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Birth Control Pill History: बर्थ कंट्रोल पिल का इतिहास, किसने बनाई पहली गोली और कब मिली मंजूरी?
Birth Control Pill History: गर्भनिरोधक गोली कैसे बनी? जानिए मार्गरेट सेंगर के संघर्ष, कैथरीन मैककॉर्मिक की आर्थिक मदद, वैज्ञानिकों के योगदान और 1960 में मिली मंजूरी की पूरी कहानी।
Birth Control Pill History | Contraceptive Pill History in Hindi | Newstrack Hindi
Birth Control Pill History: आज गर्भनिरोधक (बर्थ कंट्रोल) गोली चिकित्सा विज्ञान की एक आम उपलब्धि है। इसका इस्तेमाल गर्भधारण रोकने के साथ-साथ माहवारी से जुड़ी कुछ समस्याओं को कंट्रोल करने के लिए भी किया जाता है। लेकिन करीब सात दशक पहले हालात बहुत अलग थे। महिलाओं के पास गर्भधारण पर नियंत्रण रखने के सुविधाजनक और भरोसेमंद साधन सीमित थे। कई जगह गर्भनिरोधक के बारे में जानकारी देना या उसे उपलब्ध कराना कानूनी और सामाजिक विवाद का विषय था।
ऐसे माहौल में एक महिला ने सवाल उठाया कि जब विज्ञान कई बीमारियों का इलाज खोज सकता है, तो महिलाओं को अनचाहे गर्भ से बचाने के लिए एक प्रभावी दवा क्यों नहीं बनाई जा सकती?
वह महिला थीं मार्गरेट सेंगर। उन्होंने खुद गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार नहीं किया, लेकिन इसके विकास के लिए लंबे समय तक अभियान चलाया, वैज्ञानिकों को शोध के लिए प्रेरित किया और आर्थिक मदद जुटाने में अहम भूमिका निभाई।
इस काम में कैथरीन डेक्स्टर मैककॉर्मिक ने भी बड़ा योगदान दिया। उन्होंने अपने निजी संसाधनों से शोध के लिए धन दिया। दूसरी ओर, जीवविज्ञानी ग्रेगरी पिंकस, चिकित्सक जॉन रॉक और कई रसायनज्ञों ने इस विचार को एक व्यावहारिक दवा में बदलने में मदद की।
मार्गरेट सेंगर: गर्भनिरोधक अधिकारों की आवाज
मार्गरेट सेंगर का जन्म 14 सितंबर 1879 को अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य में हुआ था। उन्होंने नर्सिंग का प्रशिक्षण लिया और गरीब तथा कामकाजी परिवारों की महिलाओं के बीच काम किया। उस दौर में कई महिलाओं को बार-बार गर्भधारण, प्रसव और असुरक्षित गर्भपात के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता था। गर्भधारण रोकने के तरीकों की सही जानकारी तक पहुँचना भी आसान नहीं था। सेंगर ने महसूस किया कि महिलाओं के स्वास्थ्य और आर्थिक स्वतंत्रता का गहरा संबंध इस बात से है कि वे कब और कितने बच्चे चाहती हैं। उन्होंने गर्भनिरोधक जानकारी उपलब्ध कराने को महिला अधिकारों का मुद्दा बनाया।
1914 में उन्होंने द वुमन रिबेल नाम की पत्रिका शुरू की और जन्म नियंत्रण के पक्ष में अभियान चलाया। इसी दौर में अंग्रेजी शब्द बर्थ कंट्रोल लोकप्रिय होने लगा।
16 अक्टूबर 1916 को सेंगर ने अपनी बहन एथेल बर्न और सहयोगी फानिया माइंडेल के साथ न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में अमेरिका का पहला जन्म नियंत्रण क्लिनिक खोला। पुलिस ने दस दिन बाद ही क्लिनिक बंद कर दिया और उनसे जुड़ी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया। सेंगर को भी जेल जाना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। उनका सपना ऐसी दवा विकसित कराने का था जिसे महिला खुद इस्तेमाल कर सके और जिसके लिए हर बार किसी उपकरण या यौन साथी की मदद पर निर्भर न रहना पड़े।
