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Cancer Ka Ilaj: कैंसर की नई गोली बनी उम्मीद की नई किरण, Daraxonrasib ने दोगुनी की मरीजों की जिंदगी
Daraxonrasib ने पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज (Cancer Ka Ilaj Kya Hai) में बड़ी उम्मीद जगाई है। जानें यह नई टारगेटेड दवा कैसे काम करती है, क्लीनिकल ट्रायल के नतीजे और भारत में कब तक उपलब्ध हो सकती है।
Cancer Ka Ilaj Kya Hai Daraxonrasib, Pancreatic Cancer Drug
Cancer Ka Ilaj Kya Hai: कैंसर के सबसे घातक रूपों में गिने जाने वाले ‘मेटास्टेटिक पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर’ के इलाज में एक बड़ी वैज्ञानिक सफलता सामने आई है। नई टारगेटेड दवा ‘Daraxonrasib’ ने फेज-3 क्लीनिकल ट्रायल में मरीजों की औसत जीवित रहने की अवधि को लगभग दोगुना कर दिया है। अध्ययन के अनुसार, जिन मरीजों को यह दवा दी गई, वे औसतन 13.2 महीने तक जीवित रहे, जबकि पारंपरिक कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों की औसत जीवित रहने की अवधि 6.7 महीने रही। यह परिणाम अमेरिका की प्रमुख कैंसर संस्था ‘एएससीओ’ की सालाना बैठक में प्रस्तुत किए गए और साथ ही न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित हुए।
विशेषज्ञ इस उपलब्धि को पिछले कई दशकों में पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण प्रगति में से एक मान रहे हैं। हालांकि यह दवा अभी पूरी तरह स्वीकृत इलाज नहीं बनी है और नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रही है।
क्या है Daraxonrasib?
Daraxonrasib एक पहली श्रेणी (First-in-Class) की टारगेटेड थेरेपी है। यह एक RAS (ON) Multi-selective Inhibitor है, यानी यह उन आरएएस प्रोटीनों को निशाना बनाती है जो सक्रिय अवस्था (ON State) में कैंसर सेल्स की अनियंत्रित वृद्धि के लिए जिम्मेदार होते हैं। पैंक्रियाटिक कैंसर के लगभग 90 प्रतिशत मामलों में केआएएएस या अन्य आरएएस जीन में म्यूटेशन पाया जाता है। लंबे समय तक वैज्ञानिक इन म्यूटेशन को ऐसी जैविक संरचना मानते थे जिस पर प्रभावी दवा बनाना बेहद कठिन था। Daraxonrasib इसी चुनौती को पार करने की कोशिश करती है।
यह दवा काम कैसे करती है?
सामान्य तौर पर कैंसर कोशिकाओं में आरएएस प्रोटीन लगातार "ऑन" रहता है, जिससे सेल्स बिना रुके बढ़ते रहते हैं। Daraxonrasib इस एक्टिव आरएएस सिग्नलिंग को रोकती है। जब यह रास्ता अवरुद्ध हो जाता है तो कैंसर सेल्स की वृद्धि धीमी पड़ जाती है, कई सेल्स नष्ट होने लगते हैं और ट्यूमर का आकार घट सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह केवल एक विशेष केआरएएस म्यूटेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि कई प्रकार के आरएएस म्यूटेशन पर प्रभाव डालने के लिए विकसित की गई है। यही इसकी सबसे बड़ी वैज्ञानिक विशेषता मानी जा रही है।
पुरानी कीमोथेरेपी से कैसे अलग है?
पारंपरिक कीमोथेरेपी तेजी से मल्टीप्लाई होने वाली लगभग सभी सेल्स पर हमला करती है। इसी कारण बाल झड़ना, संक्रमण, उल्टी, कमजोरी और रक्त कोशिकाओं की कमी जैसे दुष्प्रभाव आम होते हैं। Daraxonrasib का तरीका अलग है। यह सीधे कैंसर की वृद्धि कराने वाले आरएएस सिग्नल को निशाना बनाती है। इसलिए इसे तारगेटेड थेरेपी कहा जाता है। फेज-3 अध्ययन में पाया गया कि इस दवा से गंभीर (ग्रेड 3 या उससे अधिक) दुष्प्रभाव कीमोथेरेपी की तुलना में कम थे। सबसे सामान्य दुष्प्रभाव त्वचा पर चकत्ते थे, जिन्हें अधिकांश मामलों में नियंत्रित किया जा सका। साथ ही मरीजों ने दर्द कम होने और जीवन की गुणवत्ता बेहतर रहने की भी सूचना दी।
क्लीनिकल ट्रायल में क्या नतीजे मिले?
