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Flight Ear Problem: फ्लाइट में कान क्यों बंद हो जाते हैं, तुरंत राहत कैसे मिले और क्या नुकसान है?
Flight Ear Problem Explained: फ्लाइट के टेकऑफ और लैंडिंग के समय कान क्यों बंद होते हैं? जानिए एयरप्लेन ईयर, यूस्टेशियन ट्यूब, कान का दबाव, तुरंत राहत के उपाय, कान के पर्दे को नुकसान का खतरा और पायलट इससे कैसे बचते हैं।
Flight Ear Problem Explained in Hindi
Flight Ear Problem Explained: विमान के टेकऑफ और खासकर लैंडिंग करते समय कान में भारीपन, दबाव, कान बंद होने जैसा एहसास, सुनाई कम देना, ‘पॉप’ की आवाज या कभी-कभी तेज दर्द होना बहुत सामान्य है। इसका मुख्य कारण विमान का शोर नहीं, बल्कि केबिन के एयरप्रेशर में होने वाला बदलाव है।
हमारे कान के पर्दे के एक तरफ बाहरी हवा होती है और दूसरी तरफ मध्य कान के भीतर हवा भरी एक छोटी-सी जगह होती है। सामान्य स्थिति में दोनों तरफ का दबाव लगभग बराबर रहता है। इस संतुलन को बनाए रखने का काम ‘यूस्टेशियन ट्यूब’ करती है, जो मध्य कान (middle ear) को नाक के पीछे और गले के ऊपरी हिस्से से जोड़ती है।
विमान ऊपर चढ़ता या नीचे उतरता है तो केबिन का दबाव बदलता है। अगर यूस्टेशियन ट्यूब उस बदलाव के साथ पर्याप्त तेजी से नहीं खुल पाती तो कान के पर्दे के दोनों तरफ दबाव में अंतर पैदा हो जाता है। पर्दा खिंचता है और हमें कान बंद या भारी महसूस होने लगता है। ज्यादातर मामलों में यह अस्थायी होता है और कुछ मिनटों में ठीक हो जाता है। लेकिन ज्यादा दबाव और गंभीर लक्षण होने पर इसे ‘एयरप्लेन ईयर’ या ‘ईयर बैरोट्रॉमा’ कहा जाता है।
असली समस्या कान के पर्दे के दोनों तरफ दबाव का अंतर है
कान को आसानी से समझने के लिए इसे तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है, बाहरी कान, मध्य कान और भीतरी कान। बाहरी कान से ध्वनि कान के पर्दे तक पहुंचती है। पर्दे के पीछे मध्य कान होता है, जिसमें सुनने से जुड़ी तीन छोटी हड्डियां होती हैं। मध्य कान पूरी तरह बंद डिब्बा नहीं है। यह यूस्टेशियन ट्यूब के जरिए नाक के पीछे और गले से जुड़ा होता है। यह ट्यूब सामान्य स्थिति में ज्यादातर समय बंद रहती है और निगलने, जम्हाई लेने या चबाने जैसी गतिविधियों के दौरान थोड़ी देर के लिए खुलती है। ट्यूब खुलते ही मध्य कान और बाहर के वातावरण के बीच हवा का दबाव बराबर होने लगता है। इसी दौरान कान में सुनाई देने वाली छोटी-सी ‘पॉप’ की आवाज अक्सर इस बात का संकेत होती है कि हवा का रास्ता खुल गया और दबाव कम होने लगा।
विमान में कान पर इतना असर क्यों पड़ता है?
यात्री विमान 30 से 40 हजार फीट के आसपास उड़ सकता है, लेकिन केबिन के अंदर का दबाव इतनी ऊंचाई पर बाहर मौजूद वास्तविक वायुदाब जितना कम नहीं होने दिया जाता। विमान की दबाव नियंत्रण प्रणाली केबिन को अपेक्षाकृत सुरक्षित और आरामदायक दबाव पर रखती है। फिर भी उड़ान के दौरान केबिन का दबाव बिल्कुल स्थिर नहीं रहता। विमान ऊपर जाता है तो केबिन का दबाव धीरे-धीरे घटता है और नीचे आते समय बढ़ता है। शरीर के दूसरे हिस्से इन बदलावों को ज्यादा महसूस नहीं करते, लेकिन मध्य कान में फंसी हवा और कान के पर्दे के कारण कान इसका असर जल्दी महसूस कर सकता है।
टेकऑफ से ज्यादा लैंडिंग के समय कान क्यों दर्द करता है?
