Newstrack Special: खाना बनाना तनाव क्यों कम करता है? जानिए कुकिंग और मानसिक स्वास्थ्य का कनेक्शन

Cooking and Mental Health: क्या खाना बनाना तनाव और ओवरथिंकिंग कम कर सकता है? जानिए कुकिंग को थेरेपी जैसा महसूस कराने वाले मनोवैज्ञानिक कारण, फ्लो, रचनात्मकता और यादों का कनेक्शन।

Neel Mani Lal
Published on: 22 Aug 2026 6:27 PM IST
Cooking and Mental Health Explained in Hindi
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Cooking and Mental Health Explained in Hindi

Cooking and Mental Health Explained: सुबह से दिमाग में दर्जनों बातें चल रही हैं। काम का तनाव, घर की चिंता, फोन पर लगातार आने वाले संदेश, अधूरे काम और भविष्य की फिक्र। ऐसे में कई लोगों को शाम को रसोई में जाकर सब्जी काटने, आटा गूंथने, मसाले भूनने या अपनी पसंद की कोई डिश बनाने से अचानक सुकून मिलने लगता है। खाना तैयार होने तक मूड कुछ बेहतर हो जाता है और लगता है कि दिमाग कुछ देर के लिए शांत हो गया। सवाल है कि ऐसा क्यों होता है? आखिर खाना बनाना तो एक रोजमर्रा का काम है, फिर यह कई लोगों के लिए तनाव कम करने वाली गतिविधि जैसा क्यों महसूस होता है? क्या इसके पीछे सचमुच कोई मनोवैज्ञानिक कारण है या यह सिर्फ हमारा वहम है?

मनोविज्ञान में खाना बनाने जैसी रचनात्मक और ध्यान मांगने वाली गतिविधियों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए मददगार माना जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कुकिंग किसी बीमारी का इलाज है या डॉक्टर की सलाह और इलाज की जगह ले सकती है। लेकिन सामान्य तनाव, बेचैनी, बोरियत या मानसिक थकान के समय खाना बनाना कुछ लोगों के लिए मन को व्यस्त रखने और बेहतर महसूस करने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

रसोई में जाते ही दिमाग दूसरी तरफ क्यों लग जाता है?

जब हम तनाव में होते हैं तो दिमाग एक ही समस्या को बार-बार सोचता रहता है। इसे आम भाषा में ओवरथिंकिंग कह सकते हैं। समस्या यह है कि सोचते रहने से समस्या हमेशा हल नहीं होती, लेकिन दिमाग थकता जरूर रहता है। खाना बनाते समय स्थिति बदल जाती है। अब ध्यान इस बात पर होता है कि प्याज कितना काटना है, तेल कितना गर्म है, मसाला कब डालना है, गैस धीमी करनी है या तेज, सब्जी पक गई या नहीं। यानी दिमाग को एक के बाद एक छोटे-छोटे काम मिलते रहते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि खाना बनाते ही तनाव गायब हो जाता है। लेकिन आपका ध्यान कुछ समय के लिए उस विचारों के चक्र से हटकर सामने हो रहे काम पर आ जाता है। यही बदलाव कई लोगों को मानसिक राहत दे सकता है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि दिमाग में एक साथ चल रहे कई चैनलों के बीच कुकिंग एक नया चैनल खोल देती है, जिस पर आपका ध्यान टिकने लगता है।

सब्जी काटने से लेकर मसाला भूनने तक दिमाग लगातार काम करता है

कुकिंग देखने में साधारण काम लगता है, लेकिन इसमें दिमाग और शरीर दोनों का अच्छा तालमेल चाहिए। आपको चीजों को पहचानना होता है, उनका अंदाजा लगाना होता है, समय का ध्यान रखना होता है और कई कामों को एक क्रम में करना होता है। उदाहरण के लिए आप पुलाव बना रहे हैं। चावल कितनी मात्रा में लेना है, पानी कितना डालना है, सब्जियां कब डालनी हैं, मसाला कितना होना चाहिए और गैस कब बंद करनी है, इन छोटे-छोटे फैसलों में लगातार ध्यान लगता है।

इस दौरान देखने, सूंघने, छूने और सुनने जैसी कई इंद्रियां भी सक्रिय रहती हैं। मसालों की खुशबू, गर्म तेल की आवाज, आटे की बनावट और खाना पकने का रंग - ये सब मिलकर दिमाग को एक तरह का संवेदनात्मक अनुभव देते हैं। यही वजह है कि कुकिंग सिर्फ दिमाग में सोचने वाला काम नहीं है। इसमें शरीर और दिमाग दोनों एक साथ शामिल होते हैं।

“मैंने कुछ बनाया” वाला एहसास इतना अच्छा क्यों लगता है?

