बाल कैंसर से जंग जीतकर फिर स्कूल पहुंचे बच्चे, नोएडा चाइल्ड PGI के आंकड़ों में 359 ने पूरा किया इलाज

Childhood Cancer Awareness Month: नोएडा चाइल्ड PGI में 2017 से अगस्त 2026 तक कैंसर से पीड़ित 1,451 बच्चे भर्ती हुए, जिनमें 359 ने उपचार पूरा किया। जानिए बाल कैंसर के इलाज, फॉलोअप और स्कूल वापसी की चुनौतियां।

Newstrack Network
Published on: 26 Sept 2026 3:17 AM IST
Child Cancer Awareness
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Child Cancer Awareness (Image Credit-Social Media)

नोएडा। कैंसर का नाम सुनते ही अक्सर बीमारी, अस्पताल और अनिश्चित भविष्य की तस्वीर सामने आती है, लेकिन बाल कैंसर की कहानी केवल इतनी नहीं है। नोएडा के चाइल्ड PGI में ऐसे सैकड़ों बच्चे हैं जिन्होंने महीनों तक कीमोथेरेपी, जांच, अस्पताल में भर्ती रहने और संक्रमण के खतरे के बीच बीमारी का सामना किया और अब फिर स्कूल, किताबों और अपने पुराने सपनों की तरफ लौट रहे हैं। उपलब्ध अस्पताल आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 से अगस्त 2026 तक यहां कैंसर से पीड़ित 1,451 बच्चे भर्ती हुए और इनमें 359 बच्चों ने उपचार पूरा कर कैंसर से मुकाबले में महत्वपूर्ण पड़ाव पार किया। इन आंकड़ों को सीधे ‘359 बच्चे हमेशा के लिए कैंसर मुक्त हो गए’ के अर्थ में नहीं पढ़ना चाहिए, क्योंकि कैंसर उपचार के बाद भी कई वर्षों तक नियमित फॉलोअप आवश्यक होता है। फिर भी अस्पताल से उपचार पूरा करके स्कूल और सामान्य जीवन की तरफ लौटते ये बच्चे बाल कैंसर के बारे में उस पुरानी धारणा को तोड़ते हैं कि बच्चे में कैंसर का अर्थ लगभग निश्चित मृत्यु है।

सितंबर दुनिया भर में Childhood Cancer Awareness Month यानी बाल कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल कैंसर के लक्षणों के प्रति जागरूकता पैदा करना नहीं, बल्कि समय पर सही जांच, विशेषज्ञ उपचार, दवाओं की उपलब्धता, उपचार बीच में न छूटने देना और बीमारी से उबर चुके बच्चों को सामान्य जीवन में वापस लाने पर भी ध्यान देना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम तथ्यपत्र के अनुसार दुनिया में हर वर्ष 0 से 19 वर्ष के करीब चार लाख बच्चों और किशोरों में कैंसर विकसित होने का अनुमान है। इनमें ल्यूकेमिया, मस्तिष्क के ट्यूमर, न्यूरोब्लास्टोमा, विल्म्स ट्यूमर, लिम्फोमा और हड्डियों के कैंसर प्रमुख हैं।

कैंसर ने पढ़ाई रोकी, सपने नहीं

बाल कैंसर की सबसे कठिन वास्तविकताओं में से एक यह है कि बीमारी केवल बच्चे के शरीर को प्रभावित नहीं करती। जिस उम्र में बच्चा स्कूल जाता है, दोस्त बनाता है, खेलता है और धीरे-धीरे अपनी दुनिया समझ रहा होता है, उसी समय कैंसर का उपचार उसकी पूरी दिनचर्या बदल सकता है। बार-बार अस्पताल जाना, लंबे समय तक भर्ती रहना, कीमोथेरेपी के चक्र, कमजोरी, संक्रमण से बचाव और कभी-कभी ऑपरेशन या दूसरी चिकित्सा प्रक्रियाओं के कारण महीनों तक स्कूल छूट सकता है। बच्चा उपचार पूरा कर लेता है, लेकिन उसके सामने अगली चुनौती अपने सहपाठियों और पढ़ाई की उस दुनिया में वापस पहुंचने की होती है जो इस बीच आगे बढ़ चुकी होती है।