हालाँकि, सेंगर की विरासत का एक विवादास्पद पक्ष भी है। उन्होंने अपने समय के यूजेनिक्स आंदोलन की कुछ धारणाओं का समर्थन किया था। इस आंदोलन से जुड़े कई विचार गरीबों, दिव्यांग लोगों और अन्य समूहों के प्रति भेदभावपूर्ण थे। इसलिए उनके योगदान का मूल्यांकन करते समय महिला अधिकारों के लिए किए गए उनके संघर्ष के साथ-साथ इन विचारों की आलोचनात्मक समीक्षा भी जरूरी है।
कैथरीन मैककॉर्मिक: शोध के लिए धन जुटाने वाली महिला
गर्भनिरोधक गोली के विकास में कैथरीन डेक्स्टर मैककॉर्मिक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। वह जीवविज्ञान की पढ़ाई कर चुकी थीं, महिलाओं के मताधिकार का समर्थन करती थीं और महिला स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती थीं। उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी से जीवविज्ञान की पढ़ाई की थी। उनकी मुलाकात मार्गरेट सेंगर से 1917 में हुई। इसके बाद दोनों लंबे समय तक साथ काम करती रहीं।
1950 के दशक की शुरुआत में सेंगर ने मैककॉर्मिक को जीवविज्ञानी ग्रेगरी पिंकस के शोध के बारे में बताया। पिंकस प्रजनन और हार्मोन की भूमिका का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि हार्मोन की मदद से अंडोत्सर्जन को नियंत्रित करके गर्भधारण रोकने वाली गोली बनाई जा सकती है। लेकिन इस शोध के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था। गर्भनिरोधक पर काम करना उस समय सामाजिक रूप से विवादास्पद था, इसलिए कई संस्थान इसमें निवेश करने से हिचकते थे। मैककॉर्मिक ने अपने निजी संसाधनों से शोध के लिए करीब 20 लाख डॉलर दिए। उस समय यह बहुत बड़ी रकम थी। उन्होंने केवल धन ही नहीं दिया, बल्कि शोध की प्रगति में भी दिलचस्पी बनाए रखी।
गर्भनिरोधक गोली बनाने में किन वैज्ञानिकों का योगदान था?
गर्भनिरोधक गोली के विकास में ग्रेगरी पिंकस और स्त्रीरोग विशेषज्ञ जॉन रॉक की प्रमुख भूमिका थी। उनके साथ मिन चुएह चांग सहित कई अन्य वैज्ञानिकों ने भी काम किया। इस खोज की रासायनिक नींव रखने वालों में कार्ल जेरासी और फ्रैंक कोल्टन के नाम महत्वपूर्ण हैं। 1951 में कार्ल जेरासी और उनके सहयोगियों ने नोरेथिंड्रोन नाम का सिंथेटिक प्रोजेस्टिन तैयार किया। अगले वर्ष फ्रैंक कोल्टन ने नोरेथिनोड्रेल विकसित किया, जो पहली स्वीकृत गर्भनिरोधक गोली के विकास में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
प्रोजेस्टिन ऐसे सिंथेटिक पदार्थ होते हैं जिनकी क्रिया प्रोजेस्टेरोन नाम के प्राकृतिक हार्मोन जैसी होती है। वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि दवा को गोली के रूप में निगलने पर भी वह शरीर में प्रभावी बनी रहे। प्राकृतिक प्रोजेस्टेरोन को मुँह से लेने पर शरीर उसे इस तरह तोड़ सकता है कि उसका असर सीमित हो जाए। इसलिए ऐसे सिंथेटिक पदार्थों की जरूरत थी जो मुँह से लेने पर भी प्रभावी रहें। इन खोजों ने ऐसी हार्मोनल दवाएँ विकसित करना संभव बनाया जो अंडोत्सर्जन को रोककर गर्भधारण की संभावना कम कर सकती थीं।
गर्भनिरोधक गोली शरीर में कैसे काम करती है?
