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BMI क्या सच में Healthy Weight बताता है? जानिए BMI की पूरी कहानी और इसकी सीमाएं
BMI शरीर की चर्बी का सीधा माप नहीं है। जानिए BMI की शुरुआत कैसे हुई, क्वेटेले ने इसे क्यों बनाया, भारत में BMI की सीमाएं क्या हैं और स्वस्थ शरीर के लिए कमर, चर्बी व अन्य संकेतक क्यों जरूरी हैं।
BMI Healthy Weight Calculator
BMI Healthy Weight Calculator: अगर किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि उसका वजन हेल्दी है या नहीं, तो सबसे पहले जो संख्या सामने आती है वह है बीएमआई (BMI) यानी बॉडी मास इंडेक्स (Body Mass Index)। डॉक्टर, हेल्थ ऐप, जिम, सरकारी सर्वेक्षण, बीमा कंपनियां और वैज्ञानिक शोध लंबे समय से इस एक संख्या का इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन BMI को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही है कि यह शरीर की चर्बी को सीधे मापता है। वास्तव में BMI शरीर में मौजूद फैट का कोई सीधा माप नहीं है। यह केवल व्यक्ति के वजन और लंबाई के बीच गणितीय संबंध बताता है।
और इसकी कहानी भी उतनी आधुनिक नहीं है जितनी हम समझते हैं।
BMI की शुरुआत लगभग 200 साल पहले हुई थी। इसे किसी आधुनिक डॉक्टर ने मोटापा पहचानने के लिए नहीं बनाया था। इसके पीछे एक बेल्जियन गणितज्ञ, सांख्यिकीविद और खगोलशास्त्री अडोल्फ क्वेटेले का काम था। बाद में 1972 में अमेरिकी शरीर-विज्ञानी एन्सेल कीज़ और उनके सहयोगियों ने इसी पुराने सूचक को Body Mass Index नाम दिया।
यानी जिस संख्या से आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों के वजन को सामान्य, अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में रखा जाता है, उसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी के जनसंख्या-सांख्यिकी अध्ययन में हैं। लेकिन अब विज्ञान खुद कह रहा है कि BMI को जितना महत्व दिया गया है, उसे उतना ही समझदारी से इस्तेमाल करने की जरूरत है।
एक गणितीय सूत्र कैसे बन गया मोटापे का पैमाना
क्वेटेले के बाद कई दशकों तक यह सूचकांक चिकित्सा जगत में मोटापा मापने का प्रमुख तरीका नहीं था। बीसवीं शताब्दी में बीमा कंपनियों ने वजन और मृत्यु के जोखिम के बीच संबंध समझने के लिए अलग-अलग ‘आदर्श वजन’ तालिकाएं तैयार कीं। अमेरिका की मेट्रोपोलिटन लाइफ इंश्योरेंस कंपनी ने लंबाई और शरीर की बनावट के आधार पर वजन संबंधी तालिकाएं तैयार की थीं। बीमा कंपनियों के आंकड़ों में अधिक वजन वाले लोगों में कुछ बीमारियों और समय से पहले मृत्यु का जोखिम अधिक दिखाई देता था। इसलिए वजन को स्वास्थ्य जोखिम से जोड़कर देखने की कोशिश तेज हुई।
लेकिन इन तालिकाओं में भी कई कमियां थीं। वे सीमित आबादी के आंकड़ों पर आधारित थीं। शरीर की बनावट को छोटे, मध्यम और बड़े ढांचे जैसी मोटी श्रेणियों में बांटा जाता था। अलग उम्र, अलग सामाजिक समूह और अलग जातीय पृष्ठभूमि के लोगों के लिए इनका उपयोग समान रूप से उचित नहीं था।
फिर 1972 में अमेरिकी शरीर-विज्ञानी एन्सेल कीज़ और उनके सहयोगियों ने सात हजार से अधिक पुरुषों के अंतरराष्ट्रीय नमूने पर वजन और लंबाई से जुड़े कई सूचकों की तुलना की। उन्होंने पाया कि वजन को लंबाई के वर्ग से भाग देने वाला क्वेटेले का सूत्र शरीर की मोटाई से अपेक्षाकृत अच्छा सांख्यिकीय संबंध दिखाता है।
यहीं से इसे नया नाम मिला - BMI
इस तरह लगभग डेढ़ सौ साल पुराना सांख्यिकीय सूत्र आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान में मोटापे के सबसे लोकप्रिय मापों में शामिल हो गया।
इसे निकालना इतना आसान क्यों है?
