महिलाओं पर एक पुरुष का अनुपात बताया गया था।

क्या किसी देश में ऑटोइम्यून बीमारियाँ महिलाओं से अधिक पुरुषों में होती हैं?

इस सवाल का जवाब देने के लिए सभी ऑटोइम्यून बीमारियों और अलग-अलग बीमारियों के आँकड़ों में अंतर समझना जरूरी है। उपलब्ध शोध के आधार पर किसी देश को ऐसा स्थापित अपवाद नहीं कहा जा सकता जहाँ सभी ऑटोइम्यून बीमारियों को मिलाकर पुरुषों में इनका बोझ महिलाओं से अधिक हो। लेकिन कुछ खास बीमारियों में पुरुषों की संख्या अधिक होती है। अलग-अलग देशों में इनके अनुपात भी बदल सकते हैं।

ब्रिटेन: महिलाओं में कुल रोगभार अधिक

वर्ष 2023 में The Lancet में प्रकाशित एक अध्ययन में ब्रिटेन के लगभग 2.2 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। वर्ष 2000 से 2019 के बीच 19 सामान्य ऑटोइम्यून बीमारियों के नए निदान वाले 9,78,872 लोगों में लगभग 63.9 प्रतिशत महिलाएँ और 36.1 प्रतिशत पुरुष थे। अध्ययन में इन बीमारियों की दर्ज व्यापकता महिलाओं में 13.1 प्रतिशत और पुरुषों में 7.4 प्रतिशत पाई गई। इससे पता चलता है कि ब्रिटेन में इन 19 बीमारियों का कुल बोझ महिलाओं में अधिक था। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि हर अध्ययन में ऑटोइम्यून रोगियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत नहीं होती।

स्वीडन: हर बीमारी में महिलाओं की संख्या अधिक नहीं

स्वीडन में 4,03,757 लोगों से जुड़े 32 ऑटोइम्यून रोगों के एक अध्ययन का उल्लेख 2026 की वैज्ञानिक समीक्षा में किया गया है। इसमें महिलाओं में कुल रोगभार अधिक था, लेकिन सभी 32 बीमारियों में महिला प्रधानता नहीं थी। केवल 18 बीमारियों में महिलाओं की संख्या स्पष्ट रूप से अधिक थी। बाकी बीमारियों में पुरुषों की संख्या अधिक थी या महिला-पुरुष के बीच स्पष्ट अंतर नहीं मिला। इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वीडन में सभी ऑटोइम्यून बीमारियाँ पुरुषों में अधिक हैं। इससे केवल यह पता चलता है कि हर ऑटोइम्यून बीमारी का लिंग के आधार पर अपना अलग पैटर्न हो सकता है।

फिनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और डेनमार्क: टाइप-1 डायबिटीज़ का अलग पैटर्न

टाइप-1 डायबिटीज़ एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की उन कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाती है, जो इंसुलिन बनाती हैं। वर्ष 2022 में Diabetes Care में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में 32 देशों और क्षेत्रों से जुड़े आँकड़ों का विश्लेषण किया गया। लिंग के आधार पर नए मामलों की दर बताने वाले 26 अध्ययनों में से लगभग 92 प्रतिशत में वयस्क पुरुषों की दर महिलाओं से अधिक थी। ईरान और अमेरिका के अध्ययन इसके अपवाद थे।

फिनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और डेनमार्क जैसे उत्तरी यूरोपीय देशों में वयस्कों में टाइप-1 डायबिटीज़ के नए मामले अपेक्षाकृत अधिक पाए गए। यहाँ एक जरूरी बात समझनी चाहिए। पुरुषों में अधिक दर का यह निष्कर्ष मुख्य रूप से वयस्कों में नए निदान से संबंधित है। इसे बच्चों, सभी आयु वर्गों या हर देश के सभी मरीजों पर लागू नहीं किया जा सकता।