कुकिंग का सबसे दिलचस्प मनोवैज्ञानिक हिस्सा शायद यही है। दिन में हमारे बहुत से काम ऐसे होते हैं जिनका नतीजा तुरंत दिखाई नहीं देता। ऑफिस में कई घंटे काम करने के बाद भी काम खत्म नहीं होता। ईमेल आते रहते हैं, फोन बजता रहता है और अगले दिन फिर वही काम सामने होता है। लेकिन खाना बनाने में एक साफ शुरुआत और अंत होता है। आपने सामग्री निकाली, उसे तैयार किया, पकाया और कुछ समय बाद आपके सामने तैयार खाना है। यह छोटी-सी उपलब्धि दिमाग को यह एहसास दे सकती है कि मैंने कुछ क्रिएट किया है। यह अनुभव खास तौर पर तब अच्छा लग सकता है जब दिन के दूसरे हिस्सों में व्यक्ति को लगे कि बहुत सी चीजें उसके नियंत्रण में नहीं हैं। रसोई में कम से कम एक काम ऐसा होता है जिसका पूरा नियंत्रण काफी हद तक आपके हाथ में होता है। आप तय करते हैं कि क्या बनाना है, कैसे बनाना है और कब तैयार करना है।

कुकिंग में “फ्लो” जैसा अनुभव क्यों हो सकता है?

मनोविज्ञान में एक दिलचस्प अवधारणा है - फ्लो। आसान भाषा में कहें तो ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्ति किसी काम में इतना डूब जाता है कि कुछ समय के लिए उसका ध्यान उसी काम पर पूरी तरह टिक जाता है। कभी आपने किसी को बहुत ध्यान से खाना बनाते देखा होगा। वह लगातार काम करता रहता है और उसे पता ही नहीं चलता कि आधा घंटा कब निकल गया। हर बार कुकिंग करने से ऐसा अनुभव हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन खाना बनाना ऐसी गतिविधि जरूर है जिसमें एक के बाद एक काम सामने आते रहते हैं। यही लगातार जुड़ा हुआ काम दिमाग को भटकने से रोक सकता है। यही कारण है कि कुछ लोगों को खाना बनाने के दौरान समय जल्दी गुजरता हुआ महसूस होता है।

आटा गूंथना या सब्जी काटना मन को क्यों शांत कर सकता है?

कुकिंग के कुछ काम दोहराव वाले होते हैं। आटा गूंथना, सब्जी काटना, मसाले मिलाना या किसी चीज को धीरे-धीरे पकाना - इनमें एक तरह की लय होती है। ऐसे दोहराव वाले काम कई लोगों को शांत महसूस करा सकते हैं क्योंकि ध्यान लगातार एक ही गतिविधि पर बना रहता है। यह अनुभव कुछ हद तक वैसा हो सकता है जैसा किसी को बागवानी, चित्र बनाने, बुनाई, सफाई या दूसरे हाथ के काम करते समय मिलता है। लेकिन इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होगा। किसी को खाना बनाना सुकून दे सकता है, तो किसी दूसरे व्यक्ति के लिए रसोई का काम ही तनाव का कारण हो सकता है।

खुशबू पुरानी यादें क्यों वापस ले आती है?

कभी मां के हाथ की बनी दाल की खुशबू आई और अचानक बचपन याद आ गया? या किसी मिठाई की खुशबू ने आपको किसी त्योहार या पुराने घर की याद दिला दी? ऐसा सिर्फ भावुक होने की वजह से नहीं होता। गंध और याददाश्त के बीच दिमाग में मजबूत संबंध है। किसी खास खुशबू के साथ जुड़ी पुरानी घटना, व्यक्ति या जगह अचानक याद आ सकती है।

यही वजह है कि खाना सिर्फ स्वाद का अनुभव नहीं है। उसका रंग, खुशबू और स्वाद मिलकर किसी पुराने अनुभव को फिर से सामने ला सकते हैं। भारतीय घरों में इसका असर और दिलचस्प हो सकता है। अलग-अलग त्योहारों, मौसमों और पारिवारिक मौकों से जुड़े पकवान अक्सर बचपन की यादों से जुड़े होते हैं। किसी के लिए गुजिया हो सकती है, किसी के लिए खिचड़ी, किसी के लिए दादी के हाथ की कचौड़ी। इस तरह खाना बनाना या उसकी खुशबू सिर्फ वर्तमान में नहीं रखती, बल्कि कभी-कभी हमें अतीत से भी जोड़ देती है।

किसी और के लिए खाना बनाने से खुशी क्यों मिलती है?

