Gut Brain Connection: आंतों को ‘दूसरा दिमाग’ क्यों कहा जाता है? जानिए पूरा विज्ञान

Gut Brain Connection: आंतों को ‘दूसरा दिमाग’ क्यों कहा जाता है? जानिए गट-ब्रेन कनेक्शन, वेगस नर्व, एंटेरिक नर्वस सिस्टम और गट माइक्रोबायोम का दिमाग, मूड और मानसिक सेहत पर असर।

Neel Mani Lal
Published on: 18 Aug 2026 7:00 PM IST
Gut Brain Connection
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Gut Brain Connection

Gut Brain Connection: कभी किसी बड़े फैसले से पहले पेट में अजीब सी घबराहट महसूस हुई हो या किसी बुरी खबर के बाद खाना खाने का मन ही न किया हो - यह सिर्फ इत्तेफाक नहीं है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने साबित किया है कि हमारी आंतें सिर्फ खाना पचाने वाला एक अंग नहीं हैं बल्कि एक बेहद जटिल और सक्रिय नेटवर्क हैं, जिसे अक्सर ‘दूसरा दिमाग’ कहा जाता है। यह सुनने में अजीब लग सकता है, पर इसके पीछे ठोस विज्ञान है। विस्तार से समझते हैं कि आखिर आंतों और दिमाग के बीच यह रिश्ता है क्या, और यह हमारी सेहत को किस हद तक प्रभावित करता है।

आंतों में होता क्या है?

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमारी आंतों की दीवारों में लाखों नहीं बल्कि करीब पचास से पांच सौ मिलियन तक न्यूरॉन्स यानी तंत्रिका कोशिकाएं (nervecells) मौजूद होती हैं। यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसे रीढ़ की हड्डी में मौजूद न्यूरॉन्स की तुलना में भी काफी ज्यादा माना जाता है। इन्हीं न्यूरॉन्स से मिलकर बनने वाले पूरे नेटवर्क को वैज्ञानिक भाषा में ‘एंटेरिक नर्वस सिस्टम’ कहा जाता है यानी आंतों की अपनी स्वतंत्र तंत्रिका प्रणाली।

यह प्रणाली इतनी विकसित है कि यह दिमाग से सीधा आदेश लिए बिना भी कई काम खुद कर सकती है। यह भोजन को आंतों में आगे बढ़ाने, पाचन एंजाइम छोड़ने, आंतों की मांसपेशियों को सिकोड़ने-फैलाने जैसे कामों को स्वतंत्र रूप से नियंत्रित कर सकती है। यही वजह है कि इसे ‘दूसरा दिमाग’ कहा जाने लगा क्योंकि यह असल में शरीर के भीतर एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर तंत्रिका तंत्र (nervous system) की तरह काम करता है, जो जरूरत पड़ने पर बिना दिमाग के हस्तक्षेप के भी अपना काम चला सकता है।

आंतें और दिमाग आपस में बात कैसे करते हैं

अब सवाल यह उठता है कि अगर आंतों का अपना अलग तंत्रिका तंत्र है तो क्या यह दिमाग से पूरी तरह अलग-थलग काम करता है। जवाब है, बिल्कुल नहीं। आंतें और दिमाग लगातार आपस में जुड़े रहते हैं, और इस जुड़ाव का सबसे बड़ा माध्यम है एक खास नस, जिसे वेगस नर्व कहा जाता है। वेगस नर्व शरीर की सबसे लंबी और सबसे महत्वपूर्ण नसों में से एक है जो दिमाग से सीधे नीचे उतरकर आंतों तक जुड़ती है। यह नस दोनों दिशाओं में संदेश भेजने का काम करती है, यानी दिमाग से आंतों तक भी संदेश जाते हैं, और आंतों से दिमाग तक भी। दिलचस्प बात यह है कि वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस नस के जरिए भेजे जाने वाले ज्यादातर संदेश असल में नीचे से ऊपर की तरफ, यानी आंतों से दिमाग की तरफ जाते हैं, न कि दिमाग से आंतों की तरफ। इसका मतलब है कि हमारी आंतें दिमाग को लगातार यह बता रही होती हैं कि शरीर के भीतर क्या हो रहा है, न कि सिर्फ दिमाग के आदेश का इंतजार कर रही होती हैं।

इसके अलावा आंतें और दिमाग हार्मोन और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के जरिए भी आपस में जुड़े रहते हैं। जब आंतों में कोई गड़बड़ी होती है, तो वहां से निकलने वाले कुछ खास रासायनिक संकेत खून के जरिए भी दिमाग तक पहुंच सकते हैं, जो हमारे मूड और सोचने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं।