गर्भधारण की सामान्य प्रक्रिया में अंडाशय से अंडाणु निकलता है। इसे अंडोत्सर्जन या ओव्यूलेशन कहते हैं। इस प्रक्रिया को मस्तिष्क और अंडाशय के बीच होने वाले हार्मोनल संकेत नियंत्रित करते हैं। मस्तिष्क की हाइपोथैलेमस और पिट्यूटरी ग्रंथि इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती हैं। इनके संकेतों से एफएसएच और एलएच नाम के हार्मोन प्रभावित होते हैं। सामान्य मासिक चक्र में एलएच हार्मोन का तेज उछाल अंडोत्सर्जन शुरू करने में मदद करता है। संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिन होते हैं। ये हार्मोनल संकेतों को प्रभावित करते हैं, जिससे आम तौर पर अंडोत्सर्जन रुक जाता है।
प्रोजेस्टिन गर्भाशय ग्रीवा के म्यूकस को भी गाढ़ा करता है। इससे शुक्राणुओं के लिए गर्भाशय तक पहुँचना कठिन हो सकता है। गर्भाशय की अंदरूनी परत में भी बदलाव होते हैं। केवल प्रोजेस्टिन वाली गोलियाँ भी उपलब्ध हैं। इनका एक महत्वपूर्ण प्रभाव गर्भाशय ग्रीवा के म्यूकस को गाढ़ा करना है। कुछ प्रकार की गोलियाँ अंडोत्सर्जन को भी प्रभावी ढंग से रोकती हैं। यह समझना जरूरी है कि नियमित गर्भनिरोधक गोली गर्भपात कराने वाली दवा नहीं है। इसका उद्देश्य गर्भधारण को रोकना है, पहले से स्थापित गर्भावस्था को समाप्त करना नहीं।
गर्भनिरोधक को गैरकानूनी क्यों माना जाता था?
1873 में अमेरिका में कॉमस्टॉक अधिनियम लागू हुआ। इसके तहत डाक के जरिए कथित अश्लील सामग्री के साथ गर्भनिरोधक से जुड़ी कुछ वस्तुओं और जानकारियों के वितरण पर भी प्रतिबंध लगाया गया। उस समय गर्भनिरोधक के बारे में जानकारी को भी नैतिकता और अश्लीलता से जुड़े कानूनों के दायरे में रखा जाता था।
इसके पीछे धार्मिक मान्यताएँ, यौन संबंधों को लेकर सामाजिक धारणाएँ और महिलाओं की प्रजनन स्वतंत्रता का विरोध जैसे कई कारण थे। उस दौर में विवाह, मातृत्व और यौन संबंधों को लेकर समाज की अपेक्षाएँ आज से काफी अलग थीं।
यहाँ एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। 1960 में गर्भनिरोधक गोली को मंजूरी मिलने से पहले गर्भनिरोधक गोली को ही हर जगह एक अलग कानून के तहत गैरकानूनी घोषित नहीं किया गया था। उससे पहले गर्भनिरोधक जानकारी, साधनों के वितरण और उनके इस्तेमाल पर अलग-अलग कानूनों के जरिए प्रतिबंध लगाए जाते थे। नियम हर राज्य में एक जैसे नहीं थे।
1936 के एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले ने डॉक्टरों के लिए गर्भनिरोधक सामग्री हासिल करने और उससे जुड़ी चिकित्सा सेवाएँ देने में कुछ कानूनी बाधाएँ कम कीं। लेकिन इससे पूरे अमेरिका में गर्भनिरोधक के अधिकार तुरंत समान नहीं हो गए।
1965 में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने Griswold v. Connecticut मामले में विवाहित दंपतियों के गर्भनिरोधक इस्तेमाल पर राज्य के प्रतिबंध को असंवैधानिक ठहराया। 1972 में Eisenstadt v. Baird फैसले ने अविवाहित लोगों के लिए भी गर्भनिरोधक तक समान पहुँच के अधिकार को मजबूत किया।
शुरुआती परीक्षणों में सामने आईं गंभीर नैतिक समस्याएँ
गर्भनिरोधक गोली का विकास चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धि था, लेकिन इसके शुरुआती मानव परीक्षणों पर गंभीर सवाल भी उठे।
1950 के दशक में पिंकस और रॉक ने हार्मोनल गर्भनिरोधक दवाओं के परीक्षण किए। कुछ शुरुआती परीक्षण ऐसे संस्थानों में हुए जहाँ भाग लेने वाली महिलाओं की स्वतंत्र रूप से सहमति देने की क्षमता को लेकर सवाल थे। 1956 में प्यूर्टो रिको में बड़े पैमाने पर परीक्षण शुरू हुए। वहाँ कई गरीब महिलाओं को गर्भनिरोधक गोली दी गई। उस समय इस्तेमाल होने वाली गोलियों में हार्मोन की मात्रा आज की कई गोलियों की तुलना में काफी अधिक थी। इन परीक्षणों की आलोचना इस बात के लिए हुई कि महिलाओं को दवा के प्रयोगात्मक स्वरूप और संभावित दुष्प्रभावों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। कुछ महिलाओं ने मतली, सिरदर्द और दूसरी परेशानियों की शिकायत की।
आज चिकित्सा अनुसंधान में भाग लेने वाले लोगों की सूचित सहमति, जोखिमों की स्पष्ट जानकारी, स्वतंत्र नैतिक समीक्षा और दुष्प्रभावों की निगरानी को जरूरी माना जाता है। शुरुआती गर्भनिरोधक गोली परीक्षण इन आधुनिक मानकों पर खरे नहीं उतरते।
पहली गर्भनिरोधक गोली को कब मंजूरी मिली?