कुकिंग का एक सामाजिक पक्ष भी है। अपने लिए खाना बनाना एक बात है, लेकिन किसी दूसरे के लिए खाना बनाना अलग अनुभव है। जब आप किसी प्रिय व्यक्ति की पसंद का खाना बनाते हैं तो उसमें सिर्फ भोजन नहीं होता। उसमें ध्यान, देखभाल और अपनापन भी जुड़ा होता है।

किसी मां का बच्चे के लिए खाना बनाना, दोस्त का दोस्त के लिए पसंदीदा डिश बनाना या पति-पत्नी का साथ में खाना बनाना - ये सब सामाजिक जुड़ाव को मजबूत कर सकते हैं। खाने की मेज पर बैठकर साथ खाना भी लोगों को जोड़ता है। यानी कुकिंग का असर सिर्फ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता जिसने खाना बनाया है। वह रिश्तों और सामाजिक बातचीत का हिस्सा भी बन सकता है।

खाना बनाना रचनात्मकता का खेल भी है

कुकिंग को सिर्फ रेसिपी फॉलो करना समझना भी सही नहीं है। एक ही सामग्री से दो लोग बिल्कुल अलग खाना बना सकते हैं। कोई ज्यादा मसाला डालेगा, कोई कम। कोई नई चीज मिलाएगा, कोई पुरानी रेसिपी में बदलाव करेगा। कोई खाने को खूबसूरती से सजाएगा। यानी कुकिंग में छोटे-छोटे रचनात्मक फैसले लगातार होते रहते हैं। रचनात्मक गतिविधियों से मिलने वाला संतोष भी मूड को बेहतर महसूस कराने में भूमिका निभा सकता है। खासकर तब जब व्यक्ति को लगे कि उसने अपने हाथों से कुछ बनाया है। इसीलिए कुकिंग उन लोगों के लिए खास तौर पर अच्छी गतिविधि हो सकती है जिन्हें स्क्रीन से दूर रहकर कुछ करने में आनंद आता है।

कुकिंग सचमुच तनाव कम कर सकती है?

कुछ शोधों में खाना बनाने और मानसिक स्वास्थ्य के बीच सकारात्मक संबंध देखा गया है। कुकिंग आधारित गतिविधियों पर हुए अध्ययनों में आत्मविश्वास, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कुछ सकारात्मक बदलावों की रिपोर्ट मिली है। हालांकि शोध की गुणवत्ता और तरीके अलग-अलग रहे हैं, इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि कुकिंग हर व्यक्ति में तनाव या मानसिक बीमारी का इलाज कर सकती है। असल बात यह है कि कुकिंग में कई ऐसी चीजें एक साथ आती हैं जो मन के लिए उपयोगी हो सकती हैं - ध्यान लगाना, रचनात्मकता, शारीरिक गतिविधि, उपलब्धि का एहसास और दूसरों से जुड़ाव। यानी फायदा सिर्फ “खाना बनाने” से नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया से मिल सकता है।

लेकिन हर किसी के लिए कुकिंग थेरेपी जैसी नहीं होती

अगर किसी व्यक्ति को खाना बनाना पसंद ही नहीं है, रसोई में बहुत काम है, समय नहीं है या खाना बनाने से तनाव बढ़ता है तो उसके लिए इसे मानसिक राहत का तरीका बताना सही नहीं होगा। मानसिक स्वास्थ्य में एक ही गतिविधि सबके लिए काम नहीं करती। किसी को संगीत पसंद हो सकता है, किसी को टहलना, किसी को बागवानी और किसी को पढ़ना। कुकिंग को इसलिए “इलाज” नहीं बल्कि एक संभावित मददगार गतिविधि समझना बेहतर है।

अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से उदासी, घबराहट, नींद की गंभीर समस्या या दूसरी मानसिक परेशानियों से जूझ रहा है, तो सिर्फ खाना बनाना पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना ज्यादा जरूरी है।

क्या कुकिंग ध्यान लगाने जैसी हो सकती है?