यह पूरा तंत्र इतना गहराई से जुड़ा हुआ है कि वैज्ञानिक अब इसे सिर्फ ‘गट-ब्रेन कनेक्शन’ नहीं, बल्कि ‘गट-ब्रेन एक्सिस’ यानी आंत-दिमाग धुरी कहते हैं। ताकि यह साफ हो सके कि यह कोई एकतरफा रिश्ता नहीं है बल्कि एक सतत चलने वाला दो-तरफा संवाद है। दिमाग जिस तरह तनाव या खुशी के समय आंतों को प्रभावित करता है, ठीक उसी तरह आंतों की सेहत भी दिमाग की कार्यप्रणाली और भावनात्मक स्थिति को लगातार प्रभावित करती रहती है। यही वजह है कि कई डॉक्टर अब मरीज के पाचन तंत्र और मानसिक सेहत को अलग-अलग समस्याओं की तरह नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रणाली की तरह देखने लगे हैं।

आंतों में बसे खरबों बैक्टीरिया का बड़ा रोल

इस पूरी कहानी का एक और बेहद अहम पहलू है हमारी आंतों में रहने वाले खरबों सूक्ष्मजीव, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘गट माइक्रोबायोम’ कहा जाता है। यह सिर्फ बैक्टीरिया का एक अनजान समूह नहीं बल्कि यह हमारे शरीर के साथ मिलकर एक तरह का साझेदारी वाला रिश्ता बनाए रखता है। हाल के वैज्ञानिक शोध में यह साफ हो चुका है कि यही सूक्ष्मजीव हमारे मूड और मानसिक सेहत को भी काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं।

यह हैरान करने वाली बात है कि शरीर में मौजूद कुछ बेहद जरूरी न्यूरोट्रांसमीटर, यानी वे रासायनिक संदेशवाहक जो हमारे मूड को नियंत्रित करते हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा असल में दिमाग में नहीं बल्कि आंतों में बनता है। सेरोटोनिन (serotonin) जिसे अक्सर ‘खुशी का हार्मोन’ कहा जाता है, उसका करीब नब्बे फीसदी हिस्सा हमारी आंतों में ही बनता है। हालांकि आंतों में बना यह सेरोटोनिन सीधे दिमाग तक नहीं पहुंच पाता, क्योंकि दिमाग और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच एक सुरक्षात्मक बाधा मौजूद रहती है, पर यह आंतों के भीतर मौजूद तंत्रिका तंत्र और वेगस नर्व के जरिए हमारे समूचे मूड और मानसिक स्थिति को परोक्ष रूप से जरूर प्रभावित करता है।

गट माइक्रोबायोम में मौजूद बैक्टीरिया कई और तरह के रासायनिक पदार्थ भी बनाते हैं, जो सूजन को नियंत्रित करने, प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित रखने और यहां तक कि तनाव से जुड़े हार्मोन के स्तर को प्रभावित करने में भी भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि आजकल वैज्ञानिक शोध में यह विषय तेजी से लोकप्रिय हो रहा है कि आंतों में मौजूद बैक्टीरिया की विविधता और संतुलन का सीधा असर डिप्रेशन, चिंता और तनाव जैसी मानसिक स्थितियों पर भी पड़ सकता है।

गट माइक्रोबायोम का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यह जन्म से लेकर पूरी जिंदगी लगातार बदलता रहता है। जन्म के समय, बचपन में खान-पान, एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल, उम्र बढ़ने और यहां तक कि तनाव के स्तर से भी इसकी बनावट प्रभावित होती रहती है। इसका मतलब है कि हमारी आंतों में मौजूद बैक्टीरिया की दुनिया कोई स्थिर चीज़ नहीं, बल्कि यह हमारी जीवनशैली के साथ लगातार बदलती और ढलती रहती है। यही वजह है कि खान-पान में किए गए बदलाव अपेक्षाकृत कम समय में भी मूड और मानसिक सेहत पर असर डाल सकते हैं।

पेट में ‘तितलियां उड़ने’ वाला एहसास असल में क्या है

अब बात करते हैं उस बेहद जाने-पहचाने एहसास की, जिसे हम अक्सर ‘पेट में तितलियां उड़ना’ या हौलदिली होना कहते हैं। जब हम किसी घबराहट भरी स्थिति में होते हैं, जैसे किसी बड़े इंटरव्यू से पहले, स्टेज पर जाने से पहले, या किसी अनजान डर के समय तो पेट में एक अजीब सी हलचल या भारीपन महसूस होता है। यह कोई काल्पनिक एहसास नहीं, बल्कि इसका ठोस जैविक आधार है।