इस सूचकांक की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता है। किसी व्यक्ति का वजन किलोग्राम में लिया जाता है और उसे मीटर में लंबाई के वर्ग से भाग दिया जाता है। मसलन, यदि किसी व्यक्ति का वजन 70 किलोग्राम है और लंबाई 1.70 मीटर है तो उसका BMI लगभग 24.2 होगा।
इसके लिए किसी महंगी मशीन, रक्त जांच, एक्स-रे या विशेष प्रशिक्षण की जरूरत नहीं पड़ती। एक वजन मशीन और लंबाई मापने का साधन पर्याप्त है। यही कारण है कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह अत्यंत उपयोगी है। किसी देश की पूरी आबादी में मोटापे की स्थिति जानने के लिए हर व्यक्ति की शरीर-चर्बी अलग से मापना संभव नहीं है। लेकिन वजन और लंबाई मापना आसान है। यहीं से इस सूचकांक की असली ताकत सामने आती है।
यह व्यक्ति के लिए सीमित जानकारी देता है, लेकिन बड़ी आबादी के लिए बहुत उपयोगी आंकड़ा बन सकता है।
वयस्कों के लिए दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण में 18.5 से कम को कम वजन, 18.5 से 24.9 को सामान्य सीमा, 25 से 29.9 को अधिक वजन और 30 या उससे अधिक को मोटापे की श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन संख्याओं को शरीर की चर्बी की सीधी माप नहीं समझना चाहिए।
BMI वास्तव में वजन और लंबाई का अनुपात है। यही इसकी सबसे बड़ी सीमा भी है।
एक ही संख्या, दो बिल्कुल अलग शरीर
मान लीजिए दो लोगों का BMI 28 है। पहला व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करने वाला खिलाड़ी है। उसके शरीर में मांसपेशियां बहुत अधिक हैं और चर्बी कम है। दूसरे व्यक्ति की मांसपेशियां कम हैं लेकिन पेट और आंतरिक अंगों के आसपास चर्बी अधिक है। दोनों का सूचकांक समान हो सकता है। लेकिन उनके शरीर की बनावट और स्वास्थ्य जोखिम बिल्कुल अलग हो सकते हैं।
वजन मशीन पर मांसपेशी, हड्डी, पानी और चर्बी सभी एक ही संख्या में जुड़ जाते हैं। BMI इनके बीच अंतर नहीं कर सकता। यही कारण है कि किसी बहुत मांसल खिलाड़ी का सूचकांक 30 से ऊपर हो सकता है, फिर भी उसके शरीर में मोटापे जितनी चर्बी न हो। इसके उलट कोई व्यक्ति देखने में बहुत भारी न लगे और उसका सूचकांक सामान्य सीमा में हो, लेकिन उसके पेट के भीतर खतरनाक मात्रा में चर्बी जमा हो सकती है।
इसे सामान्य वजन के साथ छिपा मोटापा कहा जा सकता है। इस स्थिति में व्यक्ति का वजन सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन मधुमेह, वसायुक्त यकृत और हृदय रोग का खतरा बढ़ा हुआ हो सकता है। इसलिए यह कहना अधिक सही है कि BMI एक प्रारंभिक जांच का साधन है, अंतिम चिकित्सकीय फैसला नहीं।
असली खतरा केवल वजन नहीं, पेट की चर्बी भी है
आधुनिक चिकित्सा में अब यह बात अच्छी तरह स्थापित है कि शरीर में चर्बी कहां जमा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि कुल वजन। त्वचा के नीचे जमा चर्बी और पेट तथा आंतरिक अंगों के आसपास जमा चर्बी एक जैसी नहीं होती। पेट के भीतर जमा आंतरिक चर्बी शरीर के चयापचय पर अधिक प्रभाव डाल सकती है। यह इंसुलिन के प्रति शरीर की संवेदनशीलता घटा सकती है और मधुमेह, उच्च रक्तचाप, वसायुक्त यकृत तथा हृदय रोग का जोखिम बढ़ा सकती है। इसी कारण आज चिकित्सक केवल वजन और BMI पर निर्भर नहीं रहते। कमर का घेरा, कमर और कूल्हे का अनुपात तथा कमर और लंबाई का अनुपात भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। कई मामलों में कमर का माप व्यक्ति के स्वास्थ्य जोखिम के बारे में उस संख्या से ज्यादा जानकारी दे सकता है जो केवल वजन और लंबाई से निकलती है।
भारत में खतरा कम वजन पर ही क्यों शुरू हो सकता है?
भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। वैज्ञानिक शोध लंबे समय से संकेत देता रहा है कि दक्षिण एशियाई आबादी में समान BMI पर यूरोपीय मूल की आबादी की तुलना में शरीर में चर्बी और विशेष रूप से पेट के भीतर जमा चर्बी अधिक हो सकती है।
इसका अर्थ यह है कि किसी भारतीय व्यक्ति में मधुमेह और हृदय रोग का जोखिम उस सूचकांक पर ही बढ़ना शुरू हो सकता है, जिस पर किसी अन्य आबादी में जोखिम अपेक्षाकृत कम हो।
2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की विशेषज्ञ सलाह में भी माना गया था कि एशियाई आबादी में मधुमेह और हृदय रोग का खतरा पारंपरिक 25 की सीमा से पहले ही बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों ने 23 और 27.5 जैसे बिंदुओं को अतिरिक्त कार्रवाई के संकेत के रूप में उपयोगी माना था। हालांकि पूरे एशिया के लिए एक ही नई सीमा तय करना आसान नहीं माना गया, क्योंकि अलग-अलग आबादियों में जोखिम अलग स्तर पर बढ़ सकता है। भारत में इसी कारण लंबे समय से अपेक्षाकृत कम सीमाओं को महत्व दिया जाता रहा है।
भारतीय स्वास्थ्य संदर्भ में 23 से 24.9 के बीच को अधिक वजन और 25 या उससे अधिक को मोटापे की श्रेणी में देखने की व्यवस्था विकसित हुई है।
इसका अर्थ है कि किसी भारतीय व्यक्ति का सूचकांक 26 है तो अंतरराष्ट्रीय सामान्य वर्गीकरण में वह अधिक वजन की श्रेणी में हो सकता है, जबकि भारतीय जोखिम-आधारित दृष्टिकोण में उसे मोटापे की श्रेणी में रखा जा सकता है।
कारण यही है कि दक्षिण एशियाई लोगों में पेट की चर्बी, इंसुलिन प्रतिरोध और मधुमेह का खतरा अपेक्षाकृत कम सूचकांक पर भी बढ़ सकता है।
क्या पूरी दुनिया में एक ही ‘स्वस्थ वजन’ का पैमाना है?
अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण दुनिया भर में तुलना करने और बड़ी आबादी के स्वास्थ्य की स्थिति समझने के लिए बेहद उपयोगी है। लेकिन हर व्यक्ति और हर आयु वर्ग पर वही सीमा उसी तरह लागू नहीं की जा सकती। बच्चों के लिए वयस्कों जैसी स्थिर सीमाएं इस्तेमाल नहीं होतीं। बच्चों में उम्र और लिंग के अनुसार BMI की वृद्धि देखी जाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी सामान्य वयस्क सूचकांक की व्याख्या सीधे लागू नहीं होती, क्योंकि गर्भावस्था के दौरान वजन बढ़ना स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है। बुजुर्गों में मांसपेशियों की मात्रा कम होने के कारण सामान्य वजन दिखाई देने पर भी शरीर में चर्बी अधिक हो सकती है। खिलाड़ियों में अधिक मांसपेशी के कारण सूचकांक ज्यादा आ सकता है, जबकि शरीर में चर्बी कम हो सकती है।
इसलिए इसे ‘पास या फेल’ की परीक्षा समझना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
2025 में मोटापे की परिभाषा पर क्यों बदला नजरिया?
