Erectile Dysfunction: हार्ट अटैक से कई साल पहले दिख सकती है इरेक्शन की समस्या?

Erectile Dysfunction: इरेक्टाइल डिसफंक्शन (ED) दिल की बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है। जानें ED और हार्ट अटैक का कनेक्शन, जोखिम के कारण, लक्षण और बचाव के तरीके।

Neel Mani Lal
Published on: 15 Oct 2026 12:48 PM IST
Erectile Dysfunction and Heart Disease | ED and Heart Attack Risk | Newstrack Hindi News
X

Erectile Dysfunction and Heart Disease | ED and Heart Attack Risk | Newstrack Hindi News

Erectile Dysfunction: पुराने ज़माने में खान मज़दूर कोयले की खदानों में पिंजरे में एक कैनरी चिड़िया लेकर उतरते थे। खदान में जब ज़हरीली गैस फैलती, तो नन्ही चिड़िया इंसानों से पहले बेहोश हो जाती थी, और मज़दूरों को बाहर भागने का मौका मिल जाता था। चिकित्सा जगत में आज कई हृदय रोग विशेषज्ञ इरेक्टाइल डिसफंक्शन (ED) को कुछ ऐसा ही मानते हैं: शरीर की एक शुरुआती चेतावनी, जो दिल के गंभीर संकट से कई साल पहले बज उठती है।

यह बात पहली बार सुनने पर अजीब लगती है। एक का संबंध बेडरूम से है, दूसरे का छाती से। लेकिन शरीर की बनावट को समझें तो दोनों के बीच का रिश्ता हैरान करने वाले ढंग से सीधा निकलता है।

जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है, विज्ञान क्या कहता है, और इसका आपके लिए क्या मतलब है।

इरेक्शन असल में है क्या?

ज़्यादातर लोग इरेक्शन को 'मर्दाना ताकत' या 'मूड' का मामला मानते हैं, लेकिन शरीर विज्ञान की नज़र में यह मूलतः एक रक्त-संचार की घटना है। उत्तेजना होने पर दिमाग से संकेत नसों के ज़रिए पुरुष अंग तक पहुँचते हैं। वहाँ रक्त वाहिकाओं की भीतरी परत से एक छोटा-सा अणु (मॉलिक्यूल) निकलता है, नाइट्रिक ऑक्साइड। यह अणु वाहिकाओं और स्पंज जैसे ऊतकों (टिश्यू) की मांसपेशियों को ढीला कर देता है। नतीजतन धमनियाँ चौड़ी होती हैं, खून तेज़ी से अंदर भरता है और बाहर निकलने वाली नसें दब जाती हैं। इस तरह खून वहाँ कैद हो जाता है और इरेक्शन बनता है।

यानी इरेक्शन के लिए तीन चीज़ें चाहिए: सही नर्व सिग्नल, सही हार्मोन और सबसे ज़रूरी, स्वस्थ रक्त वाहिकाएँ जो सही समय पर फैल सकें। इनमें से वाहिकाओं वाला हिस्सा ही दिल की बीमारी से जुड़ा है।

वाहिकाओं की भीतरी परत: जहाँ सब कुछ शुरू होता है

हमारी हर रक्त वाहिका (वेन) के अंदर कोशिकाओं (सेल्स) की एक बेहद पतली चिकनी परत होती है, जिसे एंडोथीलियम कहते हैं। इसे सिर्फ़ पाइप की अंदरूनी दीवार मत समझिए। यह एक सक्रिय अंग की तरह काम करती है: रक्त प्रवाह को महसूस करती है, ज़रूरत के हिसाब से वाहिका को फैलाती या सिकोड़ती है, खून को थक्का बनने से रोकती है और सूजन को नियंत्रित रखती है। नाइट्रिक ऑक्साइड का मुख्य कारखाना यही परत है।

दिलचस्प बात यह है कि इस अणु की खोज पर 1998 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों - रॉबर्ट फर्चगॉट, लुई इग्नारो और फरीद मुराद को दिया गया था। और उसी साल एक दवा बाज़ार में आई जिसने इस खोज को आम लोगों की ज़ुबान पर पहुँचा दिया। ये दवा थी वियाग्रा।

जब डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, ज़्यादा कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान या मोटापे के कारण यह परत घिसने और बीमार होने लगती है, तो नाइट्रिक ऑक्साइड बनना कम हो जाता है। वाहिकाएँ लचीलापन खो देती हैं और धीरे-धीरे उनकी दीवारों में चर्बी और कैल्शियम की परतें जमने लगती हैं, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहते हैं। यही प्रक्रिया दिल की धमनियों में होती है तो हार्ट अटैक का रास्ता बनता है, और पुरुष अंग की धमनियों में होती है तो इरेक्शन कमज़ोर पड़ता है। बीमारी एक ही है, बस जगह अलग है।