विमान ऊपर चढ़ता है तो केबिन का दबाव कम होता जाता है। मध्य कान में पहले से मौजूद हवा का दबाव अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। ऐसी स्थिति में हवा यूस्टेशियन ट्यूब के रास्ते बाहर निकलकर दबाव को बराबर करने में मदद कर सकती है। लैंडिंग के दौरान स्थिति उलट जाती है। केबिन का दबाव बढ़ रहा होता है, जबकि मध्य कान के भीतर दबाव कुछ समय के लिए कम रह सकता है। अब हवा को मध्य कान के अंदर पहुंचना होता है। इसके लिए यूस्टेशियन ट्यूब का ठीक समय पर खुलना जरूरी है।
अगर ट्यूब पर्याप्त तेजी से नहीं खुली तो बाहर का अधिक दबाव कान के पर्दे को अंदर की ओर धकेलने लगता है। इसी वजह से बहुत से लोगों को चढ़ाई की तुलना में उतरते समय कान में ज्यादा दर्द या दबाव महसूस होता है। बच्चों में यह समस्या ज्यादा हो सकती है क्योंकि उनकी यूस्टेशियन ट्यूब वयस्कों की तुलना में छोटी और अपेक्षाकृत संकरी होती है। छोटे बच्चे यह भी नहीं समझ पाते कि कान में दबाव महसूस होने पर उन्हें क्या करना है।
कान बंद होने लगे तो सबसे आसान उपाय है निगलना
कान में दबाव महसूस होते ही बार-बार निगलना सबसे आसान उपाय है। निगलने के दौरान यूस्टेशियन ट्यूब कुछ क्षणों के लिए खुल सकती है और मध्य कान का दबाव बाहर के दबाव के करीब आने लगता है। इसी वजह से च्यूइंग गम चबाना या टॉफी चूसना मदद कर सकता है। असली काम गम नहीं करती। चबाने और निगलने की लगातार क्रिया यूस्टेशियन ट्यूब को बार-बार खोलने में मदद करती है। पानी की छोटी-छोटी घूंट लेना भी उपयोगी है। जम्हाई लेना भी दबाव बराबर करने में मदद कर सकता है। अगर वास्तविक जम्हाई नहीं आ रही हो तो मुंह थोड़ा चौड़ा खोलकर जम्हाई जैसी क्रिया करने से भी कुछ लोगों को राहत मिलती है। अगर कान में अचानक ‘पॉप’ हुआ और उसके बाद सुनाई साफ होने लगी तो आमतौर पर इसका मतलब है कि मध्य कान का दबाव काफी हद तक बराबर हो गया।
तुरंत राहत न मिले तो हल्का ‘वाल्साल्वा मैनूवर’
अगर निगलने और जम्हाई लेने से राहत न मिले तो ‘वाल्साल्वा मैनूवर’ (Valsalva Maneuver) आजमाया जा सकता है। इसमें मुंह बंद करके नाक को उंगलियों से हल्के से बंद किया जाता है और फिर बहुत धीरे ऐसा प्रयास किया जाता है जैसे बंद नाक के बावजूद हवा बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हों। इससे गले के पीछे दबाव बढ़ सकता है और यूस्टेशियन ट्यूब खुलने में मदद मिल सकती है।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, हल्का। पूरी ताकत से जोर लगाना ठीक नहीं है। जरूरत से ज्यादा दबाव कान को नुकसान पहुंचा सकता है। हल्के प्रयास से कान खुल जाए तो वहीं रुक जाना चाहिए। एक दूसरी तकनीक में नाक बंद करके निगलने की कोशिश की जाती है। इसे ‘टॉयनबी मैनूवर’ कहा जाता है और कुछ लोगों में यह भी दबाव बराबर करने में मदद कर सकता है।
लैंडिंग में सोने से समस्या क्यों बढ़ सकती है?