9 मई 1960 को अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने Enovid नाम की गोली को गर्भनिरोधक इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी। इसे जी.डी. सर्ल कंपनी ने विकसित किया था। इस दवा को इससे पहले माहवारी से जुड़ी कुछ समस्याओं के उपचार के लिए अनुमति मिल चुकी थी। लेकिन 1960 की मंजूरी ने इसे गर्भधारण रोकने के लिए उपलब्ध पहली व्यावसायिक मौखिक गर्भनिरोधक गोली बना दिया। यह चिकित्सा इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ था। महिलाओं को पहली बार ऐसा व्यापक रूप से उपलब्ध चिकित्सकीय साधन मिला जिसे नियमित रूप से लेने पर गर्भधारण की संभावना काफी कम की जा सकती थी।
इससे परिवार नियोजन और प्रजनन संबंधी फैसलों में नई संभावनाएँ खुलीं। महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार, विवाह और परिवार शुरू करने के समय की योजना बनाना कुछ हद तक आसान हुआ।
पहली गोली और आज की गोलियों में क्या अंतर है?
पहली पीढ़ी की गर्भनिरोधक गोलियों में हार्मोन की मात्रा आज उपलब्ध कई गोलियों से काफी अधिक थी। शुरुआती अनुभवों और बाद के अध्ययनों से पता चला कि प्रभावी गर्भनिरोधक बनाए रखते हुए हार्मोन की मात्रा कम करने और दवा के घटकों में बदलाव करने से कुछ दुष्प्रभावों तथा जोखिमों को कम किया जा सकता है।
समय के साथ कम मात्रा वाले एस्ट्रोजन और अलग-अलग तरह के प्रोजेस्टिन वाली गोलियाँ विकसित हुईं। आज संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियों में एथिनिल एस्ट्राडियोल या कुछ अन्य एस्ट्रोजन घटकों के साथ विभिन्न प्रोजेस्टिन इस्तेमाल किए जाते हैं। केवल प्रोजेस्टिन वाली गोलियाँ भी उपलब्ध हैं। अब हर महिला को एक ही प्रकार की गोली देने के बजाय उसकी उम्र, रक्तचाप, धूम्रपान की आदत, माइग्रेन, रक्त के थक्के बनने के इतिहास और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियों को ध्यान में रखकर विकल्प चुने जा सकते हैं।
हालाँकि, हर नई गोली को हर मामले में पुरानी गोली से अधिक सुरक्षित मानना सही नहीं है। अलग-अलग प्रोजेस्टिन वाले संयोजनों के जोखिम भी अलग हो सकते हैं। इसलिए दवा का चुनाव केवल उसकी नई तकनीक या लोकप्रियता के आधार पर नहीं होना चाहिए।
गर्भनिरोधक गोली कितनी प्रभावी होती है?