धमनी के आकार की थ्योरी

अब सवाल उठता है कि अगर बीमारी पूरे शरीर में एक साथ शुरू होती है, तो लक्षण पहले यहीं क्यों दिखता है? इसका सबसे लोकप्रिय स्पष्टीकरण इटली के यूरोलॉजिस्ट पिएरो मोंटोरसी के 'आर्टरी साइज़ हाइपोथीसिस' यानी धमनी के आकार की परिकल्पना से मिलता है।

सरल उदाहरण लीजिए। आपके घर में पानी की मोटी मेन पाइपलाइन है और रसोई के नल तक जाने वाली पतली पाइप भी। पाइपों में अगर एक जैसी मात्रा में गाद जमा हो, तो पतली पाइप पहले जाम होगी, जबकि मोटी पाइप में पानी तब भी ठीक-ठाक बहता रहेगा। शरीर की धमनियों (आर्टरी) के साथ ऐसा ही है। पुरुष अंग की धमनियाँ बहुत महीन होती हैं, व्यास में लगभग एक से दो मिलीमीटर। दिल की कोरोनरी धमनियाँ इनसे दोगुनी, यानी लगभग तीन से चार मिलीमीटर की होती हैं, और गर्दन की कैरोटिड धमनी इससे भी मोटी। इसलिए जब सब जगह एक जैसी मात्रा में प्लाक जमता है, तो सबसे पतली नली पर असर सबसे पहले दिखता है।

इस हिसाब से इरेक्शन में आई कमी कई बार बीमारी की सबसे पहली दिखती निशानी होती है। दिल की धमनियों में रुकावट अभी इतनी नहीं बढ़ी कि सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे लक्षण दें, लेकिन छोटी धमनियों में गड़बड़ी पहले ही महसूस होने लगती है।

आँकड़े क्या कहते हैं?

यह सिर्फ़ सैद्धांतिक बात नहीं है। दुनिया भर के अध्ययनों ने इसे आँकड़ों से परखा है। कई शोधों में पाया गया कि जिन पुरुषों को ED की शिकायत होती है, उनमें आगे चलकर दिल की बीमारी के लक्षण दिखने का औसत अंतराल लगभग दो से पाँच साल रहा। यानी इरेक्टाइल डिसफंक्शन अक्सर हार्ट अटैक या एंजाइना जैसी घटनाओं से कुछ साल पहले दस्तक दे देता है।

अमेरिका में प्रोस्टेट कैंसर की रोकथाम पर हुए एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल के आँकड़ों का बाद में विश्लेषण किया गया। उसमें पाया गया कि जिन पुरुषों को ED की समस्या थी, उनमें आगे हृदय संबंधी घटनाओं का जोखिम धूम्रपान करने या परिवार में हार्ट अटैक का इतिहास होने जैसे स्थापित जोखिम कारकों के बराबर के स्तर का था। बाद में कई अध्ययनों को मिलाकर किए गए मेटा-विश्लेषण से भी यही तस्वीर उभरी: ED वाले पुरुषों में हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम लगभग चालीस से पचास प्रतिशत तक ज़्यादा पाया गया, और कुल मृत्यु का जोखिम भी बढ़ा हुआ दिखा।

सबसे चौंकाने वाली बात उम्र को लेकर है। साठ-सत्तर साल की उम्र में ED कम चिंताजनक है, क्योंकि वह उम्र के साथ काफ़ी आम होता है। लेकिन चालीस से पचास के बीच के पुरुषों में ED होना कहीं ज़्यादा बड़ा संकेत है। इस आयु वर्ग में ED वाले पुरुषों का सापेक्ष जोखिम, ED न होने वाले हमउम्र पुरुषों की तुलना में कई गुना ज़्यादा पाया गया है। हालाँकि ध्यान रहे, सापेक्ष जोखिम ऊँचा होने का मतलब यह नहीं कि पूर्ण जोखिम बहुत बड़ा है, क्योंकि इस उम्र में हृदय रोग की बुनियादी दर ही कम होती है। फिर भी डॉक्टर इसे नज़रअंदाज़ करने लायक नहीं मानते।

वियाग्रा की अनोखी कहानी

इस विषय का एक रोचक किस्सा वियाग्रा का अपना जन्म है। फाइज़र कंपनी की इंग्लैंड स्थित प्रयोगशाला में 1990 के दशक की शुरुआत में सिल्डेनाफिल नाम के यौगिक पर शोध हुआ, लेकिन इरेक्शन के लिए नहीं, बल्कि दिल के दर्द यानी एंजाइना के इलाज के लिए। उद्देश्य था कि यह दवा हृदय की धमनियों को चौड़ा करके उनमें रक्त प्रवाह सुधारे। एंजाइना पर इसका असर निराशाजनक निकला, लेकिन परीक्षण में शामिल पुरुषों ने एक अनपेक्षित "साइड इफ़ेक्ट" की बात बताई। कहा जाता है कि कुछ प्रतिभागी बची हुई गोलियाँ लौटाने को तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने रुख बदला और 1998 में यह दवा ED के इलाज के रूप में मंज़ूर हुई।