सोते समय व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कम निगलता है और जानबूझकर जम्हाई या दबाव बराबर करने की कोशिश भी नहीं करता। विमान लगातार नीचे उतरता रहता है और इस दौरान मध्य कान तथा केबिन के दबाव में अंतर बढ़ सकता है। इसीलिए जिन लोगों के कान उड़ान में अक्सर बंद होते हैं, उनके लिए उतरने के दौरान जागते रहना मददगार हो सकता है। लैंडिंग शुरू होने के बाद पानी की छोटी-छोटी घूंट लेना, निगलना या गम चबाना शुरू किया जा सकता है।
दबाव बहुत बढ़ जाने के बाद उसे ठीक करने की कोशिश करने के बजाय उतरने की शुरुआत से ही थोड़ा-थोड़ा दबाव बराबर करते रहना अक्सर ज्यादा आसान होता है।
सर्दी-जुकाम में कान ज्यादा क्यों बंद होते हैं?
सर्दी, नाक बंद होना, साइनस संक्रमण, एलर्जी या ऊपरी श्वसन संक्रमण के दौरान यूस्टेशियन ट्यूब के आसपास सूजन हो सकती है। ऐसी स्थिति में पहले से पतली नली और संकरी हो जाती है और उसका ठीक समय पर खुलना मुश्किल हो सकता है। अब विमान नीचे उतरता है, बाहर का दबाव बढ़ता है, लेकिन मध्य कान में हवा उतनी तेजी से नहीं पहुंच पाती। नतीजा, कान के पर्दे पर ज्यादा खिंचाव और ज्यादा दर्द। इसीलिए गंभीर सर्दी, साइनस संक्रमण, नाक बंद होने या कान के संक्रमण के दौरान, अगर यात्रा टालना संभव हो तो उड़ान टालना बेहतर हो सकता है। कुछ लोगों में डाक्टर की सलाह से उड़ान से पहले नाक खोलने वाली दवा उपयोगी हो सकती है। लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होती। हाई बीपी, हृदय संबंधी बीमारी, गर्भावस्था या दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं में ऐसी दवाओं के इस्तेमाल से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है। नाक में डालने वाले कुछ डीकंजेस्टेंट स्प्रे का लगातार कई दिनों तक इस्तेमाल उलटे नाक बंद होने की समस्या बढ़ा सकता है।
छोटे बच्चों के कान में दर्द हो तो क्या करें?
शिशु को वाल्साल्वा जैसी तकनीक करने के लिए कहना संभव नहीं है। लेकिन दूध पिलाना, बोतल से दूध देना या उम्र के अनुसार निगलने वाली गतिविधि कराना मदद कर सकता है। चूसने और निगलने की प्रक्रिया यूस्टेशियन ट्यूब को खोलने में मदद करती है। बड़े बच्चे पानी पी सकते हैं और अगर उम्र के अनुसार सुरक्षित हो तो गम चबा सकते हैं। शिशु की नाक बंद करके उसके कान में दबाव बनाने जैसी तकनीक खुद से नहीं करनी चाहिए। छोटे बच्चे में लगातार तेज दर्द या उड़ान के बाद भी सुनाई कम देने की समस्या हो तो डॉक्टर को दिखाना बेहतर है।
कान बंद होने पर आवाज धीमी क्यों सुनाई देती है?
जब कान के पर्दे के दोनों तरफ दबाव बराबर नहीं रहता तो पर्दा सामान्य तरीके से कंपन नहीं कर पाता। मध्य कान की छोटी हड्डियों के जरिए ध्वनि के आगे पहुंचने की प्रक्रिया भी अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है। इसलिए ऐसा लगता है जैसे कान में रुई भर दी गई हो या कोई व्यक्ति दूर से बोल रहा हो। कुछ मामलों में मध्य कान में तरल भी जमा हो सकता है। तब विमान से उतरने के बाद भी कुछ समय तक भारीपन और सुनाई कम देने की समस्या रह सकती है। अधिकांश सामान्य मामलों में दबाव बराबर होने के साथ सुनने की क्षमता भी वापस सामान्य हो जाती है।
क्या कान का पर्दा फट सकता है?