मोटापे को समझने की दिशा में 2025 में एक महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया। द लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्राइनोलॉजी की एक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ आयोग ने मोटापे को केवल BMI के आधार पर परिभाषित करने के बजाय शरीर में अतिरिक्त चर्बी और उसके स्वास्थ्य पर वास्तविक प्रभाव को अधिक महत्व देने की सिफारिश की। इस दृष्टिकोण में मोटापे की दो अलग स्थितियों पर जोर दिया गया। पहली स्थिति में व्यक्ति के शरीर में अतिरिक्त चर्बी मौजूद है, लेकिन अभी उसके अंगों की कार्यक्षमता या रोजमर्रा की जिंदगी पर स्पष्ट बीमारी का असर नहीं पड़ा है।
दूसरी स्थिति में अतिरिक्त चर्बी पहले से शरीर के अंगों के काम, सांस लेने, हृदय, चयापचय, जोड़ों या दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर रही है।
पहली स्थिति को भविष्य के जोखिम की अवस्था और दूसरी को सक्रिय बीमारी की अवस्था के रूप में देखा जा सकता है। इस सोच का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि केवल एक संख्या देखकर किसी व्यक्ति को मोटा या स्वस्थ घोषित करना पर्याप्त नहीं है।
फिर इस पुराने सूचकांक को हटाया क्यों नहीं जाता?
क्योंकि यह बहुत उपयोगी है। मान लीजिए किसी देश को दस करोड़ लोगों में मोटापे की स्थिति जाननी है। हर व्यक्ति की शरीर की चर्बी मापने के लिए अत्याधुनिक जांच कराना असंभव होगा।
लेकिन वजन और लंबाई मापना आसान है। बड़ी आबादी में इस सूचकांक के बढ़ने के साथ मधुमेह, हृदय रोग और समय से पहले मृत्यु के जोखिम का सांख्यिकीय संबंध भी दिखाई देता है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए यह आज भी उपयोगी है। समस्या तब पैदा होती है जब आबादी के लिए बनाया गया एक सरल सांख्यिकीय उपकरण किसी एक व्यक्ति के लिए अंतिम चिकित्सकीय निर्णय बन जाता है।
यानी इसे खत्म करने की जरूरत नहीं है। इसे सही जगह पर रखने की जरूरत है।
डॉक्टर को वजन के अलावा और क्या देखना चाहिए?
किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य का बेहतर मूल्यांकन करने के लिए चिकित्सक कमर का घेरा, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, दीर्घकालीन रक्त शर्करा का संकेत, वसा संबंधी जांच, यकृत की स्थिति, नींद, शारीरिक सक्रियता, दवाओं और पारिवारिक इतिहास को देख सकता है। कुछ मामलों में शरीर की बनावट की जांच भी की जा सकती है। विशेष परिस्थितियों में शरीर की चर्बी और मांसपेशियों की मात्रा जानने के लिए विशेष जांच उपलब्ध हैं। लेकिन हर व्यक्ति को ऐसी महंगी जांच की जरूरत नहीं होती। व्यावहारिक रूप से वजन, लंबाई, कमर का घेरा, रक्तचाप, रक्त शर्करा और रक्त में वसा की मात्रा मिलकर अकेले BMI से कहीं बेहतर तस्वीर दे सकते हैं।
मोटापा केवल ज्यादा खाने की कहानी नहीं है
मोटापे के बारे में सबसे पुरानी धारणाओं में से एक यह रही है कि यह केवल ज्यादा खाने और कम व्यायाम करने का परिणाम है। आधुनिक विज्ञान इसे कहीं अधिक जटिल मानता है। आनुवंशिकी, मस्तिष्क की भूख नियंत्रित करने वाली प्रणाली, हार्मोन, भोजन का वातावरण, नींद, तनाव, मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक सक्रियता, सामाजिक परिस्थितियां और आर्थिक स्थिति, ये सभी वजन बढ़ने में भूमिका निभा सकते हैं।
कुछ दवाएं, हार्मोन संबंधी बीमारियां, लंबे समय तक बैठे रहने की आदत और कुछ आनुवंशिक स्थितियां भी वजन बढ़ा सकती हैं। इसलिए ‘कम खाइए और ज्यादा चलिए’ ऊर्जा संतुलन के बुनियादी सिद्धांत को समझाता है, लेकिन मोटापे के पूरे कारण और उपचार को नहीं।
शरीर में अतिरिक्त चर्बी करती क्या है?