कभी-कभी हां। अगर आप खाना बनाते समय मोबाइल एक तरफ रख दें और सिर्फ उस काम पर ध्यान दें तो कुकिंग एक तरह की ध्यान केंद्रित करने वाली गतिविधि बन सकती है। सब्जी का रंग देखना, मसाले की खुशबू महसूस करना, आटे की बनावट पर ध्यान देना और खाना पकने की आवाज सुनना - ये सारी चीजें आपको वर्तमान क्षण में ला सकती हैं। यानी खाना बनाते समय सिर्फ यह न सोचें कि “जल्दी से खाना तैयार हो जाए।” कभी-कभी पूरी प्रक्रिया पर ध्यान देना ही ज्यादा सुकून दे सकता है।

खाना बनाना और स्क्रीन से दूरी का भी कनेक्शन है

आज हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर गुजरता है। काम, मनोरंजन, खरीदारी, बैंकिंग और बातचीत, सब कुछ फोन पर हो रहा है। कुकिंग आपको कुछ समय के लिए स्क्रीन से दूर कर सकती है। हाथ किसी वास्तविक चीज में लगे होते हैं और ध्यान किसी वास्तविक काम पर। यह बदलाव अपने आप में कई लोगों के लिए अच्छा अनुभव हो सकता है। हालांकि यहां भी संतुलन जरूरी है। अगर खाना बनाते समय भी लगातार रील देख रहे हैं, मैसेज कर रहे हैं और फोन पर वीडियो चला रहे हैं तो उस गतिविधि से मिलने वाला ध्यान और शांति का अनुभव कम हो सकता है।

क्या खाना बनाना दिमाग के लिए व्यायाम जैसा है?

इसे सीधे “दिमाग की एक्सरसाइज” कहना सही नहीं होगा, लेकिन कुकिंग में दिमाग को कई तरह के काम एक साथ करने पड़ते हैं। योजना बनाना, चीजें याद रखना, समय का अंदाजा लगाना, मात्रा तय करना और गलती होने पर उसे ठीक करना, ये सब मानसिक प्रक्रियाएं हैं। नई रेसिपी बनाते समय तो यह और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आपको निर्देश समझने होते हैं और उन्हें सही क्रम में लागू करना होता है। इसलिए कुकिंग एक ऐसी रोजमर्रा की गतिविधि है जिसमें सोचना और करना दोनों साथ-साथ चलते हैं।

क्या रोज खाना बनाना जरूरी है?

बिल्कुल नहीं। अगर किसी को खाना बनाना पसंद है तो सप्ताह में कुछ बार भी इसे शौक की तरह किया जा सकता है। यहां तक कि कभी-कभी सिर्फ कोई नई डिश बनाना, घर में बनी चीज को थोड़ा अलग तरीके से तैयार करना या किसी पसंदीदा व्यक्ति के लिए खाना बनाना भी पर्याप्त हो सकता है। असल फायदा उस समय से आ सकता है जब आप काम को सिर्फ एक जिम्मेदारी की तरह नहीं बल्कि ऐसी गतिविधि की तरह करते हैं जिसमें आपका ध्यान, रचनात्मकता और इंद्रियां शामिल होती हैं।

असली बात यह है कि कुकिंग सिर्फ खाना नहीं बनाती

खाना बनाना हमारे लिए सिर्फ कैलोरी, स्वाद और पेट भरने की प्रक्रिया नहीं है। इसके साथ यादें, परिवार, संस्कृति, रचनात्मकता और भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। जब आप प्याज काटते हैं, मसाले भूनते हैं और धीरे-धीरे खाना तैयार होता देखते हैं तो आपका दिमाग सिर्फ भोजन तैयार नहीं कर रहा होता। वह लगातार छोटे फैसले ले रहा होता है, इंद्रियों से जानकारी ले रहा होता है और एक काम को शुरुआत से अंत तक पूरा कर रहा होता है। और जब आखिर में सामने तैयार खाना होता है तो एक छोटी-सी उपलब्धि का एहसास भी मिल सकता है। शायद यही वजह है कि किसी तनाव भरे दिन में कई लोगों को रसोई में जाकर खाना बनाना बाकी कामों से ज्यादा सुकून देता है। कुकिंग कोई जादुई मानसिक इलाज नहीं है। लेकिन अगर आपको खाना बनाना पसंद है, तो यह ऐसी रोजमर्रा की गतिविधि जरूर हो सकती है जिसमें शरीर काम करता है, दिमाग एक जगह टिकता है, इंद्रियां सक्रिय होती हैं, कुछ नया बनाने का आनंद मिलता है और कभी-कभी किसी अपने के साथ जुड़ने का मौका भी मिलता है। यानी अगली बार जब कोई कहे कि “आज बहुत तनाव है, कुछ अच्छा बना लेते हैं”, तो हो सकता है वह सिर्फ खाना बनाने की बात न कर रहा हो। वह अनजाने में अपने दिमाग को भी थोड़ी देर के लिए आराम देने का रास्ता खोज रहा हो।

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