कनाडा: रीढ़ से जुड़ी सूजन वाली बीमारी में पुरुष अधिक

एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें रीढ़ और शरीर के कुछ अन्य जोड़ों में सूजन हो सकती है। इसे प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी सूजन संबंधी बीमारियों के समूह में रखा जाता है, हालाँकि इसकी रोग-प्रक्रिया ल्यूपस जैसी पारंपरिक ऑटोइम्यून बीमारियों से अलग है।

कनाडा के ओंटारियो प्रांत में किए गए एक अध्ययन में वर्ष 1995 से 2010 तक पुरुषों में इस बीमारी की व्यापकता अधिक पाई गई। लेकिन समय के साथ महिलाओं में भी इसकी पहचान बढ़ी और दोनों के बीच का अंतर कम हो गया। वर्ष 1995 में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात लगभग 1.70 था, जो 2010 में घटकर लगभग 1.21 रह गया।

इससे पता चलता है कि किसी बीमारी के आँकड़े केवल उसके जैविक कारणों पर निर्भर नहीं करते। बीमारी की पहचान करने के तरीके और चिकित्सा सुविधाओं में बदलाव भी महिला-पुरुष अनुपात को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत, इटली, ब्रिटेन और स्कैंडिनेवियाई देश: सीलिएक रोग में अंतर

सीलिएक रोग में ग्लूटेन के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के कारण छोटी आँत को नुकसान पहुँचता है। वर्ष 2018 की एक व्यवस्थित समीक्षा में अलग-अलग देशों के अध्ययनों में महिला-पुरुष अनुपात अलग पाया गया। संकलित आँकड़ों में भारत, इटली और ब्रिटेन के कुछ अध्ययनों में पुरुष प्रधानता दर्ज की गई, जबकि डेनमार्क और स्वीडन के अध्ययनों में महिलाओं की संख्या अधिक थी।

हालाँकि, ऐसे नतीजों की व्याख्या करते समय यह देखना जरूरी है कि अध्ययन किस आबादी पर किया गया था, किस समय के आँकड़े लिए गए थे और बीमारी की पहचान किस तरीके से की गई थी। इस आधार पर किसी देश के लिए सीलिएक रोग का एक स्थायी महिला-पुरुष अनुपात घोषित करना उचित नहीं होगा। कुल मिलाकर, देशों के बीच अंतर जरूर मिलता है, लेकिन यह अंतर मुख्य रूप से खास बीमारियों के स्तर पर सामने आता है। किसी देश में एक ऑटोइम्यून बीमारी पुरुषों में अधिक होने से यह साबित नहीं होता कि वहाँ सभी ऑटोइम्यून बीमारियाँ भी पुरुषों में अधिक हैं।

क्या ऑटोइम्यून बीमारियाँ माता-पिता से बच्चों में आती हैं?

ऑटोइम्यून बीमारियों में आनुवंशिक बनावट की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। कुछ परिवारों में एक या एक से अधिक ऑटोइम्यून बीमारियाँ अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती हैं। लेकिन अधिकांश सामान्य ऑटोइम्यून बीमारियाँ ऐसी नहीं हैं कि किसी एक जीन के कारण वे अगली पीढ़ी में निश्चित रूप से पहुँच जाएँ।

एचएलए जीन समूह सहित कई जीन प्रतिरक्षा प्रणाली के कामकाज को प्रभावित करते हैं। अलग-अलग बीमारियों में आनुवंशिक जोखिम भी अलग होते हैं।।अगर परिवार में किसी व्यक्ति को ल्यूपस, रूमेटॉइड आर्थराइटिस या ऑटोइम्यून थायरॉयड रोग है, तो परिवार के दूसरे सदस्यों में जोखिम कुछ बढ़ सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें भी वही बीमारी होगी।

बीमारी के विकास में आनुवंशिक संवेदनशीलता के साथ पर्यावरण और अन्य जैविक कारक भी भूमिका निभाते हैं।

क्या तनाव, प्रदूषण और खानपान से ऑटोइम्यून बीमारी हो सकती है?