आधुनिक गर्भनिरोधक गोलियाँ सही तरीके से लेने पर बहुत प्रभावी होती हैं। लेकिन वास्तविक जीवन में उनका असर इस बात पर निर्भर करता है कि गोली नियमित रूप से ली जा रही है या नहीं, कोई खुराक छूटी है या नहीं और साथ में ली जा रही दूसरी दवाएँ उसके प्रभाव को कम तो नहीं कर रहीं। अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र यानी सीडीसी के अनुसार, सामान्य इस्तेमाल में संयुक्त गर्भनिरोधक गोली लेने वाली लगभग 100 में से सात महिलाओं को पहले वर्ष में गर्भधारण हो सकता है। इसका अर्थ है कि सामान्य इस्तेमाल में इसकी प्रभावशीलता करीब 93 प्रतिशत है। सही और लगातार इस्तेमाल से यह 99 प्रतिशत से अधिक हो सकती है।
केवल प्रोजेस्टिन वाली गोलियों के सामान्य इस्तेमाल में भी सीडीसी लगभग सात प्रतिशत की वार्षिक विफलता दर बताता है। अलग-अलग गोलियों के लिए उन्हें लेने का सही समय और खुराक छूटने पर अपनाए जाने वाले नियम अलग हो सकते हैं।
गर्भधारण रोकने के अलावा भी हैं कुछ उपयोग
हार्मोनल गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल केवल गर्भधारण रोकने के लिए नहीं किया जाता। डॉक्टर कुछ महिलाओं में इनका उपयोग निम्न समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए भी कर सकते हैं:
माहवारी के दौरान बहुत अधिक रक्तस्राव
दर्दनाक या अनियमित माहवारी
मुहाँसों की समस्या
पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस से जुड़े कुछ लक्षण
एंडोमेट्रियोसिस से संबंधित दर्द
कुछ अध्ययनों में संयुक्त मौखिक गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल और गर्भाशय की अंदरूनी परत के कैंसर तथा अंडाशय के कैंसर के कम जोखिम के बीच संबंध भी पाया गया है।
क्या आधुनिक गर्भनिरोधक गोलियाँ पूरी तरह सुरक्षित हैं?
कोई भी प्रभावी दवा हर व्यक्ति के लिए पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं होती। गर्भनिरोधक गोलियों से कुछ महिलाओं को मतली, स्तनों में संवेदनशीलता, सिरदर्द, अनियमित रक्तस्राव या मनोदशा में बदलाव हो सकता है। कई बार ये समस्याएँ समय के साथ कम हो जाती हैं। लेकिन परेशानी लगातार बनी रहे, तो चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। एस्ट्रोजन वाली संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियाँ कुछ महिलाओं में रक्त के थक्के बनने का जोखिम बढ़ा सकती हैं। अधिकांश स्वस्थ युवा महिलाओं में यह जोखिम कम होता है, लेकिन कुछ स्थितियों में यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
उदाहरण के लिए, 35 वर्ष से अधिक उम्र की धूम्रपान करने वाली महिलाओं, पहले रक्त के थक्के बन चुके लोगों और ऑरा वाले माइग्रेन से प्रभावित कुछ महिलाओं के लिए एस्ट्रोजन वाली गोलियाँ अनुपयुक्त या निषिद्ध हो सकती हैं। कुछ हृदय और रक्तवाहिका संबंधी बीमारियों में भी विशेष सावधानी जरूरी है। इसलिए गोली चुनने से पहले स्वास्थ्य इतिहास और रक्तचाप का आकलन महत्वपूर्ण है। सभी महिलाओं के लिए एक ही गोली सबसे अच्छा विकल्प नहीं होती।
क्या गोली लेने से भविष्य में बाँझपन हो सकता है?
आमतौर पर नहीं। यह गर्भनिरोधक गोलियों से जुड़ी आम गलतफहमियों में से एक है। मौखिक गर्भनिरोधक गोलियों का प्रभाव अस्थायी होता है। इन्हें बंद करने के बाद अधिकांश महिलाओं में अंडोत्सर्जन और प्रजनन क्षमता लौट आती है। कुछ महिलाओं में मासिक चक्र को नियमित होने में थोड़ा समय लग सकता है। यदि गोली बंद करने के बाद लंबे समय तक गर्भधारण नहीं होता, तो इसके पीछे उम्र, अंडोत्सर्जन से जुड़ी समस्याएँ, फैलोपियन ट्यूब की स्थिति, साथी के शुक्राणुओं की गुणवत्ता या अन्य कारण हो सकते हैं। केवल पहले गर्भनिरोधक गोली लेने को बाँझपन का कारण मानना सही नहीं है।
क्या भविष्य में रोज गोली लेने की जरूरत खत्म हो सकती है?