इस कहानी में एक सबक छिपा है: जो दवा दिल की धमनियों के लिए सोची गई थी, उसने पुरुष अंग की धमनियों पर असर दिखाया। यह इस बात का जीवित प्रमाण है कि दोनों जगह की वाहिकाओं का काम करने का तरीका मूल रूप से एक जैसा है।

दिल से आगे: बाकी साझा दुश्मन

ED और हृदय रोग का रिश्ता सिर्फ़ वाहिकाओं की सीधी जकड़न तक सीमित नहीं है। दोनों के पीछे कई साझा कारण हैं। टाइप-2 डायबिटीज़ सबसे बड़ा है। ऊँचा ब्लड शुगर वाहिकाओं की भीतरी परत और नसों दोनों को नुकसान पहुँचाता है, इसलिए डायबिटीज़ के मरीज़ों में ED अक्सर सामान्य लोगों से दस से पंद्रह साल पहले शुरू हो जाता है। हाई ब्लड प्रेशर धमनियों की दीवारों को लगातार झकझोरता रहता है। धूम्रपान सीधे एंडोथीलियम को ज़ख्मी करता है और नाइट्रिक ऑक्साइड को घटाता है। पेट के आसपास जमा चर्बी शरीर में हल्की पुरानी सूजन बनाए रखती है, जो वाहिकाओं के लिए ज़हर जैसी है। नींद में साँस रुकने की समस्या यानी स्लीप एप्निया, गतिहीन जीवनशैली और लंबे समय का तनाव भी इसी फेहरिस्त में आते हैं।

यह सूची किसी भारतीय के लिए और भी प्रासंगिक है। दक्षिण एशियाई लोगों में हृदय रोग औसतन कम उम्र में दस्तक देता है और भारत को अक्सर दुनिया की डायबिटीज़ राजधानी कहा जाता है। ऐसे में युवा या मध्यम उम्र के भारतीय पुरुषों में ED को सिर्फ़ "तनाव" या "कमज़ोरी" कहकर टाल देना खतरनाक साबित हो सकता है।

तो क्या हर ED दिल की बीमारी है?

बिल्कुल नहीं, और यह बात स्पष्ट रहनी चाहिए। इरेक्टाइल डिसफंक्शन के कारण कई हो सकते हैं: चिंता, अवसाद, रिश्ते का तनाव, परफ़ॉर्मेंस एंग्ज़ायटी, शराब का अधिक सेवन, हार्मोन की कमी, नसों की समस्या, और कुछ दवाएँ, जैसे कुछ एंटीडिप्रेसेंट या ब्लड प्रेशर की कुछ दवाएँ। कई युवाओं में कारण पूरी तरह मानसिक होता है।

फिर भी कुछ संकेत डॉक्टरों को सोचने पर मजबूर करते हैं। अगर समस्या धीरे-धीरे बढ़ी हो, हर परिस्थिति में दिखे, सुबह की स्वाभाविक उत्तेजना भी घटती गई हो, और साथ में डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान या परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास हो, तो वाहिकाओं की भूमिका की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत, अगर दिक्कत अचानक शुरू हुई हो, सिर्फ़ किसी खास स्थिति में आती हो और सुबह के इरेक्शन सामान्य हों, तो मनोवैज्ञानिक कारण ज़्यादा संभावित माने जाते हैं। यह एक मोटा नियम है, पक्का निदान नहीं। असली फ़ैसला डॉक्टर की जाँच से ही होता है।

सेक्स और दिल की सेहत: एक और जोड़

इस रिश्ते का एक और रोचक पहलू है। शारीरिक संबंध बनाना शरीर पर उतना ही बोझ डालता है जितना हल्की से मध्यम कसरत, मोटे तौर पर दो मंज़िल सीढ़ियाँ तेज़ी से चढ़ने या तेज़ क़दमों से चलने के बराबर। जिस इंसान का दिल इतना काम भी आराम से नहीं झेल पाता, उसका शरीर अक्सर पहले संकेत देने लगता है। इसीलिए हृदय रोग के बाद पुनर्वास में डॉक्टर मरीज़ से सेक्स जीवन पर भी खुलकर बात करते हैं। और यही वजह है कि कार्डियोलॉजी के विशेषज्ञ अब ED वाले हर मरीज़ में हृदय संबंधी जोखिम की जाँच की सिफ़ारिश करते हैं, चाहे उसे सीने में कोई तकलीफ़ न हो।