यही कारण है कि बाल कैंसर के आधुनिक उपचार में केवल ट्यूमर खत्म करना पर्याप्त नहीं माना जाता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैंसर से पीड़ित बच्चे की शारीरिक और मानसिक वृद्धि, पोषण तथा उपचार के बाद होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों पर भी विशेष ध्यान आवश्यक है और इसके लिए बहुविषयक चिकित्सा दल की जरूरत होती है। उपचार पूरा करने वाले बच्चों की कैंसर की पुनरावृत्ति और उपचार के संभावित दीर्घकालिक प्रभावों के लिए आगे भी निगरानी की जानी चाहिए। इसलिए बच्चे का दोबारा किताब उठाना केवल शिक्षा में वापसी नहीं, उसके सामान्य बचपन की वापसी का भी संकेत है।

नोएडा चाइल्ड PGI में 1,451 बच्चों का इलाज

नोएडा के चाइल्ड PGI में वर्ष 2017 से अगस्त 2026 तक कैंसर के 1,451 बच्चों के भर्ती होने और 359 के उपचार पूरा करने के अस्पताल संबंधी आंकड़े इस दिशा में संस्थान की भूमिका दिखाते हैं। संस्थान के ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. नीता राधाकृष्णन के अनुसार बच्चों के कैंसर उपचार के लिए यहां बोन मैरो ट्रांसप्लांट इकाई, आधुनिक पैथोलॉजी प्रयोगशाला और बाल चिकित्सा सहित विभिन्न विभागों का सहयोग उपलब्ध है। बाल कैंसर का इलाज इसी तरह की संयुक्त व्यवस्था की मांग करता है, क्योंकि बच्चे को केवल कैंसर विशेषज्ञ की नहीं बल्कि जरूरत के अनुसार संक्रमण नियंत्रण, रक्त और रक्त उत्पाद, पोषण, गहन चिकित्सा, पैथोलॉजी और दूसरी विशेषज्ञ सेवाओं की भी आवश्यकता पड़ सकती है।

यहां उपलब्ध आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय सावधानी भी जरूरी है। 1,451 भर्ती बच्चों में 359 द्वारा उपचार पूरा करने से लगभग 24.7 प्रतिशत का अनुपात निकलता है, लेकिन इसे चाइल्ड PGI की ‘कैंसर सर्वाइवल दर 24.7 प्रतिशत’ कहना गलत होगा। अस्पताल में भर्ती कुल बच्चों में कुछ अभी उपचाराधीन हो सकते हैं, कुछ का उपचार दूसरे केंद्रों में जारी हो सकता है, कुछ फॉलोअप में हो सकते हैं और अलग-अलग वर्षों में भर्ती बच्चों की निगरानी अवधि भी अलग होगी। कैंसर की वास्तविक जीवित रहने की दर निकालने के लिए निदान, कैंसर के प्रकार, उपचार पूरा होने और निर्धारित अवधि—आमतौर पर पांच वर्ष—तक परिणामों का व्यवस्थित अनुगमन आवश्यक होता है। इसलिए 359 को उपचार पूरा करने वाले बच्चों की संख्या के रूप में ही समझना अधिक वैज्ञानिक है।