होता ए है कि जब दिमाग किसी तनाव या खतरे का संकेत महसूस करता है, तो वह तुरंत शरीर में कुछ खास तनाव-हार्मोन छोड़ता है और साथ ही वेगस नर्व के जरिए आंतों को भी सीधा संकेत भेजता है। इससे आंतों की रक्त आपूर्ति और उनकी सामान्य गतिविधि में अस्थायी बदलाव आ जाता है, जिसे हम शारीरिक रूप से एक अजीब सी बेचैनी या हलचल के रूप में महसूस करते हैं। इसी तरह लंबे समय तक चलने वाला तनाव या चिंता आंतों की सामान्य कार्यप्रणाली को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है, जिससे पाचन संबंधी दिक्कतें, पेट दर्द या अनियमित मल त्याग जैसी समस्याएं भी उभर सकती हैं।

यही दो-तरफा रिश्ता इस बात की भी व्याख्या करता है कि क्यों तनाव या चिंता से जूझने वाले बहुत से लोगों को साथ में पेट संबंधी समस्याएं भी होती हैं, और क्यों कुछ मामलों में पुरानी पाचन संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों में डिप्रेशन या चिंता का खतरा भी अपेक्षाकृत ज्यादा देखा गया है।

विज्ञान इस विषय पर अब तक क्या कहता है

गट-ब्रेन कनेक्शन को लेकर वैज्ञानिक शोध अभी भी लगातार जारी है, और यह विषय आज भी दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में सक्रिय शोध का हिस्सा बना हुआ है। कई अध्ययनों में यह देखा गया है कि जिन लोगों की आंतों में बैक्टीरिया की विविधता ज्यादा और संतुलित होती है, उनमें समग्र मानसिक स्वास्थ्य बेहतर पाया गया है, जबकि असंतुलित माइक्रोबायोम वाले लोगों में तनाव, चिंता और मूड से जुड़ी समस्याओं का खतरा अपेक्षाकृत ज्यादा देखा गया है। हालांकि यह जरूर ध्यान रखने वाली बात है कि यह पूरा क्षेत्र अभी भी विकसित हो रहा है, और वैज्ञानिक अभी भी यह समझने की कोशिश में जुटे हैं कि यह रिश्ता ठीक-ठीक किस हद तक कारण और किस हद तक सिर्फ संबंध है।

फिर भी इतना तय है कि आंतों और दिमाग के बीच का यह संबंध सिर्फ किसी काल्पनिक धारणा पर आधारित नहीं, बल्कि इसका ठोस शारीरिक और रासायनिक आधार मौजूद है, जिसे वेगस नर्व, हार्मोन, न्यूरोट्रांसमीटर और गट माइक्रोबायोम के जरिए वैज्ञानिक रूप से समझा जा चुका है।

इस समझ का रोजमर्रा की जिंदगी में क्या मतलब है

इस पूरे विज्ञान का सबसे व्यावहारिक पहलू यह है कि हमारी खान-पान की आदतें सिर्फ शरीर के वजन या पाचन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इनका सीधा असर हमारे मूड और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। संतुलित और फाइबर से भरपूर भोजन, जिसमें दही जैसे प्रोबायोटिक स्रोत, ताजे फल-सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के विकास में मदद कर सकता है, जो आगे चलकर बेहतर मूड और कम तनाव से जुड़ा पाया गया है। इसके उलट अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन, ज्यादा चीनी और लगातार बना रहने वाला तनाव आंतों के स्वस्थ बैक्टीरिया के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिसका असर आगे चलकर मानसिक सेहत पर भी पड़ सकता है। इसी तरह नियमित नींद, शारीरिक गतिविधि और तनाव प्रबंधन के तरीके भी परोक्ष रूप से आंतों की सेहत और इसके जरिए हमारे समूचे मानसिक संतुलन को प्रभावित करते हैं।

आंतों को ‘दूसरा दिमाग’ कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि यह हमारे शरीर की एक बेहद जटिल और वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुकी हकीकत है। आंतों में मौजूद लाखों न्यूरॉन्स, वेगस नर्व के जरिए दिमाग से लगातार होने वाला संवाद, और वहां बसे खरबों सूक्ष्मजीवों का हमारे मूड पर पड़ने वाला असर, यह सब मिलकर साबित करते हैं कि हमारी आंतें सिर्फ खाना पचाने वाला अंग नहीं, बल्कि हमारे समूचे शारीरिक और मानसिक संतुलन का एक अहम हिस्सा हैं। यही वजह है कि आज स्वास्थ्य विशेषज्ञ सिर्फ शारीरिक बीमारियों के लिए नहीं, बल्कि मानसिक सेहत को बेहतर बनाए रखने के लिए भी आंतों की देखभाल को उतना ही जरूरी मानने लगे हैं।

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