गर्भनिरोधक अनुसंधान का एक बड़ा उद्देश्य ऐसी विधियाँ विकसित करना है जो अधिक सुविधाजनक हों, लंबे समय तक प्रभावी रहें और लोगों की जरूरतों के अनुसार चुनी जा सकें। आज गर्भनिरोधक के कई विकल्प उपलब्ध हैं। इनमें रोज ली जाने वाली गोलियों के अलावा हार्मोनल इम्प्लांट, इंजेक्शन, अंतर्गर्भाशयी उपकरण यानी आईयूडी, त्वचा पर लगाए जाने वाले पैच और योनि में इस्तेमाल होने वाली रिंग शामिल हैं। इम्प्लांट और आईयूडी जैसी लंबे समय तक असर करने वाली प्रतिवर्ती विधियों में रोज दवा लेने की जरूरत नहीं होती। इसलिए इनमें गोली भूल जाने से जुड़ी समस्या भी नहीं रहती और सामान्य इस्तेमाल में गर्भधारण की संभावना कम होती है।
वैज्ञानिक नए हार्मोनल संयोजनों, कम दुष्प्रभाव वाली विधियों और पुरुषों के लिए प्रभावी प्रतिवर्ती गर्भनिरोधक विकल्पों पर भी काम कर रहे हैं। लेकिन अक्टूबर 2026 तक पुरुषों के लिए नियमित इस्तेमाल की कोई व्यापक रूप से स्वीकृत मौखिक गर्भनिरोधक गोली उपलब्ध नहीं है।
क्या गर्भनिरोधक गोली यौन संक्रमणों से भी बचाती है?
नहीं। गर्भनिरोधक गोली गर्भधारण रोकने के लिए होती है। यह एचआईवी, सिफलिस, गोनोरिया, क्लैमाइडिया और दूसरे यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा नहीं देती।
यदि गर्भधारण के साथ-साथ यौन संक्रमणों से भी बचाव जरूरी है, तो कंडोम का सही और नियमित इस्तेमाल महत्वपूर्ण है। व्यक्ति की स्थिति और जोखिम के अनुसार जाँच, टीकाकरण तथा दूसरे बचाव के उपाय भी जरूरी हो सकते हैं।
भारत में गर्भनिरोधक गोली का विकास
भारत ने 1952 में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया था। यह सरकारी स्तर पर संगठित परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू करने वाले शुरुआती देशों में शामिल था।
बाद के दशकों में मौखिक गर्भनिरोधक गोलियाँ भी भारत की परिवार नियोजन सेवाओं का हिस्सा बनीं। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के जरिए संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियाँ और दूसरे विकल्प उपलब्ध कराए जाने लगे।
भारत में विकसित एक खास मौखिक गर्भनिरोधक विकल्प सेंटक्रोमन है, जिसे ऑर्मेलॉक्सिफीन भी कहा जाता है। यह सामान्य एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टिन गोली से अलग है और इसकी कार्यविधि भी अलग है। इसे भारत में विकसित किया गया था और कुछ कार्यक्रमों में साप्ताहिक गर्भनिरोधक गोली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसे लेने की खुराक और समय निर्धारित निर्देशों के अनुसार होना चाहिए।
गर्भनिरोधक गोली की कहानी विज्ञान के साथ महिला स्वतंत्रता की भी कहानी है
गर्भनिरोधक गोली का विकास बीसवीं सदी में विज्ञान और समाज के बीच संबंध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
गर्भनिरोधक गोली ने केवल गर्भधारण रोकने का नया तरीका नहीं दिया। उसने इस विचार को भी मजबूत किया कि मातृत्व का समय और प्रजनन से जुड़े फैसले महिलाओं के स्वास्थ्य, जीवन और स्वतंत्रता का अहम हिस्सा हैं।
इस दवा के पीछे प्रयोगशालाओं में हुआ वैज्ञानिक काम तो था ही, लेकिन उसके विकास का रास्ता उन महिलाओं के लंबे संघर्ष से भी बना, जिन्होंने अपने शरीर और अपने भविष्य के बारे में खुद फैसला लेने के अधिकार की माँग की।