बच्चों में कैंसर दुर्लभ जरूर, लेकिन अक्सर उपचार संभव

बच्चों के कैंसर और वयस्कों के कैंसर में एक बुनियादी अंतर है। वयस्कों में तंबाकू, शराब, मोटापा और कुछ पर्यावरणीय जोखिम कैंसर के बड़े कारण हो सकते हैं, जबकि बच्चों में अधिकांश कैंसर का स्पष्ट रोके जा सकने वाला कारण नहीं मिलता। WHO के अनुसार सामान्यतः बाल कैंसर को जीवनशैली बदलकर रोका या आबादी स्तर पर स्क्रीनिंग से शुरुआती अवस्था में खोजा नहीं जा सकता। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार करीब 10 प्रतिशत बच्चों में कैंसर के प्रति आनुवंशिक प्रवृत्ति हो सकती है। इसलिए किसी बच्चे के कैंसर के लिए माता-पिता की जीवनशैली या देखभाल को दोष देना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बाल कैंसर के अनेक प्रकार उपचार योग्य हैं। सही निदान होने पर कीमोथेरेपी, सर्जरी, रेडियोथेरेपी और कुछ स्थितियों में स्टेम सेल या बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसे उपचार इस्तेमाल किए जाते हैं। WHO के अनुसार जहां व्यापक और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध हैं, वहां 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों का कैंसर ठीक किया जा सकता है, लेकिन अधिकांश निम्न और मध्यम आय वाले देशों में यह अनुपात 30 प्रतिशत से कम है। इस भारी अंतर की वजह केवल महंगी आधुनिक तकनीक नहीं है, बल्कि देर से निदान, गलत निदान, उपचार तक पहुंच न होना, इलाज बीच में छोड़ देना, उपचार की विषाक्तता से मृत्यु और बीमारी की पुनरावृत्ति जैसे कारण भी हैं।

दुनिया के चार लाख बच्चों के सामने हर साल यही लड़ाई

WHO का अनुमान है कि हर वर्ष दुनिया में करीब चार लाख बच्चों और किशोरों को कैंसर होता है। लगभग नौ में से आठ-नौ बच्चे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं, जहां समय पर निदान और पूरा उपचार मिलने की संभावना अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसी असमानता को कम करने के लिए WHO ने 2018 में St. Jude Children’s Research Hospital के सहयोग से Global Initiative for Childhood Cancer शुरू की थी, जिसका लक्ष्य 2030 तक दुनिया भर में बाल कैंसर की जीवित रहने की दर कम से कम 60 प्रतिशत तक पहुंचाना है।

इसी सप्ताह, 22 सितंबर 2026 को WHO ने पहली बार 194 देशों के लिए एक समान पद्धति पर आधारित बाल और किशोर लिम्फॉइड ल्यूकेमिया की पांच वर्षीय जीवित रहने की तुलनीय जानकारी भी सार्वजनिक की है। नए आंकड़े बताते हैं कि उच्च आय वाले देशों में जीवित रहने की दर 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जबकि कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियों वाले क्षेत्रों में यह करीब 40 प्रतिशत तक रह सकती है। WHO का कहना है कि समय पर निदान, आवश्यक कैंसर दवाओं और गुणवत्तापूर्ण उपचार तक पहुंच इस अंतर को कम करने में निर्णायक है।

भारत में हर वर्ष करीब 50 हजार नए बाल कैंसर मामलों का अनुमान

भारत के लिए बाल कैंसर के बिल्कुल सटीक राष्ट्रीय आंकड़े निकालना अभी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि सभी क्षेत्रों में समान गुणवत्ता वाले जनसंख्या आधारित बाल कैंसर पंजीकरण उपलब्ध नहीं हैं। Indian Cancer Society के अनुसार देश में हर वर्ष 50 हजार से अधिक नए बाल कैंसर मामलों का अनुमान लगाया जाता है। इसी कारण केवल अस्पतालों में आए मरीजों की संख्या से देश में बीमारी का वास्तविक बोझ नहीं निकाला जा सकता।

भारत में बाल कैंसर पंजीकरण सुधारने की दिशा में भी काम हो रहा है। चेन्नई में देश की पहली समर्पित जनसंख्या आधारित बाल कैंसर रजिस्ट्री की रिपोर्ट में 2022-23 के दौरान कैंसर की घटना दर प्रति दस लाख बच्चों में 136 दर्ज की गई। रजिस्ट्री में शामिल सभी बच्चों की दो वर्षीय जीवित रहने की दर करीब 60 प्रतिशत और जिन बच्चों की विस्तृत उच्च गुणवत्ता वाली जानकारी उपलब्ध थी उनमें करीब 70 प्रतिशत रही। ये चेन्नई के आंकड़े हैं, इसलिए इन्हें पूरे भारत की जीवित रहने की दर नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि व्यवस्थित निदान, उपचार और निगरानी उपलब्ध होने पर भारत में भी परिणाम काफी बेहतर हो सकते हैं।

