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Condom Ke Fayde: कंडोम सिर्फ गर्भधारण से बचाने के लिए नहीं है, इसकी असली कहानी क्या है?
Condom Ke Fayde Kya Hai: कंडोम का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसका इस्तेमाल सिर्फ गर्भनिरोध के लिए नहीं, बल्कि यौन संचारित संक्रमणों से बचाव के लिए भी होता रहा है। जानिए कंडोम कैसे विकसित हुआ, HIV और STI से यह कैसे सुरक्षा देता है, कौन-सी सामग्री बेहतर है और सही इस्तेमाल क्यों बेहद जरूरी है।
Condom Ke Fayde Kya Hai Condom History in Hindi
Condom Ke Fayde Kya Hai: कंडोम को अक्सर सिर्फ अनचाहे गर्भ से बचने के एक साधारण उपाय के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इसकी असली कहानी कहीं ज्यादा पुरानी, दिलचस्प और महत्वपूर्ण है, यह हजारों साल के इतिहास, कई जानलेवा बीमारियों से बचाव और एक लंबी वैज्ञानिक यात्रा का नतीजा है।
इतिहास की शुरुआत, बकरी के ब्लैडर से लेकर सिल्क तक
कंडोम का इतिहास हैरान करने वाली हद तक पुराना है, यह करीब 3000 ईसा पूर्व तक जाता है, जब इसे बकरी के ब्लैडर से बने एक साधारण, आंतरिक साधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। सदियों तक जानवरों की आंतों और खाल का इस्तेमाल इसी मकसद के लिए होता रहा। दिलचस्प बात यह है कि 1564 में इतालवी शरीर-रचना विज्ञानी गैब्रिएलो फैलोपियो ने इसका सबसे पहला दर्ज विवरण लिखा, जिसमें एक रिबन से बांधे गए लिनेन के कपड़े का जिक्र था, और इसका मकसद खासतौर पर सिफलिस (एक गंभीर यौन संचारित रोग) से बचाव करना था, न कि सिर्फ गर्भनिरोध।
पंद्रहवीं सदी के यूरोप में सिफलिस की एक भयंकर महामारी फैली हुई थी, और इसी वजह से इस दौर में कंडोम का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। यानी शुरुआत से ही, कंडोम का एक बड़ा मकसद सिर्फ गर्भनिरोध नहीं, बल्कि बीमारियों से बचाव भी रहा है।
चीन में कभी तेल लगे रेशमी कागज का इस्तेमाल होता था, तो जापान में कछुए के खोल जैसी कठोर सामग्री से बने आवरण चलन में थे। यह दिखाता है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, बिना एक-दूसरे से जुड़े, इंसानों ने अलग-अलग तरीकों से एक जैसी जरूरत को पूरा करने की कोशिश की, जो यह साबित करता है कि यह जरूरत कितनी सार्वभौमिक और पुरानी है।
रबर की क्रांति, और वह जंग जिसने सब कुछ बदल दिया
उन्नीसवीं सदी में एक बड़ा मोड़ आया, जब चार्ल्स गुडइयर ने रबर वल्कनाइजेशन (रबर को मजबूत और टिकाऊ बनाने की एक रासायनिक प्रक्रिया) का आविष्कार किया, जिससे पहली बार रबर से बना कंडोम बनाना मुमकिन हुआ। यह उस दौर के लिहाज से किफायती था, जिससे यह आम मजदूर वर्ग तक भी पहुंच पाया।
लेकिन दिलचस्प और थोड़ा दुखद इतिहास यहीं छिपा है, जिसका सीधा संबंध पहले विश्व युद्ध से है। युद्ध के दौरान जर्मनी अकेला बड़ा देश था जिसने अपने सैनिकों को आधिकारिक तौर पर कंडोम दिए, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन ने नैतिक आधार पर इसे रोके रखा। इसका नतीजा भयंकर रहा, अमेरिकी सेना हर दिन करीब अठारह हजार सक्षम सैनिकों को सिर्फ यौन संचारित बीमारियों की वजह से खो रही थी, और ब्रिटेन में भी करीब पांच प्रतिशत सैनिक इन्हीं बीमारियों की वजह से लड़ाई के लायक नहीं बचे थे, जब तक 1917 में सीमित वितरण शुरू नहीं हुआ। यानी सेनाओं ने अनैतिकता रोकने के लिए कंडोम बांटने से इनकार किया, लेकिन नतीजे में दुश्मन की गोली से भी ज्यादा सैनिक बीमारी से गंवा दिए।
इसी विनाशकारी सबक ने आगे चलकर सोच बदलने पर मजबूर किया, और 1920 के दशक में लिक्विड लेटेक्स के आविष्कार ने कंडोम को पूरी तरह बदल दिया, यह पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा पतला, मजबूत और लंबे समय तक टिकने वाला साबित हुआ। जहां पुराने रबर कंडोम सिर्फ तीन महीने चल पाते थे, वहीं लेटेक्स कंडोम की शेल्फ लाइफ पांच साल तक पहुंच गई।
अमेरिका में उसी दौर में एक अजीब कानूनी अड़चन भी थी, 1873 के "कॉमस्टॉक एक्ट" ने कंडोम और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी को अश्लील सामग्री घोषित कर दिया था, जिससे इसका खुला प्रचार और शिक्षा दशकों तक बाधित रही, भले ही इसकी बिक्री जारी रही।
आज कंडोम किन सामग्रियों से बनते हैं?