झिझक सबसे बड़ी रुकावट है

समस्या यह है कि ED पर बात करना हमारे समाज में आज भी वर्जित-सा है। बहुत से पुरुष इसे अपनी मर्दानगी पर सवाल मान लेते हैं, डॉक्टर के पास जाने के बजाय अख़बारों के विज्ञापन वाले "गुप्त रोग विशेषज्ञ" या ऑनलाइन बिकने वाली गोलियों का रास्ता चुनते हैं। यहाँ दो खतरे हैं।

पहला, बिना जाँच के गोलियाँ लेने से लक्षण दब जाता है, लेकिन अंदर पनपती बीमारी जस की तस रहती है। चेतावनी की घंटी बजना बंद हो गया, पर आग बुझी नहीं। दूसरा, जो पुरुष हृदय रोग के लिए नाइट्रेट वर्ग की दवाएँ, जैसे सॉर्बिट्रेट या नाइट्रोग्लिसरीन, लेते हैं, उनके लिए ED की ये गोलियाँ जानलेवा हो सकती हैं, क्योंकि दोनों के मेल से ब्लड प्रेशर खतरनाक ढंग से गिर सकता है। इसलिए कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेनी चाहिए।

डॉक्टर के पास जाएँ तो क्या होता है?

आमतौर पर डॉक्टर आपके लक्षणों, आदतों और दवाओं के बारे में पूछते हैं। फिर ब्लड प्रेशर नापा जाता है और ब्लड शुगर या HbA1c, कोलेस्ट्रॉल की जाँच (लिपिड प्रोफ़ाइल), कभी-कभी टेस्टोस्टेरोन का स्तर और ज़रूरत पड़ने पर ECG जैसी जाँचें होती हैं। अगर जोखिम ज़्यादा दिखे तो कार्डियोलॉजिस्ट आगे ट्रेडमिल टेस्ट या कैल्शियम स्कोर जैसी जाँच भी सुझा सकते हैं। यह प्रक्रिया वैसी ही सामान्य है जैसे आप बुखार में डॉक्टर के पास जाते हैं, और डॉक्टर के लिए यह रोज़ का काम है।

अच्छी ख़बर: रास्ता दोनों तरफ़ खुला है

इस कहानी का सबसे उम्मीद भरा हिस्सा यह है कि जो चीज़ें दिल को बचाती हैं, वही इरेक्शन को भी सुधारती हैं। इटली में हुए एक चर्चित अध्ययन में मोटे पुरुषों को दो साल तक वज़न घटाने, बेहतर खान-पान और नियमित कसरत का कार्यक्रम दिया गया। नतीजा यह रहा कि इस समूह के लगभग एक तिहाई पुरुषों का इरेक्टाइल फ़ंक्शन सामान्य के करीब लौट आया, जबकि सलाह भर पाने वाले समूह में यह आँकड़ा बहुत कम रहा।

रोज़ तेज़ चलना, सप्ताह में कुछ घंटे की मध्यम कसरत, सिगरेट छोड़ना, शराब सीमित रखना, पर्याप्त नींद, फल-सब्ज़ियों, साबुत अनाज और मेवों से भरा संतुलित भोजन, और डायबिटीज़ व बीपी का ठीक से नियंत्रण, ये सब वाहिकाओं की भीतरी परत को दोबारा स्वस्थ बनाने में मदद करते हैं। ज़रूरत हो तो डॉक्टर कोलेस्ट्रॉल या बीपी की दवाएँ भी देते हैं। यानी ED की शिकायत एक अप्रिय झटका ज़रूर है, लेकिन अगर इसे समय पर सुन लिया जाए, तो यह आपको हार्ट अटैक से पहले सँभलने का मौका भी देती है।

जान लीजिए कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन अपने आप में किसी दिल की बीमारी का निदान नहीं है, लेकिन यह अक्सर उसी कहानी का पहला अध्याय होता है, जिसका आख़िरी अध्याय हार्ट अटैक या स्ट्रोक हो सकता है। वजह सीधी है: बारीक धमनियाँ पहले जवाब देती हैं, और दोनों समस्याओं की जड़ वाहिकाओं की सेहत में छिपी है।

अगली बार अगर कोई पुरुष, या उसका कोई अपना, इस समस्या से जूझ रहा हो, तो इसे शर्म की नहीं, सतर्कता की बात समझें। एक साधारण जाँच, कुछ जीवनशैली बदलाव और खुली बातचीत वह कर सकती है जो महँगे इलाज भी बाद में नहीं कर पाते। शरीर ने कैनरी की तरह पहले ही चेतावनी दे दी है, अब सुनना हमारे हाथ में है।

Neel Mani Lal
ABOUT THE AUTHOR

Neel Mani Lal

neelmanilal@gmail.com
Next Story