हां, लेकिन सामान्य उड़ान में ऐसा बहुत दुर्लभ है। अगर मध्य कान और बाहर के वातावरण के बीच दबाव का अंतर बहुत ज्यादा हो जाए और लंबे समय तक बराबर न हो सके तो कान के पर्दे पर काफी तनाव पड़ सकता है। गंभीर ईयर बैरोट्रॉमा में पर्दे के पीछे ब्लीडिंग या तरल जमा हो सकता है और बहुत दुर्लभ मामलों में पर्दा फट भी सकता है। पर्दा फटने पर अचानक तेज दर्द, उसके बाद दर्द में कमी, कान से तरल या खून निकलना और सुनाई कम देना जैसे लक्षण हो सकते हैं। कुछ मामलों में चक्कर भी आ सकता है।
अच्छी बात यह है कि कान के पर्दे के छोटे छेद कई बार अपने आप भर जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जांच की जरूरत नहीं है। कान से खून या तरल निकलने, सुनाई कम होने या तेज चक्कर आने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
क्या फ्लाइट से कान को स्थायी नुकसान हो सकता है?
ये संभव है, लेकिन यह बहुत असामान्य है। सामान्य एयरप्लेन ईयर में स्थायी नुकसान नहीं होता। दबाव बराबर होते ही कान सामान्य हो जाता है। गंभीर ‘बैरोट्रॉमा’ में कान के पर्दे और मध्य कान को नुकसान हो सकता है। बहुत दुर्लभ स्थिति में भीतरी कान भी प्रभावित हो सकता है। तब तेज चक्कर, संतुलन बिगड़ना, कान में लगातार आवाज सुनाई देना या अचानक सुनने की क्षमता कम होना जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। ऐसे लक्षणों को सामान्य कान बंद होने की समस्या समझकर इंतजार नहीं करना चाहिए। खासकर उड़ान के बाद अचानक सुनाई बहुत कम देना एक ऐसी स्थिति है जिसमें जल्द चिकित्सा जांच जरूरी है।
दबाव नियंत्रित करने वाले ईयरप्लग कैसे मदद करते हैं?
विमान यात्रा के लिए बनाए गए कुछ विशेष ईयरप्लग में फिल्टर होता है। इनका उद्देश्य बाहर के वायुदाब में होने वाले बदलाव को कान तक अपेक्षाकृत धीरे पहुंचाना है, ताकि यूस्टेशियन ट्यूब को दबाव बराबर करने के लिए थोड़ा ज्यादा समय मिल सके। लेकिन इन्हें कोई जादुई समाधान नहीं समझना चाहिए। इनके साथ भी निगलना, जम्हाई लेना और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित तरीके से दबाव बराबर करना उपयोगी रहता है। साधारण ईयरप्लग या शोर कम करने वाले हेडफोन अलग काम करते हैं। वे आवाज कम कर सकते हैं, लेकिन मध्य कान और केबिन के बीच वायुदाब बराबर नहीं करते।
नॉइज-कैंसलिंग हेडफोन विमान के इंजन और केबिन की आवाज को कम करने के लिए ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करते हैं। एयरप्लेन ईयर की समस्या के पीछे कान के पर्दे के दोनों तरफ वायुदाब का अंतर होता है। इसलिए महंगे से महंगा नॉइज-कैंसलिंग हेडफोन पहनने के बावजूद लैंडिंग के समय कान बंद हो सकता है।
पायलटों के कान क्या बंद नहीं होते?
यह धारणा सही नहीं है कि पायलटों के कान दबाव से प्रभावित नहीं होते। उनके कानों की शारीरिक बनावट भी बाकी लोगों जैसी ही होती है। फर्क मुख्य रूप से अनुभव और आदत का है। पायलट बार-बार ऊंचाई बदलते हैं, इसलिए वे दबाव परिवर्तन को जल्दी पहचानते हैं और जरूरत पड़ने पर निगलने, जम्हाई लेने या दूसरी सुरक्षित दबाव बराबर करने की तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। वे यह भी जानते हैं कि कान में बहुत ज्यादा दबाव बनने का इंतजार करने के बजाय उतराव के दौरान लगातार दबाव बराबर करते रहना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। विमान की केबिन दबाव प्रणाली भी दबाव को नियंत्रित दर से बदलती है। इसके बावजूद पायलटों को भी ईयर ब्लॉक हो सकता है, खासकर जब वे सर्दी-जुकाम या नाक बंद होने जैसी स्थिति में हों। विमानन चिकित्सा में इसे गंभीरता से लिया जाता है क्योंकि कान में तेज दर्द या चक्कर आने जैसी समस्या उड़ान संचालन को प्रभावित कर सकती है।
पायलटों के सामने एक अलग समस्या भी हो सकती है, रिवर्स ईयर ब्लॉक
‘रिवर्स ईयर ब्लॉक’ सामान्य एयरप्लेन ईयर से अलग स्थिति है। इसमें मध्य कान के भीतर हवा का दबाव आसपास के दबाव से ज्यादा हो सकता है और यूस्टेशियन ट्यूब उस हवा को बाहर निकालने में पर्याप्त तेजी से काम नहीं कर पाती। ऐसी स्थिति में ऊंचाई बदलने के दौरान दर्द और दबाव बढ़ सकता है। यह पायलटों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उड़ान के दौरान बार-बार ऊंचाई बदल सकते हैं। यह सामान्य यात्री के कान बंद होने से अलग समस्या है और लगातार या गंभीर लक्षण होने पर विमानन चिकित्सा मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।
अगर विमान का दबाव अचानक खत्म हो जाए तो क्या कान फट जाएंगे?