आज बाजार में मुख्य रूप से तीन तरह के कंडोम मिलते हैं, और हर एक की अपनी खासियत है।
लेटेक्स
यह आज भी सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली सामग्री है, क्योंकि यह बेहद लचीला, मजबूत और किफायती है। इसका इकलौता नुकसान यह है कि कुछ लोगों को लेटेक्स से एलर्जी होती है, जिससे खुजली, जलन या चकत्ते हो सकते हैं।
पॉलीयूरेथेन
यह लेटेक्स एलर्जी वाले लोगों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है। यह गंधहीन होता है, गर्मी को बेहतर तरीके से महसूस होने देता है, और लेटेक्स के मुकाबले पतला भी बनाया जा सकता है। इसे पिछले कई दशकों में कंडोम गर्भनिरोध और STI सुरक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी उन्नति माना जाता है।
पॉलीआइसोप्रीन
यह एक और नॉन-लेटेक्स विकल्प है, जो लेटेक्स जैसी प्राकृतिक लचक तो देता है, लेकिन इसमें लेटेक्स प्रोटीन नहीं होता, इसलिए यह एलर्जी वालों के लिए सुरक्षित माना जाता है।
एक बेहद जरूरी चेतावनी यह भी है, "लैम्बस्किन" (भेड़ की झिल्ली से बने) कंडोम, जो प्राकृतिक अहसास के लिए बेचे जाते हैं, वे गर्भनिरोध में तो कारगर हो सकते हैं, लेकिन इनमें सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जो शुक्राणु को तो रोक लेते हैं, लेकिन HIV और दूसरे यौन संचारित वायरस जितने बारीक कणों को रोकने में नाकाम रह सकते हैं। इसलिए अगर मकसद सिर्फ गर्भनिरोध नहीं, बल्कि बीमारियों से बचाव भी है, तो लेटेक्स, पॉलीयूरेथेन या पॉलीआइसोप्रीन ही सही विकल्प माने जाते हैं।
असली सुरक्षा, आंकड़े क्या कहते हैं?
अब आते हैं इस पूरे विषय के सबसे अहम हिस्से पर, कंडोम असल में कितना असरदार है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नियमित और सही तरीके से लेटेक्स कंडोम इस्तेमाल करने से HIV संक्रमण का खतरा करीब 85 प्रतिशत तक घट जाता है। एक और शोध बताता है कि कंडोम HIV, हेपेटाइटिस B और गोनोरिया के खिलाफ 90 प्रतिशत से भी ज्यादा सुरक्षा दे सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, लेटेक्स और पॉलीयूरेथेन कंडोम HIV और दूसरे यौन संचारित संक्रमणों के साथ-साथ अनचाहे गर्भ से भी "तिहरी सुरक्षा" देते हैं, क्योंकि यह पहनने वाले व्यक्ति और उसके साथी की त्वचा, म्यूकोसा (नम झिल्ली) और जननांग स्राव के बीच सीधे संपर्क को रोकता है, जिससे संक्रमण फैलने की मुख्य कड़ी ही टूट जाती है।
यह जानना जरूरी है कि कंडोम सिर्फ HIV तक सीमित नहीं, बल्कि यह जननांग हर्पीस, HPV संक्रमण (जो सर्वाइकल कैंसर से जुड़ा है), जननांग मस्से, सिफलिस, क्लैमाइडिया और ट्राइकोमोनिएसिस जैसी कई बीमारियों से भी सुरक्षा देता है, भले ही यह सुरक्षा हर बीमारी के लिए एक जैसे स्तर की न हो, क्योंकि त्वचा-से-त्वचा संपर्क से फैलने वाले संक्रमण (जैसे हर्पीस) में सुरक्षा थोड़ी कम प्रभावी होती है, जिस त्वचा हिस्से पर कंडोम नहीं होता।
सही इस्तेमाल, वह हिस्सा जो अक्सर नजरअंदाज होता है
यहां सबसे व्यावहारिक और जरूरी बात आती है, कंडोम की असली सुरक्षा सिर्फ इसे इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि इसे सही तरीके से इस्तेमाल करने में छिपी है। एक अध्ययन में पाया गया कि करीब चौबीस प्रतिशत लोगों ने पिछले एक महीने में कंडोम इस्तेमाल में कोई न कोई गलती की, और इन्हीं गलतियों की वजह से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, भले ही व्यक्ति खुद को "सुरक्षित" मान रहा हो।