मोटापे का सबसे स्पष्ट प्रभाव मेटाबोलिज्म तंत्र पर पड़ता है। विशेष रूप से पेट के भीतर जमा अतिरिक्त चर्बी शरीर में इंसुलिन के प्रभाव को कम कर सकती है। शरीर को रक्त में शर्करा नियंत्रित रखने के लिए अधिक इंसुलिन बनाना पड़ता है। समय के साथ यह स्थिति पूर्व-मधुमेह और फिर दूसरे प्रकार के मधुमेह में बदल सकती है। मोटापा उच्च रक्तचाप, रक्त में वसा की असामान्य मात्रा और धमनियों की बीमारी से भी जुड़ा है। इससे हृदयाघात और मस्तिष्काघात का खतरा बढ़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2021 में अधिक शरीर भार से जुड़े गैर-संचारी रोगों के कारण लगभग 37 लाख मौतों का अनुमान था।
अतिरिक्त शरीर चर्बी का असर लीवर पर भी पड़ सकता है। लीवर में चर्बी जमा होने से चयापचय संबंधी वसायुक्त यकृत रोग विकसित हो सकता है। कुछ लोगों में आगे चलकर सूजन और लीवर में स्थायी क्षति तक हो सकती है। मोटापे में नींद के दौरान सांस रुकने की बीमारी भी अधिक सामान्य होती है। इससे दिन में थकान, रक्तचाप और हृदय संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। घुटनों, कूल्हों और रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव पड़ने से जोड़ संबंधी रोग और चलने-फिरने में परेशानी बढ़ सकती है। पित्त की पथरी, कुछ प्रजनन संबंधी समस्याएं और महिलाओं में अंडाशय से जुड़ी कुछ हार्मोन संबंधी स्थितियां भी अधिक वजन से जुड़ी हो सकती हैं। कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम भी शरीर में अतिरिक्त चर्बी के साथ बढ़ता पाया गया है। इनमें स्तन, गर्भाशय की अंदरूनी परत, बड़ी आंत, गुर्दे और अग्न्याशय से जुड़े कुछ कैंसर शामिल हैं।
इसका कारण केवल शरीर पर अतिरिक्त भार नहीं है। वसा ऊतक स्वयं हार्मोन और सूजन से जुड़े रसायनों की गतिविधि में भूमिका निभाता है। इसलिए अब वसा को केवल शरीर का ऊर्जा भंडार नहीं, बल्कि एक सक्रिय अंतःस्रावी ऊतक माना जाता है।
मोटापे से निपटने का सही तरीका क्या है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति के लिए कोई एक ‘आदर्श वजन’ नहीं होता।आधुनिक चिकित्सा का लक्ष्य केवल तराजू की संख्या कम करना नहीं है। लक्ष्य रक्तचाप, रक्त शर्करा, नींद, चलने की क्षमता, हृदय जोखिम, यकृत स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है।कई लोगों में शरीर के कुल वजन का पांच से दस प्रतिशत कम होना भी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण सुधार ला सकता है।इसलिए 100 किलोग्राम से 70 किलोग्राम तक पहुंचना ही उपचार की सफलता का एकमात्र प्रमाण नहीं है। यदि 100 किलोग्राम वजन वाला व्यक्ति पांच से दस किलोग्राम कम करता है और उसके रक्तचाप, रक्त शर्करा तथा यकृत की स्थिति में सुधार होता है, तो यह भी चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
