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FoPL Label: पैकेट पर लाल निशान क्यों लगने वाला है? कंपनियां बोलीं- ग्राहक खरीदना छोड़ देंगे...
FoPL Label के तहत पैकेज्ड फूड पर लाल हेक्सागन लगाने का प्रस्ताव है। जानें FSSAI के नियम, कंपनियों की आपत्ति और सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ।
FoPL Label: Why Could Packaged Foods Get a Red Warning Hexagon?
FoPL Label: अब आपको किराने की दुकान पर चिप्स, बिस्कुट, नमकीन, इंस्टेंट नूडल्स या कोई दूसरा पैकेज्ड फूड खरीदते समय सिर्फ कीमत और एक्सपायरी डेट ही नहीं, बल्कि पैकेट के सामने बना एक बड़ा लाल निशान भी नजर आ सकता है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने पैकेज्ड फूड में ज्यादा चीनी, नमक और वसा की जानकारी सामने से देने के लिए Front-of-Pack Labelling (FoPL) का प्रस्ताव रखा है।
यह मामला अब सिर्फ खाद्य कंपनियों और रेगुलेटर के बीच बहस तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। 28 सितंबर 2026 को सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने FSSAI की प्रस्तावित समयसीमा पर भी सवाल उठाए हैं।
आखिर पैकेट पर क्यों लगाया जाना है लाल हेक्सागन?
FSSAI का उद्देश्य यह है कि ग्राहक पैकेट के पीछे लिखी लंबी न्यूट्रिशन टेबल पढ़े बिना भी यह समझ सके कि किसी खाद्य उत्पाद में चिंता वाले पोषक तत्व ज्यादा हैं या नहीं। प्रस्तावित व्यवस्था में पैकेट के सामने लाल रंग के हेक्सागन यानी षट्भुज आकार के चेतावनी लेबल में संबंधित जानकारी दिखाई जानी है।
FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने प्रस्ताव में बताया था कि इसमें HIGH FAT, HIGH SUGAR और HIGH SALT जैसे संकेत दिए जा सकते हैं। शुरुआत में दो या उससे ज्यादा पोषक तत्व तय सीमा से ऊपर होने वाले उत्पादों को कवर करने का प्रस्ताव था। बाद में FSSAI ने अदालत के समक्ष अपनी स्थिति बदलते हुए ऐसा मॉडल रखा, जिसमें इनमें से किसी एक पोषक तत्व की तय सीमा पार होने पर भी चेतावनी लग सकती है।
कंपनियों को लाल रंग पर सबसे ज्यादा आपत्ति क्यों?
ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन (AIFPA) ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लाल रंग के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है। एसोसिएशन का कहना है कि भारतीय उपभोक्ताओं के बीच लाल रंग को गैर-शाकाहारी खाद्य पदार्थों से जोड़ने की आदत है। ऐसे में पैकेट के सामने बड़ा लाल निशान भ्रम पैदा कर सकता है।
जबकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मौजूदा FSSAI नियमों में गैर-शाकाहारी भोजन की पहचान भूरे रंग के त्रिकोण से और शाकाहारी भोजन की पहचान हरे रंग के गोले से होती है। यानी प्रस्तावित लाल हेक्सागन मौजूदा वेज-नॉनवेज लोगो से अलग होगा।
कंपनियों की आपत्ति सिर्फ रंग तक सीमित नहीं है। उद्योग की ओर से यह भी कहा गया है कि पोषक तत्वों की सीमा तय करने में प्रति सर्विंग के आधार को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए। AIFPA ने अदालत के सामने Nutrient Reference Value आधारित per-serving approach की बात रखी है।
FSSAI के प्रस्ताव में अब क्या बदलाव आया?
शुरुआती प्रस्ताव में FSSAI ने दो चरणों में चेतावनी व्यवस्था लागू करने की बात कही थी। पहले चरण में ऐसे उत्पाद आते जिनमें दो या उससे अधिक संबंधित पोषक तत्व तय सीमा से ऊपर होते। दूसरे चरण में किसी एक पोषक तत्व की सीमा पार करने वाले उत्पादों को भी चेतावनी के दायरे में लाने की बात थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 10 सितंबर को इस व्यवस्था से जुड़े कई सवाल उठाए थे। इनमें लेबल का आकार, पैकेट पर उसकी जगह, फॉन्ट का आकार, अलग-अलग पोषक तत्वों के लिए अलग प्रतीक होने चाहिए या नहीं और लाल रंग के चुनाव पर पुनर्विचार की जरूरत जैसे मुद्दे शामिल थे।
चीनी, नमक और फैट की सीमा कैसे तय होगी?
यह भी इस विवाद का बड़ा हिस्सा है। FSSAI ने अपने प्रस्ताव को ICMR-NIN की 2024 Dietary Guidelines for Indians में दिए पोषक तत्वों से जुड़े मानकों से जोड़ने की बात कही है। वहीं अगस्त 2026 के एक अलग FSSAI ड्राफ्ट में बच्चों के स्कूलों से जुड़े खाद्य मानकों के लिए added fat, added sugar और salt की अलग-अलग सीमाएं भी प्रस्तावित की गई हैं। लेकिन पैकेज्ड फूड पर लागू होने वाली अंतिम FoPL व्यवस्था में कौन-सी सीमा और किस गणना पद्धति का इस्तेमाल होगा, यह अंतिम नियम आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों और सरकार से क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 10 सितंबर को FSSAI के प्रस्ताव में कई व्यावहारिक पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा था। अदालत ने यह भी पूछा था कि अगर नमक, चीनी और फैट कम करने के लिए कंपनियां दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाती हैं, तो कहीं इससे कृत्रिम प्रिजर्वेटिव या इमल्सीफायर का इस्तेमाल तो नहीं बढ़ेगा।
28 सितंबर की सुनवाई में FSSAI ने नियम बनाने के लिए चार महीने और कारोबारियों को अनुपालन के लिए एक साल का समय देने की बात रखी। सुप्रीम कोर्ट ने इस समयसीमा को लेकर सवाल उठाए और बाद में मामले में फैसला सुरक्षित कर लिया।
अभी पैकेट पर लाल निशान लगना शुरू नहीं हुआ है
सबसे अहम बात यह है कि 30 सितंबर 2026 तक यह व्यवस्था अंतिम रूप से लागू नियम नहीं बनी है। FSSAI की ओर से प्रस्ताव और अदालत में चल रही प्रक्रिया के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि लाल हेक्सागन का रंग, डिजाइन, पोषक तत्वों की सीमा और कंपनियों के लिए अनुपालन की समयसीमा क्या होगी।
यानी फिलहाल दुकान से पैकेट खरीदते समय ऐसा कोई नया लाल हेक्सागन अनिवार्य रूप से देखने को नहीं मिलेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद बनने वाले अंतिम नियमों के साथ पैकेज्ड फूड की लेबलिंग में बड़ा बदलाव आ सकता है।