सबसे आम गलतियां
- संबंध बनाने के बीच में कंडोम पहनना, या खत्म होने से पहले ही उतार देना
- सिरे पर वीर्य के लिए जगह न छोड़ना, जिससे दबाव बढ़ने पर वह फट सकता है
- कंडोम को उल्टा पहनकर फिर पलटकर इस्तेमाल करना
- इस्तेमाल से पहले उसकी एक्सपायरी या नुकसान की जांच न करना
- ऑयल-बेस्ड (तेल आधारित) लुब्रिकेंट का इस्तेमाल करना, जो लेटेक्स को कमजोर करके तोड़ सकता है
- गलत साइज का कंडोम इस्तेमाल करना, जिससे या तो वह फिसल जाए या फट जाए
एक अध्ययन में पाया गया कि 0.8 से 40.7 प्रतिशत तक (अलग-अलग अध्ययनों में यह आंकड़ा अलग रहा) लोगों ने कभी न कभी कंडोम फटने का अनुभव किया, जबकि सही तरीके से इस्तेमाल करने पर गर्भनिरोध की सफलता दर 98 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह फर्क साफ दिखाता है कि इस्तेमाल करना और सही तरीके से इस्तेमाल करना, इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सही तरीका यह है, संबंध शुरू होने से पहले ही कंडोम पहनें, सिरे को हल्के से दबाकर हवा निकालें और वीर्य के लिए जगह छोड़ें, पूरी लंबाई तक अच्छी तरह खोलें, और संबंध खत्म होने के तुरंत बाद, इससे पहले कि वह ढीला पड़े, आधार को पकड़कर सावधानी से बाहर निकालें, ताकि कोई रिसाव न हो। इसके अलावा कंडोम को हमेशा ठंडी, सूखी जगह पर रखें, क्योंकि गर्मी और नमी सामग्री को समय से पहले कमजोर कर सकती हैं।
भविष्य की तकनीक, ग्राफीन से लेकर नई खोजों तक
कंडोम की तकनीक आज भी लगातार विकसित हो रही है। इसमें सबसे दिलचस्प हालिया दिशाओं में से एक है ग्राफीन (कार्बन का एक बेहद पतला, मजबूत रूप) से बने कंडोम पर हो रहा शोध, जो पारंपरिक सामग्री के मुकाबले और भी पतला, मजबूत और बेहतर संवेदनशीलता देने का वादा करता है। इसके अलावा फीमेल कंडोम भी एक अहम खोज रही है, जो आज भी महिलाओं के हाथ में सीधा नियंत्रण देने वाला इकलौता उपलब्ध गर्भनिरोधक साधन है, जिसे साथी की सहमति के इंतजार के बिना भी खुद इस्तेमाल किया जा सकता है।
कंडोम तकनीक में अब दवा-युक्त सामग्री (जैसे कुछ खास दवाओं वाले स्पंज के साथ जुड़े कंडोम) पर भी शोध हो रहा है, जिसका मकसद सिर्फ बैरियर प्रोटेक्शन के साथ-साथ अतिरिक्त सुरक्षा या फायदे देना है। यह दिखाता है कि यह हजारों साल पुराना आविष्कार आज भी रुका नहीं है, बल्कि आधुनिक विज्ञान की मदद से लगातार और बेहतर होता जा रहा है।
कंडोम सिर्फ अनचाहे गर्भ से बचने का एक साधारण उपाय नहीं, बल्कि यह हजारों साल की मानवीय जरूरत, एक दर्दनाक ऐतिहासिक सबक (पहले विश्व युद्ध की सैन्य त्रासदी), और लगातार होते वैज्ञानिक सुधार का नतीजा है। यह गर्भनिरोध के साथ-साथ HIV सहित कई गंभीर यौन संचारित बीमारियों से भी असरदार सुरक्षा देता है, लेकिन यह सुरक्षा तभी पूरी तरह मिलती है जब इसे सही सामग्री में, सही तरीके से और लगातार इस्तेमाल किया जाए। इतिहास और विज्ञान, दोनों यही सिखाते हैं कि इस छोटी सी चीज को हल्के में लेना, कई बार बेहद भारी कीमत चुका सकता है।