भोजन में किसी चमत्कारी उपाय की जरूरत नहीं
वजन कम करने के लिए किसी एक चमत्कारी आहार की जरूरत नहीं है।ऐसा भोजन पैटर्न अधिक उपयोगी है जिसे लंबे समय तक अपनाया जा सके।सब्जियां, फल, दालें, साबुत अनाज, पर्याप्त प्रोटीन, मेवे और कम प्रसंस्कृत भोजन तृप्ति और पोषण में मदद कर सकते हैं।मीठे पेय, अत्यधिक मिठाइयां, बहुत तला भोजन और अत्यधिक ऊर्जा वाले अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को सीमित करना उपयोगी है।लेकिन किसी व्यक्ति को मधुमेह, गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था या कोई अन्य विशेष स्वास्थ्य समस्या हो तो भोजन योजना चिकित्सक या पोषण विशेषज्ञ की सलाह से तय करनी चाहिए।
व्यायाम केवल कैलोरी जलाने का साधन नहीं
शारीरिक सक्रियता का महत्व केवल वजन कम करने तक सीमित नहीं है। नियमित गतिविधि शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता, रक्तचाप, नींद और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर कर सकती है। यह वजन घटाते समय मांसपेशियों को बचाने में भी मदद करती है। तेज चलना, साइकिल चलाना, तैरना जैसी गतिविधियों के साथ मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम भी उपयोगी हो सकते हैं। वजन कम करते समय केवल भोजन बहुत कम कर देना सही तरीका नहीं है। इससे चर्बी के साथ मांसपेशियों की मात्रा भी घट सकती है। गंभीर मोटापे या जोड़ों की समस्या वाले व्यक्ति को शारीरिक गतिविधि धीरे-धीरे शुरू करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
नींद भी वजन को प्रभावित करती है
मोटापे से निपटने में नींद की भूमिका अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। कम या खराब नींद भूख और तृप्ति से जुड़े हार्मोनल संकेतों, तनाव और भोजन की पसंद को प्रभावित कर सकती है।
देर रात तक जागना और अनियमित दिनचर्या भोजन की मात्रा बढ़ा सकती है। यदि किसी व्यक्ति को सोते समय बार-बार सांस रुकने की समस्या है, तो केवल भोजन कम करने की सलाह पर्याप्त नहीं होगी। नींद से जुड़ी बीमारी की पहचान और उपचार भी जरूरी हो सकता है।
इसी तरह तनाव और भावनात्मक भोजन को समझना भी जरूरी है। कई लोग भूख के कारण नहीं, बल्कि चिंता, अकेलेपन, ऊब या तनाव के कारण खाते हैं। ऐसे मामलों में व्यवहार संबंधी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श उपयोगी हो सकते हैं।
वजन घटाने के बाद दोबारा वजन क्यों बढ़ जाता है?