आरए सोल्यूट (RASolute 302) नामक अंतरराष्ट्रीय फेज-3 ट्रायल में लगभग 500 मरीजों को शामिल किया गया था। ये सभी ऐसे मरीज थे जिनका मेटास्टेटिक पैंक्रियाटिक कैंसर पहली कीमोथेरेपी के बाद भी बढ़ रहा था। अध्ययन में पाया गया कि मरीजों की औसत जीवित रहने की अवधि 6.7 महीने से बढ़कर 13.2 महीने हो गई। बीमारी दोबारा बढ़ने का समय भी लगभग दोगुना हुआ। लगभग 32 प्रतिशत मरीजों में ट्यूमर का आकार स्पष्ट रूप से घटा, जबकि कीमोथेरेपी समूह में यह दर करीब 11 प्रतिशत रही। मृत्यु का जोखिम लगभग 60 प्रतिशत तक कम देखा गया।
क्या यह सभी कैंसर मरीजों के लिए है?
फिलहाल Daraxonrasib का अध्ययन मुख्य रूप से पहले से उपचार प्राप्त कर चुके मेटास्टेटिक पैंक्रियाटिक डक्टल एडेनोकार्सिनोमा (PDAC) के मरीजों में किया गया है। हालांकि वैज्ञानिक अब इसे फेफड़े, कोलोरेक्टल (बड़ी आंत) और अन्य आरएएस-म्यूटेशन वाले कैंसरों में भी परख रहे हैं। यदि आगे के अध्ययन सफल रहते हैं तो भविष्य में इसका उपयोग कई अन्य कैंसरों में भी बढ़ सकता है।
Daraxonrasib को अभी कैंसर का स्थायी इलाज भी नहीं कहा जा सकता। यह मरीजों की जीवन अवधि बढ़ाने, बीमारी की प्रगति धीमी करने और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण सफलता दिखा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय के साथ कैंसर कोशिकाओं में इस दवा के प्रति प्रतिरोध भी विकसित हो सकता है। इसलिए भविष्य में इसे इम्यूनोथेरेपी, सर्जरी या अन्य तारगेटेड दवाओं के साथ मिलाकर उपयोग करने पर भी शोध चल रहा है।
भारत में यह दवा कब तक उपलब्ध हो सकती है?
फिलहाल Daraxonrasib अभी प्रायोगिक दवा है और इसे अमेरिका, यूरोप या भारत में नियमित उपयोग के लिए अंतिम नियामकीय मंजूरी नहीं मिली है। यदि अमेरिकी एफडीए और अन्य नियामक एजेंसियां अगले एक-दो वर्षों में इसे मंजूरी देती हैं, तो उसके बाद भारत में दवा नियंत्रक महानियंत्रक के समक्ष अनुमोदन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। सामान्य परिस्थितियों में किसी नई कैंसर दवा के भारत पहुंचने में लगभग 1 से 3 वर्ष का समय लग सकता है, हालांकि यह नियामकीय मंजूरी, मूल्य निर्धारण और भारतीय क्लीनिकल डेटा की आवश्यकताओं पर निर्भर करेगा। फिलहाल भारत में इसकी उपलब्धता की कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की गई है।
क्या यह गेम-चेंजर साबित हो सकती है?
ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार Daraxonrasib ने ऐसे कैंसर में उम्मीद जगाई है, जहां पिछले कई वर्षों से उपचार विकल्प सीमित थे। इसके परिणामों को "लैंडस्केप-चेंजिंग" और "नई दिशा देने वाला" बताया गया है लेकिन किसी भी नई दवा की तरह इसकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता, सुरक्षा और वास्तविक दुनिया के परिणामों का आकलन अभी बाकी है। यदि आगे के अध्ययन भी इतने ही सकारात्मक रहते हैं, तो Daraxonrasib न केवल पैंक्रियाटिक कैंसर बल्कि आरएएस म्यूटेशन से जुड़े कई अन्य कैंसरों के इलाज में भी एक नया मानक स्थापित कर सकती है। फिलहाल इसे कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है।