सबसे बड़ी चुनौती—इलाज शुरू करना ही नहीं, पूरा कराना भी

बाल कैंसर में उपचार कई महीने और कुछ मामलों में वर्षों तक चल सकता है। परिवार को बार-बार अस्पताल आना पड़ता है, माता-पिता में से किसी एक को काम छोड़ना पड़ सकता है, दूसरे बच्चों की देखभाल प्रभावित होती है और यात्रा, रहने तथा भोजन का खर्च भी जुड़ता जाता है। गरीब या दूरदराज परिवारों के लिए बीमारी का आर्थिक बोझ इतना अधिक हो सकता है कि बच्चा चिकित्सकीय रूप से ठीक हो सकने की स्थिति में होने के बावजूद उपचार अधूरा छोड़ दे। WHO ने भी निम्न और मध्यम आय वाले देशों में उपचार छोड़ देने को बाल कैंसर से होने वाली टाली जा सकने वाली मौतों के महत्वपूर्ण कारणों में रखा है।

इसलिए किसी अस्पताल की बाल कैंसर व्यवस्था की गुणवत्ता केवल कीमोथेरेपी उपलब्ध होने से नहीं मापी जा सकती। सही पैथोलॉजी, आवश्यक दवाएं, संक्रमण का उपचार, सुरक्षित रक्त उत्पाद, गहन चिकित्सा सुविधा, पोषण, दर्द नियंत्रण, मानसिक-सामाजिक सहयोग और परिवार को उपचार जारी रखने में मदद—ये सभी इलाज के हिस्से हैं। WHO भी बच्चों के लिए विशेष बहुविषयक देखभाल और मनोसामाजिक तथा सहायक उपचार को व्यापक कैंसर सेवा का आवश्यक हिस्सा मानता है।

कैंसर ठीक हुआ तो स्कूल वापसी भी उपचार का हिस्सा

कैंसर से उबर चुके बच्चे के लिए स्कूल लौटना सामान्य जीवन की तरफ सबसे महत्वपूर्ण कदमों में है। लंबे इलाज के बाद उसकी पढ़ाई अपने साथियों से पीछे हो सकती है, बाल झड़ने या शारीरिक बदलाव के कारण आत्मविश्वास प्रभावित हो सकता है, संक्रमण के डर से माता-पिता उसे सामाजिक गतिविधियों से दूर रख सकते हैं और कुछ उपचारों के बाद थकान, ध्यान या सीखने की क्षमता पर भी अस्थायी अथवा दीर्घकालिक असर हो सकता है। यही वजह है कि कैंसर से उबरने के बाद बच्चे की जरूरत केवल मेडिकल फॉलोअप नहीं रहती।

स्कूल, शिक्षक और परिवार यदि मिलकर धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई की कमी पूरी करें, जरूरत होने पर अतिरिक्त शैक्षिक सहयोग दें और सहपाठियों को संवेदनशील बनाएं तो बच्चे के लिए वापसी आसान हो सकती है। उसे लगातार ‘कैंसर वाला बच्चा’ मानकर अलग करना भी उचित नहीं है। चिकित्सकीय रूप से जब स्कूल जाना सुरक्षित हो जाए तो उसकी शिक्षा, खेल और सामाजिक संबंध सामान्य बनाने का प्रयास उसके पुनर्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

‘हौसले से कैंसर हारा’ प्रेरक है, लेकिन इलाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

इन बच्चों की कहानियों में हौसला और परिवार का सहयोग असाधारण महत्व रखते हैं, लेकिन चिकित्सकीय दृष्टि से यह कहना कि केवल ‘सकारात्मक सोच’ या ‘हौसले’ से कैंसर ठीक हो गया, सही नहीं होगा। मनोवैज्ञानिक सहयोग बच्चे को कठिन उपचार सहने, अस्पताल की चिंता कम करने, दवा और उपचार की प्रक्रिया जारी रखने तथा जीवन की गुणवत्ता बेहतर रखने में मदद कर सकता है, लेकिन कैंसर को नियंत्रित या समाप्त करने का काम प्रमाणित चिकित्सा उपचार करता है। इसलिए बीमारी से संघर्ष कर रहे बच्चे या परिवार पर यह मानसिक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए कि पर्याप्त सकारात्मक न रहने से इलाज खराब होगा।