वजन कम होने के बाद शरीर कई जैविक बदलाव करता है। भूख बढ़ सकती है और शरीर की ऊर्जा खर्च करने की क्षमता कुछ कम हो सकती है। शरीर पुराने वजन की ओर लौटने की कोशिश कर सकता है। इसी कारण बहुत से लोग सफलतापूर्वक वजन कम करने के बाद फिर वजन बढ़ा लेते हैं। इसे केवल अनुशासन की कमी समझना सही नहीं है। मोटापे को इसलिए लंबे समय तक चलने वाली और दोबारा लौट सकने वाली बीमारी के रूप में देखा जाता है। कई लोगों को वजन कम करने के बाद भी लंबे समय तक सहायता और निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।
मोटापे से लड़ाई केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं
यदि किसी शहर में पैदल चलने के सुरक्षित रास्ते नहीं हैं, स्कूलों के आसपास केवल अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन उपलब्ध है, स्वास्थ्यकर भोजन महंगा है, बच्चों के पास खेलने की जगह नहीं है और काम की प्रकृति पूरे दिन बैठे रहने वाली है, तो केवल व्यक्ति को दोष देना पर्याप्त नहीं है।
भोजन की उपलब्धता, खाद्य विज्ञापन, शहरी व्यवस्था, स्कूलों की भोजन नीति, शारीरिक गतिविधि के अवसर और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, ये सभी मोटापे की समस्या से जुड़े हैं। इसलिए समाधान केवल व्यक्ति की आदत बदलने में नहीं है। समाज और सरकार की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भारत की समस्या और जटिल है
भारत एक साथ कुपोषण और मोटापे दोनों से जूझ रहा है। एक ही परिवार में कोई बच्चा पोषण की कमी से प्रभावित हो सकता है, जबकि उसी परिवार का कोई वयस्क पेट के मोटापे और मधुमेह से जूझ रहा हो।शहरीकरण, कम शारीरिक गतिविधि, अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन की बढ़ती उपलब्धता, नींद की कमी और दक्षिण एशियाई शरीर संरचना में पेट के भीतर चर्बी जमा होने की प्रवृत्ति भारत में जोखिम बढ़ाती है।
यही कारण है कि भारत के लिए केवल पश्चिमी देशों की वजन सीमा को हूबहू लागू करना पर्याप्त नहीं माना जाता।
‘स्वस्थ वजन’ की जगह ‘स्वस्थ शरीर’ को समझिए
किसी व्यक्ति का BMI 24 है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह पूरी तरह स्वस्थ है। यदि वह धूम्रपान करता है, रक्तचाप बहुत अधिक है, रक्त में शर्करा बढ़ी हुई है और दिनभर निष्क्रिय रहता है, तो केवल सामान्य वजन उसे स्वस्थ नहीं बना देता। दूसरी तरफ, किसी व्यक्ति का सूचकांक 27 हो सकता है, लेकिन वह नियमित रूप से सक्रिय हो, उसका रक्तचाप और रक्त शर्करा सामान्य हो तथा उसकी शारीरिक क्षमता अच्छी हो। इसका अर्थ यह नहीं कि अतिरिक्त पेट की चर्बी को नजरअंदाज कर दिया जाए। बल्कि इसका अर्थ यह है कि स्वास्थ्य का मूल्यांकन कई संकेतों को देखकर किया जाना चाहिए।
कमर का घेरा, मांसपेशियों की मात्रा, रक्तचाप, रक्त शर्करा, रक्त में वसा, नींद और शारीरिक क्षमता ये सभी स्वास्थ्य की तस्वीर को अधिक स्पष्ट बनाते हैं।
यदि आपका सूचकांक सामान्य है तो भी एक बात याद रखें
सामान्य संख्या देखकर पूरी तरह निश्चिंत होने की जरूरत नहीं है। यदि पेट की चर्बी अधिक है, कमर बढ़ रही है, रक्तचाप ऊंचा है या रक्त शर्करा बढ़ी हुई है तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। दूसरी तरफ यदि सूचकांक अधिक है तो भी केवल उसी संख्या के आधार पर घबराने की जरूरत नहीं है। बहुत मांसल खिलाड़ी, गर्भवती महिला, बच्चा, किशोर और बुजुर्ग व्यक्ति के लिए इसकी व्याख्या अलग हो सकती है।
यानी संख्या एक संकेत है, फैसला नहीं।
क्वेटेले ने लगभग दो सौ साल पहले एक सरल गणितीय सूत्र दिया था। आधुनिक चिकित्सा ने अब यह समझना शुरू किया है कि उस सूत्र की सीमा कहां तक है और उसके आगे शरीर की पूरी तस्वीर देखना क्यों जरूरी है। इसलिए अगली बार जब तराजू पर खड़े होकर कोई संख्या सामने आए, तो केवल यह मत पूछिए कि ‘मेरा वजन कितना है?’
यह भी पूछिए, मेरी कमर कितनी है, शरीर में चर्बी कहां जमा है, रक्तचाप कैसा है, रक्त शर्करा कैसी है, नींद कैसी है और मैं रोज कितना सक्रिय हूं?
क्योंकि स्वस्थ शरीर का फैसला केवल वजन से नहीं होता।