यह सामान्य टेकऑफ या लैंडिंग से बिल्कुल अलग स्थिति है। प्रेशरयुक्त विमान में उड़ान के दौरान दरवाजा सामान्य तरीके से खोलना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। लेकिन अगर किसी गंभीर तकनीकी समस्या के कारण केबिन का दबाव तेजी से कम हो जाए तो उसे तेजी से केबिन दबाव गिरना कहा जाता है। ऐसी स्थिति में कान और साइनस पर अचानक दबाव का असर पड़ सकता है। लेकिन उससे भी बड़ी समस्या ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी होती है। इसी वजह से गंभीर केबिन दबाव हानि की स्थिति में यात्रियों के लिए ऑक्सीजन मास्क उपलब्ध होते हैं और पायलट विमान को तेजी से ऐसी ऊंचाई की ओर ले जाते हैं जहां सामान्य रूप से सांस लेना संभव हो। यह सामान्य लैंडिंग के दौरान होने वाले कान बंद होने जैसा मामूली दबाव परिवर्तन नहीं है।
सबसे कारगर तरीका है दर्द आने का इंतजार न करना
अगर हर उड़ान में कान बंद होते हैं तो सबसे उपयोगी तरीका यह है कि उतराव शुरू होते ही दबाव बराबर करने की प्रक्रिया शुरू कर दें। पानी की छोटी-छोटी घूंट लेते रहें, बार-बार निगलें, जम्हाई लें या गम चबाएं। कान भारी होने लगे और इन उपायों से राहत न मिले तो बहुत हल्का ‘वाल्साल्वा मैनूवर’ किया जा सकता है। लेकिन जोर लगाकर दबाव बनाने से बचना जरूरी है। जिन लोगों को पहले एयरप्लेन ईयर हो चुका है, उनके लिए लैंडिंग के दौरान सोने से बचना भी मददगार हो सकता है। सर्दी-जुकाम, साइनस की समस्या या कान के संक्रमण के समय परेशानी बढ़ सकती है। जिन लोगों को हर उड़ान में बहुत तेज दर्द होता है या लंबे समय तक सुनाई कम देता है, उन्हें कान-नाक-गला विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।
पूरी प्रक्रिया को संक्षेप में समझें तो विमान आपके कान को सीधे ‘बंद’ नहीं करता। विमान के केबिन का बदलता एयरप्रेशर कान के पर्दे के दोनों तरफ दबाव में अंतर पैदा करता है और ‘यूस्टेशियन ट्यूब’ उस अंतर को बराबर करने की कोशिश करती है। कान में सुनाई देने वाली छोटी-सी ‘पॉप’ की आवाज अक्सर अच्छी खबर होती है। इसका मतलब होता है कि हवा का रास्ता खुल गया और दबाव बराबर होने लगा। ज्यादातर यात्रियों में मामला यहीं खत्म हो जाता है। स्थायी नुकसान बहुत दुर्लभ है, लेकिन उड़ान के बाद खून या तरल निकलना, बहुत तेज दर्द, तेज चक्कर या अचानक स्पष्ट रूप से सुनाई कम देना ऐसी स्थितियां हैं जिन्हें सामान्य कान बंद होने की समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।