बाल कैंसर के मामले में आशा की सबसे मजबूत वजह वास्तव में आधुनिक चिकित्सा की सफलता है। दुनिया के समृद्ध स्वास्थ्य तंत्रों में 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों का ठीक होना बताता है कि बहुत से बाल कैंसर उपचार योग्य हैं। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे का जन्म या परिवार की आर्थिक स्थिति यह तय न करे कि उसे जीवित रहने का कितना अवसर मिलेगा।

किन संकेतों पर बच्चे की जांच में देर न करें

बच्चों में अधिकांश बुखार, कमजोरी, दर्द या गांठ कैंसर के कारण नहीं होते, इसलिए हर सामान्य बीमारी को कैंसर समझना भी उचित नहीं है। लेकिन लंबे समय तक बिना स्पष्ट कारण बुखार, असामान्य पीलापन और कमजोरी, आसानी से चोट के निशान या रक्तस्राव, लगातार बढ़ती गांठ, बिना कारण वजन घटना, लगातार हड्डियों में दर्द, सुबह के समय बार-बार सिरदर्द के साथ उल्टी, आंख में असामान्य सफेद चमक या लंबे समय तक बने रहने वाले अस्पष्ट लक्षणों की चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। बाल कैंसर के लिए सामान्य बच्चों की आबादी में कोई सार्वभौमिक स्क्रीनिंग कार्यक्रम प्रमाणित नहीं है, इसलिए समय पर लक्षण पहचानना और सही केंद्र तक रेफरल अधिक महत्वपूर्ण है। WHO भी स्पष्ट करता है कि बाल कैंसर को सामान्यतः जनसंख्या आधारित स्क्रीनिंग से पहचानने का उच्च गुणवत्ता वाला प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इलाज खत्म होने के बाद भी वर्षों तक जरूरी है निगरानी

कैंसर उपचार पूरा कर चुके बच्चे के लिए अस्पताल से छुट्टी कहानी का अंतिम अध्याय नहीं है। कुछ कैंसर दोबारा लौट सकते हैं और कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी या अन्य उपचारों के देर से दिखाई देने वाले प्रभाव हृदय, फेफड़ों, हार्मोन, वृद्धि, प्रजनन क्षमता, सुनने, सीखने या दूसरी शारीरिक प्रणालियों को प्रभावित कर सकते हैं। जोखिम हर बच्चे में समान नहीं होता और यह कैंसर के प्रकार, दवा, खुराक, रेडियोथेरेपी तथा उपचार के समय बच्चे की उम्र पर निर्भर करता है। इसीलिए WHO उपचार पूरा करने वाले बच्चों की लगातार निगरानी को आवश्यक मानता है।

नोएडा चाइल्ड PGI में उपचार पूरा कर चुके 359 बच्चों की कहानी इसी बड़े बदलाव का स्थानीय चेहरा है। इन बच्चों की सफलता को केवल अस्पताल से घर लौट आने तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी अगली परीक्षा स्कूल वापस जाने, छूटी पढ़ाई पूरी करने, शरीर और मन पर इलाज के प्रभाव से उबरने और वर्षों तक स्वस्थ बने रहने की है। बाल कैंसर जागरूकता माह का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी यही है कि कैंसर से पीड़ित बच्चा केवल एक मरीज नहीं है—वह एक विद्यार्थी, दोस्त, खिलाड़ी और भविष्य के सपने देखने वाला बच्चा भी है। कैंसर ने जिन हाथों से कुछ समय के लिए किताबें छुड़ा दी थीं, उन्हीं हाथों में किताबों का वापस आना उपचार की सबसे सुंदर उपलब्धियों में से एक है।

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