कुछ पर्यावरणीय कारक ऑटोइम्यून बीमारियों के विकास या उनकी गंभीरता को प्रभावित कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, धूम्रपान का रूमेटॉइड आर्थराइटिस के कुछ रूपों से संबंध पाया गया है। सिलिका जैसे पदार्थों के संपर्क में आने से भी कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन तनाव होने या असंतुलित भोजन करने का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से ऑटोइम्यून बीमारी हो जाएगी।

इसी तरह, इंटरनेट पर यह दावा भी लोकप्रिय है कि सभी ऑटोइम्यून बीमारियाँ आँतों की दीवार कमजोर होने या तथाकथित लीकी गट के कारण होती हैं। यह दावा वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं है। आँतों की अंदरूनी परत, उनमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों और प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच संबंधों पर शोध जारी है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि सभी ऑटोइम्यून बीमारियों के पीछे एक ही कारण होता है।

क्या ऑटोइम्यून बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है?

इसका जवाब बीमारी के प्रकार और उसकी गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों में लंबे समय तक रिमिशन संभव है। इसका मतलब है कि बीमारी की गतिविधि बहुत कम हो गई है या वह निर्धारित मानदंडों के अनुसार नियंत्रित अवस्था में है। उपचार का उद्देश्य प्रतिरक्षा प्रणाली की हानिकारक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना और अंगों को होने वाले नुकसान से बचाना होता है। इसके लिए कॉर्टिकोस्टेरॉयड, रोग-संशोधक दवाएँ, बायोलॉजिक उपचार और दूसरी लक्षित दवाएँ इस्तेमाल की जा सकती हैं।

लेकिन हर ऑटोइम्यून बीमारी का स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। उदाहरण के लिए, टाइप-1 डायबिटीज़ से पीड़ित अधिकांश लोगों को इंसुलिन लेना पड़ता है। यह भी जरूरी नहीं कि हर ऑटोइम्यून बीमारी में प्रतिरक्षा प्रणाली को व्यापक रूप से दबाने वाली दवाएँ दी जाएँ। उपचार बीमारी के प्रकार, प्रभावित अंगों, गंभीरता और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर तय किया जाता है। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएँ बंद करना या प्रतिरक्षा प्रणाली को 'रीसेट' करने वाले अप्रमाणित उपचार अपनाना खतरनाक हो सकता है।

महिलाओं में बीमारी की पहचान में देरी क्यों होती है?

ऑटोइम्यून बीमारियों के लक्षण अक्सर दूसरी बीमारियों से मिलते-जुलते होते हैं। थकान, जोड़ों का दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी और त्वचा में बदलाव कई अलग-अलग स्थितियों में दिखाई दे सकते हैं। इसलिए सही बीमारी की पहचान करना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। कुछ बीमारियों में महिलाओं और पुरुषों के लक्षणों या जाँच के नतीजों में भी अंतर हो सकता है। इसके अलावा, कुछ बीमारियों को लंबे समय तक पुरुषों में अधिक आम माना गया। इसके कारण महिलाओं में उनकी पहचान देर से होने की आशंका रहती है। कभी-कभी मरीज की शिकायतों को पर्याप्त जाँच के बिना तनाव या मनोवैज्ञानिक कारणों से जोड़ दिया जाता है। ऐसा होने पर वास्तविक बीमारी का निदान देर से हो सकता है।

इसलिए जरूरी है कि लगातार बने रहने वाले लक्षणों को गंभीरता से लिया जाए और आवश्यकता के अनुसार चिकित्सकीय जाँच कराई जाए। महिलाओं में कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों का जोखिम अधिक होने का अर्थ यह नहीं है कि पुरुषों में ऐसे लक्षणों को कम गंभीर माना जाए। दोनों में समय पर पहचान और उचित उपचार जरूरी हैं।

इस पूरे विषय से एक महत्वपूर्ण बात समझ आती है: प्रतिरक्षा प्रणाली की सफलता केवल दुश्मनों पर हमला करने में नहीं, बल्कि यह पहचानने में भी है कि किस पर हमला नहीं करना चाहिए।

जब शरीर की यही पहचान और नियंत्रण व्यवस्था बिगड़ जाती है, तो उसकी सुरक्षा प्रणाली ही उसके अपने अंगों के लिए खतरा बन सकती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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